Saturday, June 13, 2026

हाकलि छन्द Hindi poetry


मानव वर्ण संज्ञा अथवा जाति  छंद,  ये छन्द 14 मात्रिक छन्द हैं। 

हाकलि छन्द

चरणान्त: गुरु (2) अनिवार्य।

दो अथवा चारों चरण परस्पर समतुकांत।

हाकिल छन्द के लिए ज़रूरी है, कि तीन चौकल के बाद एक गुरु(2) हो।

"त्रै चौकल गुरु हाकिल"
नोट: यदि चार चरणों में तीन चौकल न बन पा रहे हों, तो इस छन्द को मानव छन्द कहेंगे।

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सोचो समझो बोलो तब, वाणी पहले तोलो सब ।
मन में ईर्ष्या पालो मत, हिम्मत से तुम हारो मत ।
......
शीतल सा मन रखना तुम, चन्दन सा तन रखना तुम ।
चाहे जितनी विपदा हो , सहना जैसे वसुधा हो ।
......
सूरज बनकर उगना तुम, दीपक बनकर जलना तुम।
संस्कृति पथ पर चलना तुम, गुण की औषधि बनना तुम ।
.......
चमको जैसे मोती हो, धागा माणिक होती हो।
निश्छल मोहन प्यारे थे , राधा को अति प्यारे थे ।
......

सिम्पल काव्यधारा

प्रयागराज

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हाकलि छंद
14 मात्रिक,त्रय चौकल गुरु हाकलि।
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1-11-19
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हाकलि छंद
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नीला अंबर देखो तुम, सूरज से कुछ सीखो तुम।
फैला अपनी किरणों को, हर लो धरती के तम को।

तारों की रजनी तुम बन कर, भीगा आंचल फैलाकर।
प्यारी शीतलता देना, तापित मन ठंडा करना।

यात्री हो जीवन पथ के, चलना नित साथी बन के।
यात्रा अनजानी है .... ये, दुनिया पीछे रह जानी ... ये।

मीठी बोली मधु...... होती, पीड़ा नाशक ये ..….. होती।
शीतल जब....…वाणी होती, ज्वाला भी ........…ठंडी होती।

ईश्वर की प्रतिकृति .. ..बन के, जीवन की अनुमति ....बन के।
सांसों को जीना ......... सीखो, मानव बन रहना...... ..सीखो।

राज्यश्री सिंह
स्वरचित मौलिक रचना

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हाकिल छन्द
तीन चौकल के बाद गुरु(2) अनिवार्य
परस्पर दो या चारों चरण समतुकांत


जीवन का पथ है दुर्गम, सुख-दुख का रहता संगम।
संभल कर तुम सब चलना, दुख मिलने पर मत डरना।

मत मन ये कलुषित रखना, कारज मत अनुचित करना।
सुन बतियाँ करता सच्ची, मत समझो यह हैं कच्ची।

मानस को एक कर जानो, आपस में एकता ठानो।
मत बनना तुम उत्पाती, सब अपने जन हैं संघाती।

एक धरती सबकी माता, एक प्रभु है सबका दाता।
एक जल ही सबने पीना, एक सत है सबका मरना।

नीरधि एक सब नदियों का, एक प्रभु ही सबका कर्ता।
एक सधते सब है सधता, क्यूँ दुविधा मन है रखता।

नीरधि-- सागर
जितेंदर पाल सिंह

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 हाकलि छंद

चरणांत २ गुरु अनिवार्य, १४ मात्रिक छंद,

३ चौकल के बाद १ गुरु अनिवार्य ।


अपनी भाषा हिंदी हो। अद्भुत साहित्य सृजन हो।

ये पढ़कर जन ज्ञानी हो। तन मन सारा पुलकित हो।।


सृजनात्मक लेखन होवे। ध्यान मनन पूरा होवे।
लेखन में मौलिकता हो। शब्दों में लौलिकता हो।

आयामों की छाया हो। लेखन कौशल सारा हो।
सब तथ्यों का निरूपण हो। ये साहित्यिक सृजन हो।।

छू जाए जो तन मन को। लिख दो ऐसे चरणों को।
संस्कारों की धारा हो। सच्चाई का नारा हो।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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हाकलि छन्द
14 मात्रिक छन्द
तीन चौकल के बाद एक गुरु(2)

दो दो या चारो चरण समतुकांत
मापनी:-
22 22 22 2

माखन मोहन खावत है, देखत यशुदा धावत है,
मटकी पटकी झटपट है, तेरो कान्हा नटखट है।

पनघट आकर छेड़त है, ऊधम करके खेलत है,
छीना झपटी माखन की, लीला प्यारी मोहन की।

नैनन रसना घोलत री, मधुरस मीठे बोलत री,
गोकुल सँकरी गलियों में, खोई मोहन मुरली में।

राधा झूले झूला रे, कान्हा हमको भुला रे,
खोया राधा नैनन में, नटवर मोरे तन- मन में।

रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर( छत्तीसगढ़)

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हाकलि छंद- 14 मात्रिक छन्द (तीन चौकल अंत में द्विकल अनिवार्य)

**** **** **** **

जनता सुधबुध खोई है, सत्ता सचमुच सोई है,

खाने वाला कोई है निर्धन बस्ती रोई है।।


झूठी बातें गढ़ते जब, होते देखा लज्जित कब,
पढ़ना लिखना छोड़ो सब, विकसित गंगा देखो अब।।

देखो पानी बिकता है, महंगा जीवन लगता है,
ठगने वाला ठगता है, सहने वाला सहता है।।

खतरा सबके ऊपर है साँसें लेना दूभर है।।
दूषित जिनसे निर्झर है, उनपर मानव निर्भर है।।

भोले भाले लगते हैं, उल्टी चालें चलते हैं
खींचातानी करते हैं, नेता उनको कहते हैं।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
चिरैयाकोट जनपद- मऊ(उ0प्र0)भारत
दि0-03/112019# 01:00 AM
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हाकलि छन्द
14 मात्रिक छन्द
तीन चौकल के बाद एक गुरु(2)

दो दो या चारो चरण समतुकांत
मापनी:-
22 22 22 2
मेरा माधव नटखट है, रजकण भीतर लटपट है।
करता जोरी खटपट है, केशव कुंतल हर लट है।

मनवा मोहन भावत है, जाने क्या ये चाहत है।
करता खुद को आहत है, हर पल कान्हा ध्यावत है।

नटखट मटकी फोड़त है, पकड़ो तो कर जोड़त है।
लेकर उर कब मोड़त है, माँगूँ तो मुख मोड़त है।

राधै झूला झूलत है, दुनिया दारी भूलत है।
काहे दुनिया खीजत है, जब जब प्रेमी रीझत हैं।

नीलम शर्मा ✍️

विजाति छ्न्द Hindi poetry





Explained By Smt Simpal kavyadhara ji Prayagraj (U.P.)

विजाति छ्न्द
नमन साहित्य अनुरागियों ....

बहुत ही हर्ष हो रहा है कि साहित्य अनुरागी ने हमें इस योग्य समझा कि, मैं सिम्पल काव्यधारा प्रयागराज से , आप लोगों के समक्ष अभ्यास व रचना हेतु छ्न्द प्रस्तुत करूँ।

हम मानव वर्ण संज्ञा अथवा जाति के छंदों पर अभ्यासरत होंगे। इस जाति के अंतर्गत 9 छन्द आते हैं, ये सभी छन्द 14 मात्रिक छन्द हैं। प्रत्येक छन्द में चरणान्त के प्रथक नियम हैं। जो निम्नलिखित हैं:---
1.विजाति छन्द--14 मात्रा , आदि  लघु (1) अनिवार्य।
मापनी इस प्रकार 1222 1222
दो अथवा चारों चरण परस्पर समतुकांत।
...........
उदाहरण हेतु अपनी रचना प्रस्तुत कर रहे हैं ।

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महल ऊंचे बनाते थे, बनाकर फिर गिराते थे।
सजाते थे महल सारे , कहां हिम्मत कभी हारे 
......
कभी तब दुख न होते थे , नहीं आंखें भिगोते थे ।
कहीं अब खो गया बचपन , बड़े जब से हुए हैं हम ।
......
अकारण ही झगड़ते थे , अकारण ही बिगड़ते थे ।
नहीं कोई कभी अरि था , सभी के मन बसा हरि था।

सिम्पल काव्यधारा प्रयागराज
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विजात छंद(14मात्रिक)
मापनी-1222 1222
गीत


मुखड़ा

दुखों की मैं विपुलता हूँ। विरह में रोज जलता हूँ।।

अंतरा-01

सदा ही साथ हो तेरा। विलय तुझमें हृदय मेरा।
कदाचित सांझ ढलता हूँ। विरह में रोज जलता हूँ।।

अंतरा-02

कटे कटती नहीं रातें। प्रिये वो प्यार की बातें।
हृदय उठती विकलता हूँ। विरह में रोज जलता हूँ।।

अंतरा-03

नयन दिन-रैन रोते हैं। उनींदी नींद सोते हैं।
सदा करवट बदलता हूँ। विरह में रोज जलता हूँ।।

अंतरा-04

मुझे तुम भूल मत जाना। सदा दिल में शुभे आना।
प्रणय की राह चलता हूँ। विरह में रोज जलता हूँ।।

अंतरा-05

जगत बैरी हुआ अपना। अधूरा ही रहा सपना।
दृगों की मैं तरलता हूँ। विरह में रोज जलता हूँ।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर
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छंद का नाम :- विजात छंद
छंद का विधान:- विजात छंद के प्रत्येक चरण में 14 मात्राएँ होती हैं, अंत में 222 वाचिक भार होता है, 1,8 वीं मात्रा पर लघु अनिवार्य होता है।
1222 1222

सुनो तुमको बताती हूँ, बड़ा जिनको सताती हूँ
1
जिसे देखा नही पहले, मिले आकर यहीं बहने,
हमें अपना बनाती है, गले से भी लगाती है।

कहूँ में क्या भला उनको, लगाया था गले जिनको।
2
हमेशा खिलखिलाते है, हँसी हमपर,लुटाते है,
हमे गुरुवर सदा कहते, नयन जल धार फिर बहते

सदा मैं हक जमाती हूँ, बड़ा उनको,सताती हूँ।
3
बड़ी लगती,हमें प्यारी, बड़ी दिदिया,लगे न्यारी,
गुलाबी गाल है इनमे, व नागिन बाल है जिनके।

रुठे वो तो मनाती हूँ, बड़ा उनको,सताती हूँ।।
4
कहो उपहार क्या दूँ मैं, बला तेरी उतारूँ मैं,
निभाना साथ तुम मेरा, रहें यूँ हाथ सर तेरा।

जहाँ मैं आ न पाती हूँबड़ा उनको सताती हूँ।

रानी सोनी"परी
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विजात छंद
१२२२ १२२२


दुखों को रोज हूं सहती । कहानी एक हूं कहती ।।
अधूरी चाहतें जीती । गरल प्याले सदा पीती।।

सपन होते सुहाने थे। कभी उसके जमाने थे।।
रही सब छोर से रीती। दिवस बीते निशा बीती।।

तके वो राह दिन रैना । थके बोझिल द्वय नैना।।
बसे है कंत चाहों में । न दिखता अंत आहों में।।

करूँ विनती सुनो सजना । पधारो आज तो अँगना।।
चरण रज को पखारूँगी । नयन भर कर निहारूँगी।।

दिशा सारी महक जाए । तनिक आहट अगर पाए।।
मधुर ऐसा समय पाऊं। सजन आये सँवर जाऊं।।

ललिता
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विजात छन्द
आदि में लघु अनिवार्य
14 मात्रिक छन्द, दो अथवा चारों चरण समतुकांत।


चल कहीं दूर मन मेरे,मिल जहाँ जाँय प्रभु तेरे।
सकल झूठा जगत लेखा,कपटधारी फलत देखा।

उपज बैराग मन आया,जिधर देखूं उधर माया।
मिलत सम्मान धन पाया,ह्दय निर्धन जन दुखाया।

मरत भूखे बहुत निर्धन,कृषक मरते करत रूदन।
हरि रचाई जगत लीला,जग पथिक मार्ग पथरीला।

सदगुरू मार्ग दिखलाये,दरस प्रभु प्यास जग जाये।
जपत हरि नाम सुख पाए,सुगम यह मार्ग समझाये।

मरण सत है असत काया,जिधर देखूं हरि समाया।
समझ आयी अमर आत्मा,दरस दिन रैन परमात्मा।

जितेंदर पाल सिंह

2
विजात छंद
(करुण रस) स्थायी भाव: शोक
आदि लघु अनिवार्य


गीत:

मुखड़ा
लगेंगे श्वास जब थकने,चलूँगा प्राण तज अपने।

अंतरा
कि ऐसी रात आएगी,मुझे ऐसा सुलायेगी।
नहीं देखूं कभी सपने,चलूँगा प्राण तज अपने।....टेक

अंतरा
कि आयेंगे सभी बैरी,लिए मन में हँसी गहरी।
दिखावा शोक का करने,चलूँगा प्राण तज अपने।

अंतरा
मुझे नहला सजायेंगे,सभी अर्थी उठायेंगे।
लगेगी तब चिता जलने,चलूँगा प्राण तज अपने।

अंतरा
बने अब राख तन ढेरी,मरण ही है वधू मेरी।
बनाया घर नया प्रभु ने,चलूँगा प्राण तज अपने।

जितेंदर पाल सिंह

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विजात मापनी 1222 1222 विषय :-विरह गीत रस :- शृंगार रस( वियोग)स्थाई भाव रति

(मुखड़ा)


मुझे उसने रुलाया है।बहुत ये मन दुखाया है।।

(अन्तरा 1)

मुझे तो प्यार था, जिससे।मिला संताप ही, उससे।
उसी को मानती थी मैं।उसी को पूजती थी मैं।।

किया उसने पराया है।बहुत ये मन दुखाया है।। (टेक)

( अन्तरा 2)

नहीं भाती , मुझे वर्षा।रही यह और भी, तरसा।
प्रिये से मिल नहीं पायी।सजन की याद है आयी।।

वही हिय में समाया है।बहुत ये मन दुखाया है।।(टेक)

( अन्तरा 3)

लगे हर रात, नागन सी।नहीं लगती सुहागन सी।
अकेली जी नहीं पाऊँ।दुखों में डूब, मर जाऊँ।।

सपन कैसा सजाया है?बहुत ये मन दुखाया है।।( टेक)

(अन्तरा 4)

मुझे इक बार वो मिल लें।खिलें फिर फूल इस उर में।
रखूँ इच्छा यही जिन्दा।गले हो बाँह का फन्दा।।

बड़ा उसने सताया है।बहुत ये मन दुखाया है।।

रागिनी गर्ग
रामपुर( यूपी )

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14 मात्रिक विजात छंद
मापनी
1222, 1222

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मुखड़ा**
सखी कैसे कहूं दिल की,मिटे कैसे अगन मन की।

अंतरा**
पिया मुझसे रहें रूठे,दिखा सपने मुझे झूठे।
बरस ये दृग हुए रीते,मिलन के दिन सभी बीते।
नहीं कोई खबर उनकी,मिटे कैसे अगन मन की।

अंतरा****
जला दीपक निहारूं मैं,पिया का मुख सवारूं मैं।

सजा दीपक जली बाती, दिखाती लौ बढ़ी जाती। 
नहीं समझें पिया मन की।।, मिटे कैसे अगन मन की।

अंतरा****
बहारें भी चिढातीं हैं,दिखा रंगत सतातीं हैं।
हवाओं ने रिझाया है,अभी आंचल हिलाया है।
सखी आंखें सजन पथ की,मिटे कैसे अगन मन की।

अंतरा****
बुलाते हैं भ्रमर मुझको,गुलाबों सा समझ मुझको।
इशारे कर रहीं कलियां,बलम भूले वही गलियां।
जली आशा दुखी तन की,मिटे कैसे अगन मन की।

राज्यश्री सिंह
स्वरचित मौलिक रचना।

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छंद का नाम :- विजात छन्द
छंद का विधान:- प्रत्येक चरण 14 मात्राएँ,1, 8 वीं मात्रा पर लघु अनिवार्य , आदि लघु से, अंत 222
वाचिक भार

मात्रा भार : 1222 1222
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शीर्षक:- प्रिये
छंद/- विजात

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कटीले नैन हैं तेरे, सजीली रैन के घेरे।
प्रणय पल मीत बन जाओ, प्रिये बाँहे भरूँ आओ।।
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खिली हो चाँदनी जैसी, सुवासित कामिनी वैसी।
घटा से केश बिखराओ, जरा सा पास तो आओ।।

सुहानी रात महकाओ, प्रिये बाँहें भरूँ आओ।।
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रसीली रागिनी रातें,हमारे प्यार की बातें।
सुरा मद नैन छलकाना, भिंगो दो मेध बन छाना।

मुदित मन प्रीत भर जाओ, प्रिये बाँहें भरूँ आओ।।
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नशीले नैन में खोना, दिलों में चैन का होना।
मिटे दूरी न शरमाना, सुरीली तान बन जाना।।

मुझे मदहोश कर जाओ प्रिये बाँहें भरूँ आओ।।
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सितारे चाँद से साथी, जले जैसे दिया बाती।
वलय तुम आज खनकाना, मिलन संगीत भर जाना।

मदन मन मीत बन जाओ, प्रिये बाँहें भरूँ आओ।।
रचनाकार
- डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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छंद का नाम :- विजात

छंद का विधान:- प्रत्येक चरण 14 मात्राएँ,1, 8 वीं मात्रा पर लघु अनिवार्य , आदि लघु से, अंत 222

वाचिक भार
मात्रा भार : १२२२ १२२२

विषय :- प्रेम का प्याला
रस :- संयोग शृंगार रस

मुखड़ा

गजब जादू किया बाला , हुआ मैं मस्त मतवाला ।

अंतरा १
नयन से वारुणी दहकी, नशे में रात भी बहकी ।
अधर की थी छुवन ऐसी , अगन की हो तपन जैसी।।

गले में हाथ की माला , हुआ मैं मस्त मतवाला ।। टेक

अंतरा २

कभी होता नहीं है गम , कि जब तू साथ हो हमदम ।
तुम्हारा रूप यूँ झलके , कि आई अप्सरा चलके ।।

प्रभू ने देख के ढाला । हुआ मैं मस्त मतवाला ।।

अंतरा 3

हुआ मुस्कान का कायल , अभय का दिल हुआ घायल।
सजा दूँ मांग मैं तेरी , तुम्हीं जीवन प्रिये मेरी ।।

मिला मधु से भरा प्याला । हुआ मैं मस्त मतवाला ।।

अभय कुमार आनंद
बांका बिहार व
लखनऊ उत्तरप्रदेश

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विजात छन्द (14 मात्रिक
मापनी 1222,1222
पदान्त---में

समान्त---आली
विधा---गीतिका

अमावस रात काली में। जले दीपक दिवाली में।1

बिका जीवन मगर देखो, रुका सौदा दलाली में।2

खुशी का पर्व आया है, सजाओ दीप थाली में।3

दिलों को जीतकर देखो, लगे है प्यार गाली में।4

किरण छूकर सुमन खिलते नया उत्साह आली में।5
आली-- भ्रमर

अंशु विनोद गुप्ता
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विजात छंद (14 मात्रिक छन्द-आदि लघु अनिवार्य)
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समय ने जब सताया है, 
हुआ अपना पराया है,
यहाँ जो सच दबाया है,असत उसने बढ़ाया है।।

बुरा हूँ मैं कहा कैसे,तुम्हें ऐसा लगा कैसे,
तुम्हारे बिन बता कैसे,रहूँ जीवित भला कैसे।।

यहाँ दीपक जलाओ तुम,अँधेरा सब मिटाओ तुम,
दुखी मन को हँसाओ तुम,सभी से हिय मिलाओ तुम।।

न पीछे पग हटायेंगे,सदा आगे बढ़ायेंगे,
घुसे अरि को भगायेंगे,लहू उसका बहायेंगे।।

भले हो तुम दिखाना है,कई रिश्ते निभाना है,
यही जीवन बिताना है,यहाँ किसका ठिकाना है।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
चिरैयाकोट, जनपद-मऊ(उ0प्र0)भारत
दि0-02/11/2019

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 विजात छंद ........१४ मात्रिक छंद,आदि और ८ वी मात्रा लघु ,
मापनी...१२२२ १२२२


(मुखड़ा)
सजन की याद तड़पाती, कसक उर में जगा जाती।

(अंतरा) १
सभी को छोड़ के आई,पिया के नेह में छाई।
सुरीला राग मन मोहे,मधुर सरगम मुझे सोहे।

कभी मन में सिहर आती,कसक उर में जगा जाती।


लगूँ गजगामिनी सी मैं,चमकती दामिनी सी मैं।
मुझे कब भूल सकता तू ,खयालों में सिमटता तू।

लिखूँ मैं प्रेम की पाती,कसक उर में जगा जाती।

3
अधर की प्यास बढ़ जाए,मिलन के गीत ये गाए।
कभी ये पास लाती है,कभी धड़कन बढ़ाती है।

अगन ज्वाला नहीं भाती,कसक उर में जगा जाती।

........सुवर्णा परतानी.......
.......... हैदराबाद...........

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विजात छंद

सम चरण तुकांत


छटा उपवन निखर जाए, खुला सावन बरस जाए।



अगर तुम्ह हो प्रिये पहलु , सभी वादे निखर जाए।।  1


बता दूँ राज ये तुम्ह को, मुझे प्यारा नही कोई।

सिवा तेरे नही दूजा, खयालों में कहीं कोई।।   2


कुसुम कुसुमित अदा तेरी, लरजते होंठ की लाली।

भुला बैठा सफर को में, निगाहें प्यार की डाली।।   3


चलो फिर आज हम मिल कर, सुहाना गीत वो गाएँ।

खिले तन- मन मिलन ऐसा, तराना प्यार का गाएँ।।  4


किया श्रृंगार सोलह है ,गुलाबों की महक ले कर।

लगे कोई कली जैसे ,हुआ हूँ धन्य में छूकर ।।  5


मचाती शोर ये कितना, तुम्हारे पाँव की पायल।

मुझे बेचैंन करती है, हुआ ह्रदय फिर घायल।।  6


चलो जब जब लचकती है , कमर तेरी नजर अटके।

मचलता ज्वार है मन में, कभी जोगी बदन भटके।।  7


चले सांसे लगे ऐसा , बजे सुर सप्त सरगम के।

सुषिर हो वाद्य ये कोई , सुने हम साथ हमदम के।।  8


कहें खुल कर सुनें अनहद , इडा सुर पिंगला दोनों।

मगन हो कर मदन रस में, भुला दू ये जहाँ दोनों।।  9


लगे उपमा सभी छोटी, सजी श्रृंगार हो ऐसी।

कहूँ अब छंद या गजलें, रसों की धार हो ऐसी।।   10


लिखू अब ओर क्या ऐसा,हुवा मदमस्त मतवाला।

कहूँ अविराज ये मानो, चढ़ा ली प्यार की हाला।।  11


 *अरविन्द चास्टा 'अविराज'
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सखी छंद HINDI POETRY


सखी छंद  
मानव जाति के १४ मात्रिक छंद जो कि कुल ९ हैं 
जिसमें से आज से आने वाले अगले पोस्ट तक हमलोग  सखी  छंद का अभ्यास कर रचना करेंगे जो निम्नलिखित हैं :-
क) कुल मात्रा १४ ,चरणान्त २२२(मगण) (गुरु गुरु गुरु) या १२२(यगण) (लघु गुरु गुरु) अनिवार्य
ख) दो-दो चरण परस्पर समतुकांत।
ग) १४ वीं मात्रा पर यति
घ) सहूलियत के लिये आप निम्न मापनी ले सकते हैं:-
१२२२ १२२२
२१२२ २१२२
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सखी छंद
चरणान्त १२२
देश जब भी जागता है , देख दुश्मन भागता है ।
आँख आगे जो उठाता , मृत्यु अपनी ही बुलाता ।।

हर तरफ जय गान देखो , देश का सम्मान देखो ।
होश भी है जोश भी है , जंग का उदघोष भी है ।।

नीर संचय कर रहे हैं , भू सुधा से भर रहे हैं ।
पेड़ पौधे मुस्कुराए , हैं कृषक भी गुनगुनाये ।।

अब फसल हैं लहलहाती , खेत हरियाली सुहाती ।
हैं सड़क भी चमचमाती ,स्वच्छता शोभा बढ़ाती ।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर बांका बिहार व
लखनऊ उत्तरप्रदेश
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सखी छंद 14 मात्रिक
पदांत 222 मगण वाचिक भार , सम चरण तुकांत।
🌹
कहाँ जाऊँ बता दो ये जहाँ कोई मिले अपना ।
मुझे विश्वास इतना ही कभी पूरा सजे सपना।।
🌹
खिले थे फूल बगिया में, वहीं थे शूल उस पथ में।
गया हूँ भूल पुष्पों को, मगर है वो चुभन हिय में।।
🌹
सुनी है आज भी मैने, खनक पायल जहाँ टूटी।
खड़ा हूँ आज भी वैसे, जहाँ पर प्रीत थी छूटी।।
🌹
जमी है धूल दर्पण पे, छवि धूँधली नजर आती।
रहो थामें मुझे प्रियतम, तुम्हारी याद तड़पाती।।
🌹
मिलो खुल कर कभी हमसे, यही अविराज कहता है।
तुम्हारे साथ रहने से , हमेशा प्यार बढ़ता है।।
🌹
अरविन्द चास्टा
कपासन, चित्तौड़गढ़ ,राज.

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सखी छन्द(14मात्रिक)
चरणान्त: यगण(122) फिर यति
परस्पर दो या चारों चरण समतुकांत


सुनो बात सखी कहूँ जो, गयी रात नहीं सकी सो।
सखा सोच समझ बनाना, नहीं प्रीत कहीं लगाना।

कि परदेश पिया हमारे, गए छोड़ बिना सहारे।
विरह अग्नि जलूँ मरूँ रे! सुनो पीड़ तुम्हें कहूँ रे।

मुझे युक्ति सखी बताओ, पिया संग मुझे मिलाओ।
प्रणय बंधन है पिया से,डरे है पगला जिया ये।

अरे भेज भतार पाती, लिखो जो मनवा सुहाती।
बड़ी दूर किया ठिकाना, नहीं और हृदय दुखाना।

करूँ निसदिन मैं प्रतीक्षा, मिलो आन अपार इच्छा।
सुनो साजन लौट आओ, नहीं और मुझे सताओ।

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सखी छन्द(14मात्रिक)
चरणान्त: मगण(222) फिर यति
परस्पर दो या चारों चरण समतुकांत


प्रेम मिलकर निभाएंगे, घर पिया का बसायेंगे।
सुरमई सांझ आयी है, प्रीत संदेश लायी है।

दुख बीते भुलायेंगे,साथ जीवन बिताएंगे।
रात दिन संग तेरा हो,हाथ में हाथ मेरा हो।

स्वप्न सुंदर सजायेंगे,हम नहीं अब सतायेंगे।
साथ मेरा नहीं छूटे,डोर प्रीतम नहीं टूटे।

राम जी हैं बने साक्षी,हम हुए प्रीत आकांक्षी।
मेहँदी हम रचाएंगे,नववधू रूप धारेंगे।

माँ पिता मिल विदा देंगे,धर्म अपना निभा देंगे।
हर सखी छूट जायेगी,याद सबकी रुलायेगी।

जितेंदर पाल सिंह

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सखी छ्न्द
14 मात्रा , चार चरण , दो दो या चारो चरण समतुकांत , अंत 222 या 122
यहां 122 लिया गया है

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लहराओ चलो तिरंगा ,चल लेकर ध्वज तुरंगा ।
पहले ये धर्म निभाओ,शहीद का मान बढ़ाओ ।
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चलो सजी लेकर थाली,दीपक जले स्नेह वाली।
तिलक सजे मस्तक रोली ,चली बहन की फिर टोली।
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आज भाई दूज आया,मन में फिर उमंग छाया।
भाभी भी खुशी मनाए ,सखी जैसी ननद पाए ।
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करूं स्नेह वन्दन भैया,माथ लगा चन्दन भैया।
दूज पर्व पावन प्यारा,इसे मनाए जग सारा।
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सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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सखी छन्द 1222 1222 या 2122 1222 कहाँ जाऊँ बता मैया,कहाँ मेरा ठिकाना है। पराया धन मुझे कहते,विदा कर भूल जाना है। कहूँ कैसे तुझे माँ मैं,सताते हैं जलाते हैं। मिले लोभी मिले पापी,मुझे सारे रुलाते हैं। कभी कहते वहाँ जाओ,जहाँ से तू चली आई। भला कैसे चली जाऊँ,वहाँ फिर जिस गली आई। बनी है बोझ बेटी क्यों,जहाँ बेटा खजाना है। बना दस्तूर दुनिया का, हमें ये भी निभाना है।


रानी सोनी 'परी

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सखी छंद (14 मात्रा)
मापनी-1222 1222

कहाँ माँ को भुला पाते,हृदय से हम अभी साथी।
निवाला हाथ से खाते,अमिय पल थे कभी साथी।

सदा ही गीत हैं गाते, सुने थे जो सभी साथी।
सुखद अनमोल वे नाते,कि जीवित है तभी साथी।


बड़ी अनमोल थी लोरी,सुनाती थी हमेशा माँ।
मृदुल सम्बन्ध की डोरी,बनाती थी हमेशा माँ।
करे वो पीर की चोरी,हँसाती थी हमेशा माँ।
दिखा कर वह कभी छोरी,चिढ़ाती थी हमेशा माँ।

हृदय जो तोड़ते जाते,सदा दुख ही यहाँ पाते।
दुखी कर छोड़ते जाते,बददुआ ही यहाँ पाते।
सभी मुँह मोड़ते जाते,सजा प्रतिपल यहाँ पाते।
हृदय जो जोड़ते जाते,सफलता ही यहाँ पाते।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर
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सखी छंद- (14 मात्रिक छन्द)
चरणान्त- यगण ( लघु गुरू गुरू) 122

मत किसी का मन दुखाओ, प्रेम के बस गीत गाओ,

अब मिलन की छवि सजाओ, मीत बनकर पास आओ।।
तुम बुलाओ मैं रिझाऊँ, रूठ जाओ जब मनाऊँ,
बोलना मत दूर जाऊँ, पास जब तुमको बुलाऊँ।।

आग जीवन हो कि पानी, मृत्यु ने कब हार मानी,
बात क्यों करनी पुरानी, चल नई गढ़ दें कहानी।।

पुष्प हर्षित का खिलायें, द्वेष को हिय से मिटायें,
दीप चल ऐसा जलायें, इस धरा से तम भगायें।।

हम नदी के दो किनारे, एक दूजे के सहारे,
तुम रहो हर क्षण हमारे, हम रहें प्रतिपल तुम्हारे।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
चिरैयाकोट, जनपद - मऊ(उ0प्र0)भारत
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 सखी छन्द
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14 मात्रिक छन्द

अंत 222 (गुरु गुरु गुरु)
या 122( लघु गुरु गुरु) अनिवार्य
कुल चार चरण
दो दो या चारो चरण समतुकांत
शीर्षक- सुदामा कृष्ण

द्वारिका महल आये सुदामा, पूछत मधुसूदन धामा,
नाम सुनत मोहन धाए,देखत मित्र गले लगाए।

आसन सिंहासन बिठायो, देख हरिहर शीश झुकायो,
नैनन अश्रु सों चरण धोए,हाल मित्र देख प्रभु रोये।

पैर निज वस्त्र से सुखाए,दोस्त पद नैन से लगाये,
पोछत कान्हा पग छाले,पैर से कंटक निकाले।

पोटली छुपाय सुदामा,देखत कृष्ण मित्र अभिरामा,
पोटली प्रभु खींच लीन्ही,भावज मधुर भेंट दीन्ही।

दो मुठ्ठी भर मोहन खाये,तीसरी मुठिका उठाये,
रोक रुक्मणि कर मुस्काई, भावज सबको भिजवाई।

रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)