Saturday, June 13, 2026

लीला छन्द Hindi Poetry


Explained By  Mr. Jitender pal singh ji


लीला छन्द

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आदित्य जाति की पिछली कड़ी में हमने तोमर, तांडव और नित छन्द का अध्यन और इन पर आधारित रचनाओं का सृजन करना सीखा। इसी कड़ी में आज हम लीला छन्द के बारे में जानेंगे। आदित्य जाति के छंन्दों के 233 भेद हो सकते हैं। कुछ मापनी हम यहां अभ्यास हेतु दे रहे हैं। चरणान्त जगण अनिवार्य है।




चरणान्त के नियम को ध्यान में रखते हुए रचनाकार कोई भी 12 मात्रिक मापनी ले सकते हैं। दो चरण परस्पर अथवा चारों चरण समतुकांत।

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लीला छन्द
चरणान्त: (121)जगण
दो चरण परस्पर समतुकांत या चारों समतुकांत

12 मात्रिक

मन भरमाये अपार, यह जग लीला अँधार।
सद्गुरु जब हों कृपाल, ज्ञान जगे तब कपाल।

ईश्वर है अति उदार, दुर्मति अपनी सुधार।
व्यर्थ नहीं जाय जन्म, नाम जपो तज कुकर्म।

सुन मन मैला सँवार, कर उजला मत नकार।
तूँ कर आत्मिक विकास, मिट मन की जाय प्यास।

अब मन आधार नाम, नित जप कर जोड़ राम।
नाम भगाये विकार, सुनकर मन की पुकार।

उर हरि धारे निवास, होय नहीं मन उदास।
कर्म तजो सब अशुद्ध, हरि कर देंगे प्रबुद्ध।

जितेंदर पाल सिंह
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लीला छंद
१२ मात्रिक छंद
विषय -मीत


होते मीत सब खास , करते है जिगर वास ,
जग में है दिवस चार , जीवन में दुख हजार ।

होता हरदम लगाव , देता है वह सुझाव ,
आता है बहुत काम , लेता है न वह दाम ।

कोई हो जब न पास, उससे ही परम आस ,
मन होता कब उदास , करता मीत न निराश ।

जग में है वह करीब , अंदर से बहुत गरीब ,
उस पर है सदय मान , करता कब वह गुमान ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर
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आदित्य जाति का लीला छंद।
लीला छंद*********
12 मात्रिक, अंत 121

********************
आज दिन हुआ महान, नापते विहग विहान ।
मैं खड़ी बनी अजीत‌ , हो रही सभी सुजीत ।

प्राण आज हैं नवीन, शांत मन बड़ा प्रवीण।
ले रही नदी बहाव, बढ़ रहा विचार भाव

भानु का चढ़ा प्रकाश, शक्ति का हुआ विकास।
कर लिया वशी अकाल, देख दिशा, मति , सुकाल।

अविवेक बना अतीत, बुद्धि बल बनें सुगीत।
बढ़ रही‌ आज सुप्रीत, मिट रहीं सभी कुरीति।

जागता रहे प्रबोध। झूठ का करो विरोध।
संत बन रहो रहीम। काम भी बनें कबीर।

राज्यश्री सिंह
स्वरचित मौलिक रचना

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12 मात्रिक , दो दो चरण तुकांत या चारो चरण समतुकांत , चरणांत 121
छ्न्द लिखो कर प्रयास,सीख करो निज विकास।
शब्द लिखो कर विचार,काव्य रचो सब अपार।
.....
ज्ञान करे जब प्रकाश,जड़मति का होय नाश।
सब जन होयें सुजान,कीर्ति मिले यश महान।
.....
लेख अथक हो सुभाष ,फैल रहा जग प्रकाश ।
आज नया शुभ प्रभात ,भोर खिले हैं सुपात ।
......
छोड़ बनूं जड़ सुजान,कीर्ति मिले यश महान।
सांझ सुबह कर प्रणाम,सूर्य चमकता विहान ।
......
संस्कृति में हो सुधार ,आए हिंदी निखार ।
सृष्टि करे अब पुकार,सीख रहे अब लकार ।

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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लीला छंद- (12 मात्रिक छन्द)
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मन में हो लाख पीर,मत हो जाना अधीर,
अब चाहे होय देर,पर आगे है सवेर।।

अब होते क्यों उदास,कर लो थोड़ा प्रयास,
मिट जायेगी थकान,जब देखोगे विहान।।

करते हों जो प्रहार,तज दो ऐसे विचार,
कर मीठी बात चार,सुख पाओगे अपार।।

बनते हैं वो महान,पर रोते हैं किसान,
सब खाली नौजवान,बस देखें आसमान।।

उसके झूठे सुकाज,जब सोचेगा समाज,
अपने वो आसपास,फिर ढूंढेगा विकास।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
चिरैयाकोट जनपद- मऊ (उ0 प्र0)भारत

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लीला छंद
पदांत 121
🌹
तुझको देख कर पास,भागा है मनस त्रास।
सुखों की लगी कतार,रोम रोम हो पुकार।
🌹
आशान्वित था सुधार,जाने कब हो बहार।
जब हुआ प्रणय प्रहार,अपलक रहता निहार।
🌹
लौटा फिर है अतीत,होने लगता प्रतीत।
हाल मिटे हैं अभाव,ये तेरा है प्रभाव।
🌹
अब मत करना विचार,बरसती रहे फुहार।
आया ऐसा सुयोग,हो गया सफल प्रयोग।
🌹
छंद से हुआ जुड़ाव,मुक्तक से है दुराव।
कैसी लीला अपार,लेखन का है सुधार।
🌹
 अरविन्द चास्टा

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लीला छंद
पदांत १२१
विषय : किसान

देख हिंद का किसान ,मन हुआ लहू लुहान ।
तन बना हुआ मशीन ,गत फिर भी दीन-हीन ।।

हल उठा डटा महान ,हिला पड़ा जान-प्राण ।
हल करे कौन हिसाब ,विचित्र है कृषक किताब ।।

कर्ज का खड़ा पहाड़ ,सुने सेठ का दहाड़ ।
तन बस बचा है हाड़ ,बिलख रहा वक्ष फाड़ ।।

सो गया देख जमीर ,अमीर ही हैं अमीर ।
ईश भी नहीं उदार ,कृषक घर दिये उजाड़ ।।

तापमान है अपार ,बरसती नहीं फुहार ।
खत्म हुआ कारबार ,बंद अब सारे द्वार ।।

अभय कुमार आनंद

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लीला छन्द
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चरणान्त जगण (१२१)अनिवार्य

दो या चारो चरण समतुकांत
विषय- दीपोत्सव

ज्योतिर्मय हो नव दीप, माणिक बने मन सीप,
तामस मिटे घन घोर, दीपक जले हर ओर।
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दीन दुखियों के द्वार, बाँट खुशियाँ हर बार,
रोशन करो मन प्रीत, प्रेममय सुमधुर गीत।
*******************
सुखमय करो हर काम,पीर हर लो बिन दाम,
काली अमावश रात,घन तिमिर को कर मात।
*********************
प्रज्ज्वलित हो शुभ दीप, भाव उज्जवलित प्रदीप,
मंगलमय सकल काज, विजय पथ सफल आज।
********************
आगमन राम निवास, राज दरबार सुवास,
तोरण सजे सब द्वार, दीपमणिका बन हार।।
******************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर, छत्तीसगढ़



नित छंद Hindi poetry




••••••••••नित छंद••••••••••••••
आदित्य जाति या वर्ण संज्ञा  छंद  है।
 छंद 12 मात्रिक है। छंद के दो परस्पर चरण समतुकांत या चारों सम तुकांत होंगे।


इस जाति के 233 भेद हो सकते है।
इसके चरणांत में नगण (111) अथवा लघु गुरु (12) अनिवार्य रखकर रचना लिख सकते है ।
कथित अनुवार्यता को ध्यान में रखते हुए रचनाकार अपनी सुविधानुसार मापनी ले सकते है।




नित छंद

12 मात्रिक पदांत लघु गुरु


🌹
आज तुझको दूँ भुला, फल मुझे जो है मिला।
विवशता की है घड़ी, आँसुओ की है लड़ी।।
🌹
अब कहाँ पर प्रीत है, बिक चुके वो गीत है।
क्या यही बस रीत है, ये तुमारी जीत है।।
🌹
देख कर मैं सोचता, केश अपने नोंचता।
क्या कमी बाकी रही, व्यर्थ ही विपदा सही।।
🌹
याद है सौगन्ध वो, प्यार की मद गन्ध जो।
दे गई धोखा मुझे, याद हो शायद तुझे।।
🌹
तीव्र वो बरखा जहाँ, रात कब ठहरी वहाँ।
खो गई वो बात भी, वो अँधेरी रात भी।।
🌹
पृष्ट जो फाडे कभी, दी जला सब याद भी।
आह मन है भर रहा, हूँ खड़ा अब भी वहाँ।।
🌹
तुम वही हो प्रियतमा, है मुझे अब भी गुमाँ।
अन बुझी सी प्यास हो, हाँ हृदय के पास हो।।
🌹
अरविन्द चास्टा

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 नित छंद

12 मात्रिक,अंत लगा=1 2 ‌अनिवार्य ।





प्रेम पाश बांध चले, बीत राग सांझ ढ़ले।
रंग राज छोड़ दिया, ईश नेह मोह लिया।
****************

लोभ,क्रोध,मोह तले, बस जगत विहार पले।
प्रीति गीत आज सजे, रोग,शोक, काम तजे।
*******************

जग गया विवेक जहां पल गया विमोह ‌वहां।
पाप कर चला जितना, पुण्य तू कमा उतना।
*******************

जन्म ले न ले अगला, तू चुका रहा पिछला।
कौन है यहां अपना, देखता निरा सपना।
****************

रोज सांझ बीत रही, रात की कुजीत खरी।
तेल संग दीप जले, अंध को सहेज तले।
******************
राज्यश्री सिंह
गुरुग्राम

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नित छंद.......

१२ मात्रिक छंद ,अंत (१२) या (१११) से अनिवार्य।





भ्रूण हत्या मत करो, भाग इसका मत हरो।
जान सस्ती क्यू लगे ? सोच न्यारी कब जगे?।

बात को समझो जरा, चीख जाएगी धरा।
वक्त मुट्ठी में नहीं, हार जाए तू कही।।

होती है बेटी परी, आन होती ये खरी।
ध्यान से जो सोचते, शान से तब बोलते।।

फूल आँगन में सजे, गीत पावन है बजे।
मोल बेटी का खरा, होय ये जीवन हरा।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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नित छ्न्द

12 मात्रा ,चार चरण , दो दो या चारो चरण समतुकांत , अंत 12 या 111 अनिवार्य

.......
राम जयति घोष हुआ , जय जय उदघोष हुआ ।
मस्तक अभिषेक हुआ , राज्य सकल एक हुआ ।
....
एक वर्ष मात कहां, प्रश्न किया घात वहां।
शब्द जहर बोल गया, बात हिये खोल गया।
.......
राज्य अवध कांप गया, सीता परित्याग किया।
राम प्रिये रोय रहीं , मात विकल होय रहीं।

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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 नित छन्द

चरणान्त: लघु गुरु(12)

दो चरण परस्पर समतुकांत या चारों समतुकांत
12 मात्रिक

नैनन नीर तब बहे, बोल कटु मुझे कहे।
चौखट पर खड़े खड़े, माँग दहेज पर अड़े।

बाँह छुड़ा चले पिया, ब्याह दहेज से किया।
लालच मन बड़ा चला, प्रेम नहीं मुझे छला।

स्वार्थ भरे चलें सभी, लोभ रचे बसे तभी।
मेल ह्रदय बना नहीं, लूट मचे मिले कहीं।

पारब्रह्म करे भला, सत्य मुझे पता चला।
त्याग दहेज या मुझे, बात सुनो कहूँ तुझे।

वस्तु नहीं बनूं कभी, प्रेम निस्वार्थ हो तभी।
हाथ पकड़ चलूँ अभी, लाज सहेज लो सभी।

जितेंदर पाल सिंह
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नित छंद
12 मात्रिक पदांत लघु गुरु

विषय : बेटी की व्यथा

माँ तुम क्या सोचती , मन को व्यर्थ कौसती ,
अब सोचो न तुम यही , बेटी अब रहे सही ।

अत्याचार क्यो करे , मन में रोष क्यो धरे ,
अपनी सोच हो खरी , बेटी है सदा परी।

माँ यूँ आज साथ दो , जीवन राह हाथ दो ,
मन कोई न खोजता , जग में कौन सोचता ।

माँ तुम ही सखी रहो , दुख अब क्यों यहाँ सहो ,
बेटी अब सदा सुखी , घर में हो सदा खुशी
रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर

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नित छन्द

चरणान्त: नगण(111)


दो चरण परस्पर समतुकांत या चारों समतुकांत


12 मात्रिक



कर लूँ बंद मैं पलक, अश्रु जाएं नहीं छलक।
मन में पीड़ है बहुत, दुख में मैं रहूँ प्रयुत।

अब ताने कसे जगत, प्रिय तूँ जो नहीं मिलत।
विरहा अग्नि में जलत, मन मेरा नहीं लगत।

जब से हम हुए पृथक, तब से मन रहा भटक।
मुझपर थी तनी भृकुटि, बिन किसी भतारत्रुटि।

कुछ हमसे हुआ उलट, फिर कैसे रहें निकट।
घर की जब बढ़ी कलह, बिखरे सबमिटानिलय।

कुछ तुम भी करो जतन,अपना हो पुनः मिलन।
मिट जाएं सभी भरम, मिलकर हों सुखी परम्।

जितेंदर पाल सिंह

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तांडव छंद Hindi poetry




•••••••••तांडव छंद•••••••••••••
 आदित्य जाति या वर्ण संज्ञा  छंद ।छंदो के दो परस्पर चरण समतुकांत या चारों सम तुकांत होंगे।

इस जाति के 233 भेद हो सकते है।
इसके चरणांत में जगण (१२१) अनिवार्य है। कथित अनिवार्यता को ध्यान में रखते हुए रचनाकार अपनी सुविधानुसार मापनी ले सकते है।

तांडव छंद.......

१२मात्रिक छंद ,अंत में १२१ अनिवार्य




लटक मटक चलत नार, मचल मचल लहर पार।
बहक बहक मदन चाल, उलझ उलझ चटख हाल।।

पलक झपक कमल नैन, बसत अधर अमन चैन।
महक भरत सरस साँस, करत सतत अलग आस।।

उठत अगर लहर प्रीत, नयन बनत करम गीत।
करम अगर चरम होय, परम जगत कलह खोय।।

बहत पवन दमक चाल, लहर उठत चमक गाल।
परख लगन उठत आग, भड़क उठत सजन राग।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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तांडव छ्न्द
12 मात्रा , चार चरण , दो दो या चारो चरण समतुकांत ,अंत 121 अनिवार्य



हैं मात पिता महान, रखते सबको समान ।
है सृष्टि यही प्रगाढ़, मत गर्भ कभी बिगाड़।
.....
इन पर मत कर प्रहार, बेटी करती पुकार ।
बेटी बहुएं शिकार , दिखता इनमें विकार ।
.....
बढ़ता यह दुष्प्रभाव , बढ़ता यह कुप्रभाव।
अब रोक प्रथा दहेज, संस्कृति ही है दहेज ।

......
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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 तांडव छन्द
चरणान्त में जगण(121) अनिवार्य।
12 मात्रिक छंद

दो अथवा चारों चरण समतुकांत


कलयुग पसरा प्रचंड, अब मानवता विखंड।
भरपूर भरे विकार, दूषित मनवश गँवार।

संस्कार दिये बिसार, भूले सब प्रेम प्यार।
मांबाप हुए पराय, अब वृद्ध नहीं सुहाय।

नारी घर ब्याह लाय, तांडव कर वो नचाय।
पसरी अब कूटमार, घर बीच उठी दीवार।

नाते सब तार तार, टूटा मन रोय हार।
स्त्री प्रेम करे भतार, सबको मन से नकार।

भाई सब दूर दूर, व्यवहार कठोर क्रूर।
ममतामय मात रोय, वृद्धा सब साथ खोय।

जितेंदर पाल सिंह
शब्दार्थ
भतार- पति
विखंड-टुकड़ों में विभाजन

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तांडव छंद

चरणान्त में जगण (१२१) अनिवार्य ।
दो अथवा चारों चरण समतुकांत ।
विषय - समय महान

जब समय करे महान , खुद तब करता सुजान ,
तब अनुपम हो जहान , मत कर अब लोभ मान ।

देख समय को गरीब , जान न अब यूँ करीब ,
ले कर अब तूँ विचार , बात न कर तू हजार ।

दे मत अब यूँ बखान , कर झटपट तू निदान ,
खोल मन यहाँ सुधार , ले न अब यहाँ उधार ।

मन कर अब तू तुषार , सब मिल कर जग सँवार ,
मत सुन अब तू कहार , अंदर अब मन पुकार ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर

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तांडव छन्द*******
12मात्रिक छन्द
121 चरणान्त अनिवार्य



घन तिमिर सघन विशाल, सलिल थिरकत हिम भाल।
पवन सुरभि तन लुभाय, शिशिर शरद सुखद आय।
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गरजत जलज घनघोर, प्रकृति सुभग चित चोर।
द्युति चम चमक परिधान, जल करत गिरि रसपान।
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कुसमित महकत उद्यान, सुरमय भ्रमर मृदुगान।
चपल पथिक प्रणय राग, सुमन सुरभित अनुराग।
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मद अधर कमल कपोल, मन मदन करत किलोल।
टप टप मधुरस भिगोय, जब नयन नयन डुबोय।
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रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़



तोमर छंद Hindi poetry


Explained By Smt . Suvrna Partani ji  

••••••••••• तोमर छंद ••••••••••••
आदित्य जाति या वर्ण संज्ञा छंद  है।सभी छंद 12 मात्रिक है। छंदो के दो परस्पर चरण समतुकांत या चारों सम तुकांत होंगे।

इस जाति के 233 भेद हो सकते है।
इसके चरणांत में गुरु लघु (२१) अनिवार्य है । कथित अनिवार्यता को ध्यान में रखते हुए रचनाकार मापनी सुविधानुसार 

१२ मात्रिक छंद, अंत में गुरु लघु (२१) अनिवार्य,


.............

बरखा तेरी फुहार, तन-मन करती प्रहार।
प्रियतम मद में अधीन, रैना होवे विलीन।।

लागे जीवन विरक्त, जब तन होते विभक्त।
भावों में हो उछाल, मन में छाए मलाल।।

बंधे कैसे सुभाग, नातों में जब सुराग।
श्यामल नभ सी दबंग, बिजली कौंधे मलंग।।

ज्वाला भड़के अकाल, प्यासा मन है निहाल।
कोमल मन है अबोध, मत कर बरखा विरोध।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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तोमर छंद
12 मात्र पदांत गुरु लघु 21

🌹
आओ यहाँ पे आज, देखो बजे हैं साज।
मन में नही हो द्वेष, मिट जाय सारे क्लेश।।
🌹
विधना दिया उपहार, करती धरा श्रृंगार।
दिखते सभी हैं रंग, रहते सभी मिल संग।।
🌹
फौजी बढ़ाये मान, निज देश का सम्मान।
हमसे सदा है प्यार, करते बड़ा उपकार।।
🌹
जो ले सकें आशीष, आओ झुकायें शीश।
माँ भारती को आज, बिगड़े बने सब काज।।
🌹
मन में यही है आस, हमको यही विश्वास।
छू ले शिखर ये देश, है शांति का सन्देश।।
🌹
अरविन्द चास्टा
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मात्रिक छंद
तोमर छंद
पदांत गुरु लघु २१

विषय - प्रेम रस

मतवाली हो किताब , सुंदर सा हो गुलाब ,
होती चुपचाप बात , आँखों में काट रात ।

चंचल मन करत शोर , यौवन कब चलत जोर ,
आती कब रात नींद , सपनों में प्यार दीद ।

मन में रहता सवाल , अंदर कुछ है बवाल ,
कोई देता न साथ , कोई पकड़े न हाथ ।

सब लगते है पराय , कोई भी ना सुहाय,
मन में जब प्रेम आय , सुध बुध सब व्यर्थ जाय ।


रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर

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तोमर छन्द
इसके चरणान्त में गुरु लघु (21) अनिवार्य है।
दो या चारों चरण परस्पर समतुकांत।

12 मात्रिक


लूट लूट खाय देश, बैंक भर रहा विदेश।
देशद्रोह के समान, तंगहाल नौजवान।

मर रहा किसान देख, भाग्य का कुरूप लेख।
साधु बन गए प्रकांड, नित करें नवीन कांड।

जन्म दे किया अनाथ, पाल सुता प्रेम साथ।
पाप कर्म छोड़ जाग, मत लगा कलंक भाग।

राजनीति का कलेश, किस दिशा चलाय देश।
हो रहे सभी निराश, याद आ रहे सुभाष।

देश को किया अभेद, मर रहे जवान खेद।
जल रही अखंड ज्योति, देश प्रेम ओतप्रोत।

जितेंदर पाल सिंह

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आदित्य जाति का छंद
*तोमर*
12 मात्रिक छंद

अंत 21 अनिवार्य
******************

तोमर छंद
*************
रूप का बनाव लाज, प्रीत का मिलान आज।
छेड़ के ‌ बसंत राग, गा रही पवन सु-राग।
******************
कर रहे गगन विहार, खग सभी धरा निहार।
ले रहीं किरण विस्तार, रोकती तिमिर प्रसार।
*****************
कर रहे मधुर सु-पान, दे रहे कुसुम सु-मान।
खिल गई नई सुप्रीति, मिट गई सभी अनीति।
*******************
हो रहा नया प्रभात, भेद कर सुरा निशात।
बन गए सभी सनाथ, रात भर रहे अनाथ।
*****************
खग उड़े पसार पंख, बज उठे सुनाद शंख।
झूमते चले मतंग, छुप गए सभी पतंग।
*******************
राज्यश्री सिंह
शब्दार्थ------बसंत राग --राग का प्रकार
सु - राग ---सुरीला राग
मतंग -हाथी
पतंग -दीपक पर रहने वाले कीड़े।

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तोमर छंद
12 मात्रिक पदांत गुरु लघु 21




विषय- "माता-पिता"

माँ-बाप के उपकार, देते हमें उपहार।
सेवा करें हम आज, जीवन मिले तब ताज।

माँ से बने परिवार, विष्णु पिता अवतार।
माँ शब्द है अहसास, तो बाप शब्द है खास।

नूतन रचे इतिहास, सपना दिखे जब खास।
मिलता जगत सम्मान, शुभ फल मिले परिणाम।

माँ का मिले आशीष, पग पे झुका दो शीश।
माता-पिता का हाथ, रखना सदा तू साथ।

बूढ़े हुए माँ -बाप, समझो वचन ये आप।
पा जिन्दगी में प्यार, रह माँ जिगर में यार।

रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट"

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तोमर छ्न्द
चार चरण ,दो दो या चारो चरण समतुकांत
12 मात्रा अंत 21

खूब किया यहां साज , नगर यह प्रयागराज ।
लगता यहां जब कुुम्भ, आते अनेक कुटुम्ब।
.......
नित गंगा का बखान, है मुक्ति का ‌रस पान।
कहे ये वेद पुराण , होता यहां कल्याण।

सिम्पल काव्यधारा ,प्रयागराज

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तोमर छन्द
12 मात्रिक छन्द
चरणान्त गुरु लघु (21) अनिवार्य

दो दो या चारो चरण समतुकांत

गूँज उठी जय जयकार, टूट गया धनु शुभकार।
पूर्ण हुआ जनक काज, बाज उठा सुखद साज।
*******************
शुभ बरसे गगन फूल, लाल गुलाल की धूल।
बाजत सुमधुर मृदंग, राह भरे नवल रंग।
*****************
प्रीत सुप्रीत सिय राम, पावन भू- जनक धाम।
नैन भरे जलज नीर, जनक मिटी सकल पीर।।
*****************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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तोमर छंद
 (१२ मात्रिक, अंत २ १ )


जुड़ी भावों की डोर । बसे तुम थे हृद कोर ।।
पले क्यों ये अंगार । बने हम है लाचार ।।

जगत में दे दृष्टांत। किया वाणी से क्लांत।।
रहे तुम होकर मौन। प्रिया समझे!हो कौन।।

सखा तुम हो आधार। न तजना मम मझधार ।।
नही बढ़ती डग चार । बिना तेरे लाचार ।।

बिना बोले है प्रीत । रही उनमें भी जीत।।
परे जग का व्यवहार मनाती हूँ मैं प्यार।

मृदुल रख अंतस भाव । सजा सपने भर चाव।।
सुनेगा हां प्रभु मान। सफल होगा तू जान ।।

ललिता

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तोमर छंद
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१२ मात्रिक छंद

अंत २१ (गाल गुरु- लघु)

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काश वो आती पास, दर्द बन छलते आस।
शूल बन जलते खास, स्याह होती तब रास।।

नींद से जागी जात, सोइ थी आधीरात।
पाश बांधी थी डाल, फांद आई थी जाल।।

काल था आया द्वार, मांगती नित जो हार।
पूछती छवि हिय आप, खोजती नित तन पाप।।

वो निशानी थी मेह, जो निभाई थी नेह।
रूप बदले छाई न, जो किसी से पाई न ।।

शाद हो अपना नाम, याद हो सबका काम।
रागिनी अलसायी राह, बंदगी भरमाई थाह।।

विनीता सिंह "विनी"

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