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Sunday, June 14, 2026

चित्रपदा छंद- Hindi poetry


Explained By - Mr. Krishna Shrivastav ji
Hata , Kushi-Nager (U.P.)
चित्रपदा छंद
सर्वप्रथम श्री गणेश जी के चरणों में प्रणाम करता हूँ ततपश्चात माँ शारदे के चरणों मे नमन करता हूँ।
साहित्य अनुरागी समूह द्वारा चलाये जा रहे छंद की कार्यशाला के सफलतम क्रम को आगे बढ़ाते हुए मैं कृष्णा श्रीवास्तव आप सभी उद्भट विद्वजन के समक्ष चित्रपदा छंद का विधान उदाहरण के साथ अभ्यास हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ। साहित्य के क्षेत्र में कोई परिपूर्ण नहीं होता और मैं तो सहित्य का एक साधारण सा विद्यार्थी हूँ अतः कुछ त्रुटियां सम्भाव्य हैं, जिसके लिए मैं अग्रिम रूप से ही क्षमा प्रार्थी हूँ।

चित्रपदा छंद का विधान उदाहरण सहित आप सभी के अवलोकनार्थ सादर समर्पित है।

चित्रपदा छंद
जाती - अनुस्ठुप (8 वर्ण हर चरण में)

लक्षण - चित्रपदा भ भ गा गा ।
अर्थात
हर चरण में क्रम से
भगण भगण गुरु गुरु वर्ण हो।
यथा
211 211 22
नियत मापनी।
चार चरण
दो दो अथवा चारो चरण अथवा सम चरण तुकांत लिए जा सकते है।

उदाहरण-1
211 211 22
सीय जहीं पहिरायी।
रामहि माल सुहायी।
दुदुभि देव् बजाये।
फूल तहीं बरसाये।
केशवदास (रामचन्द्रिका से)

उदाहरण-2
211 211 22
रामहि नाम पियारा।
जीवन एक सहारा।
हे!प्रभु दीनदयाला।
मो पर होहुँ कृपाला।

कृष्णा श्रीवास्तव
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 चित्रपदा छंद
प्रत्येक चरण 8 वर्ण
मापनी

211 211 22
भगण भगण गुरु गुरु
दो -दो चरण समतुकांत

हार, हरा कर आना ,जीत जरा भर लाना।
भारत ध्वज निहारो ,जा अरि मुण्ड उतारो ।।

मात कहे सुत मेरे ,रक्त बहे रग तेरे ।
तो बढ़ जा रिपु मार ,सिंह समान दहाड़ ।।

बाज उठी रणभेरी ,जा लड़ ले बिन देरी ।
गौरव गान सुनाना ,भारत मान बढ़ाना ।।

दुश्मन से टकराते ,युद्ध कला सिखलाते ।
हिम्मत जो दिखलाते ,वीर वही कहलाते ।।

अभय आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व
लखनऊ , उत्तरप्रदेश
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 चित्रपदा छंद
प्रत्येक चरण 8 वर्ण
मापनी

211 211 22
भगण भगण गुरु गुरु
दो -दो चरण समतुकांत

मात-पिता जग सारे,भूल गये सुत प्यारे।
जा परदेश विराजे,बैठ वहाँ बिन काजे।

माँ ममता अनुरागी,पिता बने सहभागी।
दर्द दवा महतारी,माँ जग में उपकारी।

बालक रोग शरीरा,माँ उर होत अधीरा।
देव बसे गृह मेरे,कष्ट मिटे शिशु तेरे।

माँ बिन बालक रीता,माँ जग में गृह भीता।
सृष्टि बसी जग सारी,पूजन माँ अधिकारी।

रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट "
बेगूसराय, बिहार
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चित्रपदा छंद
प्रत्येक चपण 8 वर्ण
मापनी

२११ २११ २२
भगण भगण गुरु गुरु
दो दो चरण समतुकांत

बात जरा तुम मानो,काम यहाँ सब आना,
जीवन राह सुधारों ,मान न सादर मारो ।

साथ यहाँ तुम देना,प्यार यहाँ सब लेना,
चार दिनों यह मेला,हार यहाँ सब झेला ।

झूठ सदा तुम छोड़ो,मानव से मन जोड़ो ,
है जिनके मन छोटे,अंदर से वह खोटे ।

जो अब मान बढ़ातेमैं तब ही रखु नाते,
जीवन में सहभागी ,साजन वो अनुरागी ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर
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चित्रपदा छंद
4 चरण
प्रत्येक चरण 8 वर्ण


21121122
भगण भगण गुरु गुरु

**************

जो भय से भय खाता ,जीत नहीं वह पाता
शौर्य प्रकाश बिखेरे ,काँप उठे रिपु डेरे।
************
हर्षित है जग सारा ,प्रीति प्रवाहित धारा।
व्याकुल नैन मिले हैं ,सुन्दर पुष्प खिले हैं।

************
कोटिक चन्द्र लजे है ,मोहक श्याम सजे है।
गीत धरा शुचि गाये। ,माँ निज लाल खिलाये।
*************

मोहन को अति भाये ,जो मुरली सुख पाये।
शोभित ब्रज किशोरी ,मुग्ध प्रमोद घनेरी।

************
पीत प्रभा रवि आये ,भोर उषा शुचि लाये
प्राण भरें नित आशा .पूर्ण करें अभिलाषा।
**************

माधव ज्ञान सुनाते .अर्जुन शीश झुकाते
धर्म प्रकाश बढ़ेगा .जो नर पुण्य करेगा।
************
गीता गुप्ता 'मन'
उन्नाव,उत्तरप्रदेश

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चित्रपदा छन्द- वार्णिक छन्द
8 वार्णिक अंत 2 गुरु अनिवार्य
मापनी- 211 211 22

भगण भगण गुरु गुरु
दो दो या चारो चरण समतुकांत
विषय:- पावस

पावस मौसम आयो, कोकिल गान सुहायो,
आँगन झूलत झूला,प्रीतम प्रेम छबीला।
**********************
बाखर भीगत राधा,माधव प्रेम अगाधा,
नैनन ओझल धामा, वैभव भूषण श्यामा।
***********************
दीपक नेह जलाए, केशव द्वार न आये,
जीवन प्राण अधीरा,माधव कंटक पीरा।
***********************
मोहन भोग लगाओ,माखन मोदक खाओ,
तारण दो त्रिपुरारी,माधव श्याम मुरारी।
**********************
नीरज कोमल नैना, कुंतल केश सलोना,
मोहक प्रीत निहारूँ,पंकज पाद पखारुँ।
*************************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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चित्रपदा छ्न्द
वर्णिक 8 वर्ण , अंत 2 2 अनिवार्य,
.....

211 211 22
पुष्प बनो तुम प्यारे, राह बना चल न्यारे।
जीव यहां भरमायें, दुर्लभ ये तन पायें।
.....
प्रेम करो सब प्राणी, सुन्दर हो सुर वाणी।
सुन्दर कर्म बनाओ , जीवन का सुख पाओ।
.....

लालच को अब त्यागो, सूर्य बनो सब जागो ।
चन्दन सा तन धारो , धाम करो तुम चारो ।
......
नाव चले जब धारा, राम करें भव तारा ।
राह मुझे दिखलाओ, अद्भुत नाम कमाओ ।
....
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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चित्रपदा छंद
८ वर्ण,वार्णिक छंद है,अंत दो गुरु
मापनी...२११ २११ २२


जो बजरंग बली है। राम तरंग पली है।
भक्त अनन्य कहाए। प्रीत अखंड जगाए।।

देह विशाल दिखाते। सूक्ष्म कभी बन जाते।
शक्ति अपार निखारे। दानव हाय पुकारे।।

रावण को उकसाए। भूत पिशाच भगाए।
दीन दुखी रखवारे। भक्त अनेक पुकारे।।

सौमित्र प्राण बचाए। प्रभु दुलार लुटाए।
बुद्धि कृपा तुम दाता। हे हनुमान विधाता।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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चित्रपदा छंद-वार्णिक छंद
8 वार्णिक अंत 2 गुरु अनिवार्य
मापनी-211 211 22...


कंचन कुंतल काया, अग्नि प्रचंड समाया,
क्यों भटके मन तृष्णा, जाप मना हरि कृष्णा।

जीवन के दिन चारी, नाथ सुनो गिरधारी,
भक्ति सुधा बरसा दे, मुक्ति सुमार्ग दिखा दे।

श्याम छटा अति प्यारी, सुन्दर नैन कटारी,
पाप कटे भव बाधा, नाम जपो हरि राधा।

जीवन कष्ट अगाधा नाथ हरो मम बाधा,
मोहन कुंज बिहारी, श्याम सखा बनवारी।

ममता गुप्ता
आर्य नगर उतरौला
जिला-बलरामपुर

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🌸अनुष्ठुप अष्ठाक्षर वृत्त
चित्रपदा छंद
211 211 22 आठ वर्ण
भगण भगण गुरु गुरु
🌹
कष्ट मिटे जप रामाद्वेष मिटे जप श्यामा ।
पार करे यह नामाजीवन में यह कामा।।
*****************
प्रीत सदा फलती है।रीत यही चलती है।
पंख पसार खड़ा है।प्राण पखेरू अड़ा है।
****************
आज सभी यह गायेराम जपे सुख पाये
चाह जगे मन द्वारेवो भव सागर तारे।।
*****************
🌹🌹
अरविन्द चास्टा , कपासन -चित्तौड़गढ़

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चित्र पदा छंद
8 वर्ण वार्णिक छंद
मात्रा भार :- 211 211 22


धूसर है मत दाता ,दे मत वो पछताता ।
खेल करे हर नेता ,पीड़ लगे हर लेता ॥
****************
लोभ बसे मन न्यारा ,राज करूँ बस सारा ।
लोग नहीं अपनाने ,राज करें मनमाने ॥
****************
झूठ सदा कह जाते ,तोड़ रहे कर वादे ।
देश भले लुट जाए ,सँग भले छुट जाए ॥
**************
बोल सभी मन भाए ,कौन भला समझाए ।
भेष धरे बस झूठा ,बेच रहा मत लूटा ॥
***************
जाग जरा मत दाता ,सोच नहीं कर पाता ।
आज सही जन लाओ ,आज करें प्रण आओ ॥

॥ जय हिंद ॥
स्वरचित : राम किशोर , पंजाब ।

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चित्रपदा छन्द। (विनती)
वर्णिक 8 वर्ण अंत 22
211/211/2 2
प्रेम करो भज रामा ,पूरण हो सब काजा

मालिक संकट टालो ,जीवन सुन्दर डालो


प्रभु दवारिहि आये ,संकट दूरहि जाये
आस न होय अधूरी ,दूर रहे मजबूरी।

ऋतु गुलाटी
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चित्रपदा छन्द
प्रति चरण: 8 वर्ण
प्रत्येक चरण : भगण(211) भगण(211) गुरु गुरु(22)


चंचल नैन तुम्हारे, काजल से कजरारे।
मंजुल रूप सजीला, ढूढ़त छैल छबीला।

मोहक ये तरुणाई, सुंदर ज्यूँ अरुणाई।
स्वर्णिम रंग सजी है, कोमल प्रेम कली है।

केश खुले घुँघराले, ज्यूँ बदरा मतवाले।
पायल को छनकाती, घूम रही बलखाती।

रैन गयी तम भागे, भोर भई सब जागे।
देख रहा हर कोई, रात जगी कब सोई।

याद जगाय पिया की, पीड़ सताय जिया की।
बैरन रैन भयी रे, जागत भोर हुई रे।

जितेंदर पाल सिंह

मनोरम छन्द - Hindi poetry

 मनोरम छन्द--

Explained By Smt Ragini Garg ji - Rampur ( U.P.)


मानव वर्ण संज्ञा या जाति के 14 मात्रिक छंन्दों की अगली कड़ी में निम्नलिखित छन्द हैं-

मनोरम छन्द--

(क) इस छन्द का पहला वर्ण(आदि वर्ण) गुरु(2) होता है

चरणान्त: भगण (211) अनिवार्य है

(ख) इस छन्द का पहला वर्ण (आदि वर्ण) गुरु(2

चरणान्त: यगण (122) अनिवार्य।
दो अथवा चारों चरण परस्पर समतुकांत।


उदाहरण के लिए :-

विषय:- वीर-गाथा
विधा:- गीत
छंद-मनोरम छंद
मापनी-2122 2122
रस-वीर रस
स्थायी भाव-उत्साह
रचना :-

(मुखड़ा)
देश हित में जो मरेगा। नाम अपना वो करेगा।।

(अन्तरा 1)
देश पर जब आँच आये, खून की नदियाँ बहाये।
शीश माँ चरणों चढ़ायें, वीर -गाथा हम लिखायें।

शत्रुदल से जो लड़ेगा । नाम अपना वो करेगा।।(टेक)

(अन्तरा 2)
नारियाँ पीछे नहीं हैं, देश हित वो भी लड़ी हैं।
चूड़ियाँ तज, तेग पकड़ीं, गर्दनें अरि की जकड़ीं।
मृत्यु को जो भी वरेगा। नाम अपना वो करेगा।।

(अन्तरा 3)
भारती माँ! भारती माँ! पूत अपने वारती, माँ!
आँख जब बैरी दिखाये, वीर उसको नोंच लाये।

प्राण, रिपु के जो हरेगा। नाम अपना, वो करेगा।।

रागिनी गर्ग
रामपुर (यूपी )
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मनोरम छंद
पहला वर्ण गुरु 2,
चरणान्त 122 यगण या 211 भगण

दो अथवा चारों चरण समतुकांत

विषय : चन्द्रिका ( चाँदनी)

चन्द्रिका अल्हड़ सुहाई , दूध से रजनी नहाई ।
इंदु ने भेजा उजाला , दृश्य देखो है निराला ।।

ज्योत्सना जब मुस्कुराई , कालिमा तब थी लजाई ।
रात ने है ओढ़ डाला , चंद्र-तारक का दुशाला ।।

कौमुदी श्रृंगार करके , राह काली पार करके ।
यौवना सी आ गई है , वाह! सचमुच भा गई है ।।

शीत स्नेहिल सुंदरी सी , मोहिनी मनमीत मन की।
पावनी पल पास पाकर , गुनगुनाऊँ गीत गाकर ।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व
लखनऊ उत्तरप्रदेश
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छंद का नाम :- मनोरम
विषय:- भारत के वीर
विधा:- गीत
मापनी-2122 2122


मुखड़ा
शौर्य के उनवान हो तुम।देश के अभिमान हो तुम।।

अंतरा-01
वीरता की तुम निशानी।राष्ट्र को अर्पित जवानी।।
रौद्र की भाषा चुनो तुम।गर्व की गाथा बनो तुम।।

हिन्द की भी शान हो तुम।शौर्य के उनवान हो तुम।।

अंतरा-02
जोर से हुंकार भरकर।रक्त अरि माथे लगाकर।।
वीर राणा सा बढो तुम।साहसी साहस गढ़ो तुम।।

भारती की जान हो तुम।शौर्य के उनवान हो तुम।।

अंतरा-03
आग दिल में हो धधकती।जोश में है जो सुलगती।।
हौंसलों की जीत हो तुम।विश्वविजयी गीत हो तुम।।

इस धरा का आन हो तुम।शौर्य के उनवान हो तुम।।

अंतरा-04
शत्रु का संहार करके।बाजुओं में शक्ति भरके।।
प्राण हत यमराज हो तुम।देश की आवाज हो तुम।।

राष्ट्र का सम्मान हो तुम।शौर्य के उनवान हो तुम।।

अंतरा-05
जीत हो हर बार अपनी।एकता में धार अपनी।।
बोस औ आजाद हो तुम।भगत का अंदाज हो तुम।।

हर हृदय का गान हो तुम।शौर्य के उनवान हो तुम।।

अंतरा-06
दुश्मनों के काल हो तुम।भारती के लाल हो तुम।।
युद्ध में मत हार मानो।है विजय का सार मानो।।

लाडले वरदान हो तुम।शौर्य के उनवान हो तुम।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर
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 मनोरम छन्द

क) आदि गुरु(2)

चरणान्त: 211 अनिवार्य
14 मात्रिक छन्द

ये नैन प्रिय बाट जोहत,संध्या गई रैन होवत।
नैना भरे अश्रु बहावत,आये नहीं तम डरावत।

मैंने किया प्रेम साजन,तू है हृदय प्राण राजन।
द्वारे खड़ी मैं निहारत,आजा पिया मन पुकारत।

सूना लगे आज आँगन,तेरी बनी मैं सुहागन।
देखो पिया प्रेम रोगन,कैसे रहूँ होय जोगन।

बादल घने आया सावन,मेरा हरो कष्ट रूदन।
नैनों बहा रोय अंजन,आ लग गले पीड़ भंजन।

पाया दरस चित्त रंजन,तू कर पिया संग नंजन।
होना नहीं दूर प्रीतम,लागूं हिये बात उत्तम।

जितेंदर पाल सिंह

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मनोरम छंद
१४ मात्रिक छंद,आदी वर्ण गुरु,चरणांत १२२ या २११ अनिवार्य

मापनी-2122 2122

मुखड़ा
मृत्यु भय से जो न डरता,काल बनकर जान हरता।

अंतरा(१)
भाल कुमकुम लाल साजे,हाथ खन खन शस्त्र गाजें।
आँख में चमके सितारे,श्वास धरती माँ पुकारे।
गर्व से है युद्ध करता,काल बनकर जान हरता।।

(२)
शान माता की बचाता,जान अपनी है लुटाता।
आग मन में यूँ लगी है,जाग तू बाँहें सजी है।
शत्रु को ये मार मरता,काल बनकर जान हरता।।

(३)
हाथ में सजता तिरंगा,आज लागे शुद्ध गंगा।
शूर वीरों की कहानी,आज है सब की ज़ुबानी।
ऋण माँ का वीर भरता,काल बनकर जान हरता।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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नोरम छन्द:-
14 मात्रिक छन्द7-7 पर यति
आदि वर्ण गुरु(2)
चरणान्त:- भगण (211)या यगण(122) अनिवार्य
मापनी:- 2122 2122
विषय:- श्याम छवि

नील सागर, गात शोभित,श्याम सुंदर, ह्रदय मोहित,
प्रीत माधव, सुखद पावन,पीर मानस, सकल तारन।
*********************
मोर नाचत, सघन सावन,प्रीत राधा, सुखद पावन,
डोर नैनन, प्रेम बाँधत,मौन तन-मन, रीत लाँघत।
************************
पैर पैजन, मधुर बाजत,देख माखन,मुदित धावत,
छाँव पीपल, बैठ मोहन,रैन आँगन, धेनु दोहन।
***********************
कूक कोकिल, मधुर कूकत,भोर उपवन, गीत गूंजत,
तान मधुरस, मलय घोलत,भानु लालिम, गगन सोहत।
***********************
नेह अनुपम, धवल मूरत,देख मोहन, अतुल सूरत,
केश कुंतल, मधुप श्यामल,श्याम नीरज,चरण कोमल।
***********************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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 मनोरम छन्द
आदि गुरु(2)
चरणान्त: 122 अनिवार्य।

14 पर यति
दो अथवा चारों चरण परस्पर समतुकांत।

जा रहे क्यूँ तुम बताओ,यूँ मुझे तुम मत सताओ।
क्या हुआ कुछ तो सुनाओ,प्रिय नहीं ऐसे रुलाओ।

काज ये तेरा पुराना,नित करो कोई बहाना।
तुम नयन हमसे मिलाओ,सच कहो कुछ मत छुपाओ।

देर से आना तुम्हारा,है दुखाता मन हमारा।
प्रेम को मन से निभाओ,मत सताकर मुस्कुराओ।

नभ घनी छायी घटायें,बूंद बरखा की सुहायें।
ठंडी सी चलती हवायें,खग विहग उड़कर नहायें।

किस तरफ है मन तुम्हारा,प्रेम को देकर किनारा।
प्रीत को हमने संवारा,तोड़ मत प्रिय ये सहारा।

जितेंदर पाल सिंह

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 मनोरम
छंद का विधान:-
 प्रत्येक चरण १४ मात्राएँ,
आदि में गुरु और अंत में १२२ या २११, ३,१०वीं मात्रा लघु अनिवार्य
मात्रा भार : २१२२ २१२२
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विषय:- देश के वीर
विधा:- गीत
चयनित छंद-मनोरम छंद
मापनी-२१२२ २१२२
रस-वीर रस
गा ल गा गा गा ल गा गा

मुखड़ा
जान की बाजी लगाते,खून की धारा बहाते ।
भारतीयों को सलामी ,याद वीरों की कहानी।
खून से लथपथ नहाते।जान की बाजी लगाते।

अन्तरा

लाज रखते हैं तिरंगा,चाल चलते हैं तुरंगा ।
तान सीना चल रहे हैं ,देश को जो छल रहे हैं।
रक्त अरि के वो बहाते ।जान की बाजी लगाते।

मौत सरहद पर खड़ें हैं ,साँस अन्तिम तक लड़े हैं।
मृत्यु चाहे आज आये ,डर नहीं कोई सताये।
नींद अरि की हैं उड़ाते।जान की बाजी लगाते।

गोद माँ की छोड़ जाते ,लाज राखी की बचाते।
वीरता की है कहानी,याद रख उनकी जवानी।
शीश तक अपने कटाते।जान की बाजी लगाते।

वीर गाथा गा रहे हैं ,पार सरहद जा रहे हैं।
वीर चेतक की कहानी ,भारती माँ की ज़बानी।

प्राण हँसकर हैं गँवाते ,जान की बाजी लगाते।

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

-----------------------------------------

वो बुलाती है मुझे ही ,वो सताती है मुझे ही
प्यार जो करती हमेशा ,वो जताती है मुझे ही
🌹
ये बताया है उसी ने ,ये सिखाया है उसी ने
रोज भावों को जगाती ,मन सजाया है उसी ने
🌹
मै रहा नादान ऐसे ,राह हो सुनसान जैसे
गीत सारे ले गई वो ,हूँ खड़ा अनजान जैसे
🌹
है दिलासा जिंदगी ये ,है भरोसा जिंदगी ये
दर्द की दूजी दशा है ,है निभाना जिंदगी ये
🌹
व्यर्थ बातें क्यों करूँ मैं ,राज सारे क्यों कहूँ मैं
हैं सभी अपने यहाँ पे ,तो बहाने क्यों करूँ मैं
🌹
अब कहाँ पर प्रीत वैसी ,जो लगे संगीत जैसी
रोक ले अविराज इनको ,जो लगे मनमीत जैसी
🌹
अरविन्द चास्टा

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 मनोरम छंद
14 मात्रिक छंद , आदी वर्ण गुरु,
चरणांत 122 या 211 अनिवार्य

मापनी -2122 2122

थोप दूजे ,पर न बाते ,काटना रो, रोज राते ,
जो यहां मन ,ह्रदय तोड़ेसब यहां बस,प्रेम छोड़े ।

दूसरे के , घर न ताके,आपना मन, लोग छाके ।
जो यहाँ यूँ ,मीत काटें ,वो सदा यूँ ,स्नेह बाटें ।

मन न दूखे , देख कोई ,सब निभाना , काम कोई ।
यूँ मिलाना , मन यहाँ सब ,देख खुश हो, जाय यूँ सब ।

प्रेम ज्ञानी ,संत से हो ,चाँदनी से , प्रीत अब हो
फूल हो हर ,ओर देखो ,खुश यहाँ हर ,ओर देखो ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर

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मनोरम छंद
14 मात्रा,7-7 पर यति


2122 2122
आदि वर्ण गुरु(2)
चरणान्त-भगण (211)या यगण (122)

राम का संसार सीता, प्रेम का आधार सीता।
रीति रघुकुल की निभाई, वन गए हैं संग भाई।
***************
राधिका के श्याम प्यारे ,नित्य यमुना के किनारे।
बाँसुरी मोहक बजाते ,श्याम राधा को मनाते।
**************
ज्योति जलती ज्ञान की है ,मान अरु सम्मान की है
विश्व का है पथ प्रदर्शक ,देश निज है दिव्य दर्शक।
**************
रूप तेरा है सुहावन ,खिल उठा है आज मधुबन।
प्रेम के खिलते सुमन है ,कर रहे शुभ आचमन है।
**************
है प्रभा का रूप पावन ,पवन चलती नित सुहावन
भानु प्राची मुस्कुराते ,भूमि किरणों से सजाते।

गीता गुप्ता 'मन'
उन्नाव,उत्तरप्रदेश

Saturday, June 13, 2026

हाकलि छन्द Hindi poetry


मानव वर्ण संज्ञा अथवा जाति  छंद,  ये छन्द 14 मात्रिक छन्द हैं। 

हाकलि छन्द

चरणान्त: गुरु (2) अनिवार्य।

दो अथवा चारों चरण परस्पर समतुकांत।

हाकिल छन्द के लिए ज़रूरी है, कि तीन चौकल के बाद एक गुरु(2) हो।

"त्रै चौकल गुरु हाकिल"
नोट: यदि चार चरणों में तीन चौकल न बन पा रहे हों, तो इस छन्द को मानव छन्द कहेंगे।

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सोचो समझो बोलो तब, वाणी पहले तोलो सब ।
मन में ईर्ष्या पालो मत, हिम्मत से तुम हारो मत ।
......
शीतल सा मन रखना तुम, चन्दन सा तन रखना तुम ।
चाहे जितनी विपदा हो , सहना जैसे वसुधा हो ।
......
सूरज बनकर उगना तुम, दीपक बनकर जलना तुम।
संस्कृति पथ पर चलना तुम, गुण की औषधि बनना तुम ।
.......
चमको जैसे मोती हो, धागा माणिक होती हो।
निश्छल मोहन प्यारे थे , राधा को अति प्यारे थे ।
......

सिम्पल काव्यधारा

प्रयागराज

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हाकलि छंद
14 मात्रिक,त्रय चौकल गुरु हाकलि।
*****************************

1-11-19
**********
हाकलि छंद
***********
नीला अंबर देखो तुम, सूरज से कुछ सीखो तुम।
फैला अपनी किरणों को, हर लो धरती के तम को।

तारों की रजनी तुम बन कर, भीगा आंचल फैलाकर।
प्यारी शीतलता देना, तापित मन ठंडा करना।

यात्री हो जीवन पथ के, चलना नित साथी बन के।
यात्रा अनजानी है .... ये, दुनिया पीछे रह जानी ... ये।

मीठी बोली मधु...... होती, पीड़ा नाशक ये ..….. होती।
शीतल जब....…वाणी होती, ज्वाला भी ........…ठंडी होती।

ईश्वर की प्रतिकृति .. ..बन के, जीवन की अनुमति ....बन के।
सांसों को जीना ......... सीखो, मानव बन रहना...... ..सीखो।

राज्यश्री सिंह
स्वरचित मौलिक रचना

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हाकिल छन्द
तीन चौकल के बाद गुरु(2) अनिवार्य
परस्पर दो या चारों चरण समतुकांत


जीवन का पथ है दुर्गम, सुख-दुख का रहता संगम।
संभल कर तुम सब चलना, दुख मिलने पर मत डरना।

मत मन ये कलुषित रखना, कारज मत अनुचित करना।
सुन बतियाँ करता सच्ची, मत समझो यह हैं कच्ची।

मानस को एक कर जानो, आपस में एकता ठानो।
मत बनना तुम उत्पाती, सब अपने जन हैं संघाती।

एक धरती सबकी माता, एक प्रभु है सबका दाता।
एक जल ही सबने पीना, एक सत है सबका मरना।

नीरधि एक सब नदियों का, एक प्रभु ही सबका कर्ता।
एक सधते सब है सधता, क्यूँ दुविधा मन है रखता।

नीरधि-- सागर
जितेंदर पाल सिंह

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 हाकलि छंद

चरणांत २ गुरु अनिवार्य, १४ मात्रिक छंद,

३ चौकल के बाद १ गुरु अनिवार्य ।


अपनी भाषा हिंदी हो। अद्भुत साहित्य सृजन हो।

ये पढ़कर जन ज्ञानी हो। तन मन सारा पुलकित हो।।


सृजनात्मक लेखन होवे। ध्यान मनन पूरा होवे।
लेखन में मौलिकता हो। शब्दों में लौलिकता हो।

आयामों की छाया हो। लेखन कौशल सारा हो।
सब तथ्यों का निरूपण हो। ये साहित्यिक सृजन हो।।

छू जाए जो तन मन को। लिख दो ऐसे चरणों को।
संस्कारों की धारा हो। सच्चाई का नारा हो।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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हाकलि छन्द
14 मात्रिक छन्द
तीन चौकल के बाद एक गुरु(2)

दो दो या चारो चरण समतुकांत
मापनी:-
22 22 22 2

माखन मोहन खावत है, देखत यशुदा धावत है,
मटकी पटकी झटपट है, तेरो कान्हा नटखट है।

पनघट आकर छेड़त है, ऊधम करके खेलत है,
छीना झपटी माखन की, लीला प्यारी मोहन की।

नैनन रसना घोलत री, मधुरस मीठे बोलत री,
गोकुल सँकरी गलियों में, खोई मोहन मुरली में।

राधा झूले झूला रे, कान्हा हमको भुला रे,
खोया राधा नैनन में, नटवर मोरे तन- मन में।

रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर( छत्तीसगढ़)

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हाकलि छंद- 14 मात्रिक छन्द (तीन चौकल अंत में द्विकल अनिवार्य)

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जनता सुधबुध खोई है, सत्ता सचमुच सोई है,

खाने वाला कोई है निर्धन बस्ती रोई है।।


झूठी बातें गढ़ते जब, होते देखा लज्जित कब,
पढ़ना लिखना छोड़ो सब, विकसित गंगा देखो अब।।

देखो पानी बिकता है, महंगा जीवन लगता है,
ठगने वाला ठगता है, सहने वाला सहता है।।

खतरा सबके ऊपर है साँसें लेना दूभर है।।
दूषित जिनसे निर्झर है, उनपर मानव निर्भर है।।

भोले भाले लगते हैं, उल्टी चालें चलते हैं
खींचातानी करते हैं, नेता उनको कहते हैं।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
चिरैयाकोट जनपद- मऊ(उ0प्र0)भारत
दि0-03/112019# 01:00 AM
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हाकलि छन्द
14 मात्रिक छन्द
तीन चौकल के बाद एक गुरु(2)

दो दो या चारो चरण समतुकांत
मापनी:-
22 22 22 2
मेरा माधव नटखट है, रजकण भीतर लटपट है।
करता जोरी खटपट है, केशव कुंतल हर लट है।

मनवा मोहन भावत है, जाने क्या ये चाहत है।
करता खुद को आहत है, हर पल कान्हा ध्यावत है।

नटखट मटकी फोड़त है, पकड़ो तो कर जोड़त है।
लेकर उर कब मोड़त है, माँगूँ तो मुख मोड़त है।

राधै झूला झूलत है, दुनिया दारी भूलत है।
काहे दुनिया खीजत है, जब जब प्रेमी रीझत हैं।

नीलम शर्मा ✍️

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