Thursday, June 11, 2026

किरीट_सवैया - Hindi poetry

 



जय माँ शारदा

एक सम्यक अंतराल के बाद पुनः
छंद सृजन श्रृंखला प्रारम्भ करते है । *इस पोस्ट पर प्रेषित समस्त उपयुक्त रचनाएँ साहित्य अनुरागी ब्लॉग में प्रकाशित की जायेगी।
आप सभी का अभिनन्दन।
चार चरण
विधान- भगण *8
24 वर्ण प्रति चरण।
उदाहरण
रसखान रचित
मानुष हो त वही रसखान बसों नित गोकुल गाँव के गवारन।
****
मौलिक उदाहरण।
किरीट सवैया
प्रीत फले अँगना जिसके उर,
मोह न राग रहे घट भीतर।
देख सके समता मनुजों पर,
भेद न जानत भीतर बाहर।।
लौ लगती रहती जिसके मन,
जागत पावत बात उजागर।
केशव माधव त्रास हरो सब,
हो किरपा सब पे करुणाकर।।
✍️
अविराज
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जय भोलेनाथ
किरीट सवैया,24 वर्ण,8 भगण (221)
चन्द्र सदा शिव शोभित शीश गले अति शोभिय व्याल विराजत।
अंग लगाकर भस्म चले शिव भंग सदा अति है मन भावत।
मात उमा शिव संग रहें दिन-रात सदा सुख हैं उर पावत।
भक्त सभी मिल आपस में शिव की महिमा नित हैं बस गावत।
कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश
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किरीट सवैया छन्द (वर्णिक )
12 वर्ण , यति 12 पर , 211×8 ,
इसमें चारों चरण समतुकान्त होते हैं
भगण भगण भगण भगण , भगण भगण भगण भगण ।
211 211 211 211 , 211 211 211 211
वास करें प्रभु राम सिया मन, अद्भुत रूप बसे मन में सिय।
हे करुणानिधि नैन बसो तुम ,नैन विशाल हुए सब के प्रिय।
संकट मोचन कष्ट हरो सब , दूर करो अभिमान सदा हिय ,
जीवन की विपदा हर लो प्रभु ,हे कमलापति पद्मप्रिया पिय।
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज
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किरीट सवैया
१२/१२ पर यति,
२११ २११ २११ २११ २११ २११ २११ २११
राम भजो अब कृष्ण भजो अब,नाम यही अब साथ कहो सब।
पावन है अरु मंगल उज्वल,एक यही स्वर रोज कहो अब।
राग जपो यह संकट नाशक,हो दिन रात सनेह कहो जब।
भक्त अनन्य अशेष अभी बन, आज नही तब सोच कहो कब?
सुवर्णा परतानी
हैदराबाद 
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किरीट सवैया
वर्णिक छंद
भगण×8
211 211 211 211,
211 211 211 211
किरीट छंद महिमा
छंद किरीट महान लगे सच, अक्षर-अक्षर लेपित चंदन।
गान करें यदि साध कभी लय, वास करें मुख में रघुनंदन।
तान बजे मुरली सम मोहक,भाव लिखें जब शब्द प्रबंधन।
छंद घुला अति भाव मनोरम,नाद उठे जिमि ईश्वर वंदन।।

माँ
हे! जननी जयकार करूँ कर,जोड़ सदा अभिनंदन वंदन।
आँचल अंदर नेह सुवासित, पावन ज्यों खुशबू वन चंदन।
पोषित नैन डटीं पलकें द्वय, मातृ सदा हित रक्षण नंदन।
व्याकुलता जस मीन विना जल,देख सुता-सुत लोचन क्रंदन।।

भारत भूमि
भारत भू पर रोग निवारक, औषधि जंगल पर्वत सागर।
शोध करें नित,रोग हरें नित, देश विदेश गुणीजन आकर।
वेद, पुराण, कुरान यहाँ पर, धन्य धरा सच भारत पाकर।
आज उठा सर गर्व करें हम,विश्व गुरू सच नाम कमाकर।।

अष्ट योग
संत पतंजलि हैं कहते सुन, योग कलेवर आठ पढ़ो सब।
हो बहिरंग अनुष्ठित जो तन,धारण, ध्यान, समाधि बढ़ो तब।
जो करते नित योग धरा पर,रोग हरे सब ,जीव मिले रब।
सत्य लगे यह बात गुणीजन,सूरज ज्यों उगता सुन पूरब।।
स्वरचित व मौलिक
कप्तान अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, पकरिया,बाँका, बिहार व लखनऊ,उत्तरप्रदेश

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छंद- किरीट सवैया (वर्णिक छंद)
भगण-8
भगण -भगण-भगण भगण ,
भगण भगण भगण भगण
211 211 211 211,
211 211 211 211
चारो चरण समतुकांत
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कोयल कूक सुने जब भी तब हूक उठे मन में अति पावन।
प्रीति लिए सखि मंद हवा तन को लगती मुझको मन भावन।
साथ लिए मधुमास चला अब आस बढाय बसंत लुभावन।
भौह कमान बनी तनके कब लक्ष्य मिलें सखि री प्रिय साजन।।
विनीता सिंह
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सुगति छन्द: Hindi poetry



Example & Explain By-  Mr jitender Pal Singh , Lucknow




सुगति छन्द:
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सुगति सप्त मात्रिक छंद है, इसे शुभगति छन्द भी कहते हैं।
इसकी वर्ग संज्ञा लौकिक है।
इसके हर चरण में सात मात्राएँ तथा चरणान्त में गुरु होता है।
चार चरण दो-दो चरण  समतुकांत
इन सप्त मात्रिक छंद के 21 भेद हो सकते हैं


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खग उड़ चला, तरणि निकला।
किरण चमकी, पवन महकी।

अनुपम छटा,बरसत घटा।
तरुवर हरे,वन सब भरे।

कलित युवती,लहर चलती।
पकड़ मटकी,अलक झटकी।

नयन कजरा,लगत बदरा।
मृदुल तन है,चपल मन है।

कहत सखियाँ,मिलत अखियाँ।
चितवत पिया,धड़कत जिया।

जितेंदर पाल सिंह
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सुगति छंद

7 मात्रिक वाचिक भार

के अनुसार

🌹

आज मन में, हर्ष तन में 

ले बढ़ा पग ,है बड़ा मग। 1।


🌹
हो खड़ा अब,छोड़ तम सब
हार को ना,जीत को हाँ।2।
🌹
देख आगे,रिपु भागे
वीर बन जा,क्रोध सह जा।3।
🌹
ये सुगति है,ये नियति है
लिख जरा ये,सीख ले ये।4।

 अरविन्द चास्टा , कपासन चित्तौड़गढ़ ,राजस्थान

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सुनो सखियां,लड़ी अखियां।

बहारों में ,हजारों में ।

......

महकते हैं ,चहकते हैं ।

खिले मधुबन,मिले जो मन ।

......

कहूं क्या अब,मिले हम जब।

छुपे थे जो ,,कहां थे वो ।

.....
बुलाते हैं ,मनाते हैं।
पहाड़ों में ,किनारों में ।

सिम्पल काव्यधारा

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विषय- कृष्ण सुदामा

पैर धोये,कृष्ण रोये।
नेह श्यामा,विप्र सुदामा ।।
***********
दोस्त प्यारा,प्रेम न्यारा।
शूल देखे,फूल जैसे।
***********
भोग मांगा,मोह भागा।
लाज कीन्हा,राज दीन्हा।।
************
प्रीत पाएजीत आये ।
प्रेम जीता,नैन भींगा।।
************
डॉ नीरज अग्रवाल, बिलासपुर
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सन नेह से,मिल प्रेम से

प्रियतम सुनो,प्रीती गुनो।


दृग प्यार है,अंबार है।

हिय तुम बसे,बन प्राण से।


मृदु चाहना,शुचि कामना

अंतस बसी,डोरी कसी।


रहना सदा,उर की मृदा

द्युति कम न हो,मति भ्रम न हो।


नैर्मल्य हूं।,मैं धन्य हूं।

भव तू मिला,जीवन खिला।


ललिता गहलोत

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विषय - विरह


तुम मिले थे,दिल खिले थे

ये पुरानी,है कहानी।


जी न तोड़ो,बात छोड़ो

हार मेरी,जीत तेरी ।


रात बहती,साथ रहती

है सुहानी,रात रानी ।


याद आई,मन जलाई

गीत गाते,रेन बीते ।
रजिन्दर कोर (रेशू), अमृतसर
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नयन भरके,चरण धरके,
भगवन भजो,सब डर तजो।

मलिन तन में,सुजन मन में,
मिलन भर दे,जलन तर दे।

दमक बढ़ती,अगन पलती,
नरम बनके,करम करके,

भजन भजले,हवन कर ले,
भगत बनके,जनम हर ले।।

सुवर्णा परतानी ,हैदराबाद
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बरखा नहीं ,दिखती कहीं ।
बदरी हटी ,धरती फटी ,

जल भी बिके ,दुनिया लखे ।
जन सोच ले ,किस ओर रे ।।

वन कट रहे ,जल घट रहे ।
घर घर खड़ा ,पहिया बड़ा ।।

तड़पे पवन ,भरके नयन।
घुटता रहा ,सहता रहा ।।

थक कर मही ,अब अधमरी ।
अब बस करो ,अब तो डरो ।।

अभय कुमार आनंद , लखनऊ उत्तरप्रदेश
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**** **** ****
पीर सहके,प्रीत महके,
द्वेष तज के,नैन छलके।।

शूल चुभते,पुष्प खिलते,
स्याह हरते,दीप जलते।।

सांझ ढलते,हाथ मलते,
साथ चलते,लोग छलते।।

राह ढहते,पेट गहते,
मौन रहते,भूख सहते।

सोच गहरी,चाल ठहरी,
वार कर लो,आह भर लो।।

अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
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हलधर खड़े,जलधर अड़े।
नयन बरसे,कृषक तरसे।

गगन हरषे,अमिय बरसे।
तमस हरता,चमक भरता।

प्रथम जग में,जगत डग में।
गणपति हरे,शुभ शुभ करे।

उपवन मिला,तन मन खिला।
कुसुम कलियाँ,छमक गलियाँ।

चिर अजय हो।रण विजय हो,
तरकश भरे,रिपु दल डरे।

'मन'

सुगति छंद गीतिका


कभी जोड़ेकभी तोड़े।

भरी गागरकभी फोड़े।

हटा कर केसभी रोड़े।

विकल जग मेंनहीं छोड़े।

मना के मुख,कभी मोड़े।

खिले तारेअभी थोड़े।

कुसुम खिलतेनहीं तोड़े।

गीता गुप्ता 'मन'
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राधे कृष्णा, राधे कृष्णा
हरे राधे,हरे राधे।

राम राजा,राम राजा
राम सीता,राम सीता।

राधे कृष्णा,राधे कृष्णा
राधे हरी,राधे हरी।

ॐ महेश्वरा,महादेवा
ॐ सदाशिवा,उमानाथा
ॐ हरि भोले,जयन्ती प्रिये।

जयति रामा,जयति रामा
जै जै रमा,जै जै रमा।

जै जै राधे,जै जै राधे
जै जै कृष्णा,जै जै कृष्णा।

नट नागरा,मन मोहना
कुन्ज बिहारी,छवि सांवरी।

नैन कजरा,तन सांवरा
केश गजरा,मोहे हियरा।

सिता रामा,भजो रामा
राधे कृष्णा,भजो कृष्णा।

स्वरचित-  भजन सुगति छंद
गोपाल कृष्णा भावसार , इंदौर सुखेड़ा (म.प्र.)
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देखो पिया,जीवन मिला,
आधार था,अधिकार था।

उर में बसे ,संसार से,
तुम प्राण हो,मन जान हो।

पाते सभी,खाते तभी,
जग से दुखी,मन से सुखी।

इक बंदिनी,थी संगिनी,
राहें कड़ी,बेड़ी पड़ी।

 गुंजित जना,हरषित मना,
सुरभित जहाँ,मिलता कहाँ।



विनीता सिंह विनी 

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सुगति छन्द आधारित गीत, 7 मात्र

कंटक कटे ,
सब दुख मिटे,

भज राम को ,जप श्याम को,
उनसे सटे,सब दुख मिटे।

राधा कहो ,कान्हा कहो
 मन से रटे,सब दुख मिटे।

कुछ पुण्य हैं ,कुछ पाप हैं ,
उनसे हटे,सब दुख मिटे।

जन्में सभी,मरते सभी,
जीवन घटे,सब दुख मिटे।
रागिनी गर्ग ,रामपुर यूपी
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भाव प्रेम


ओ रे पिया,धड़के जिया
धड़कन सुनो,सपने बुनो।
1
चल साथ ले,यूँ हाथ ले
देखे हमें,राहें थमें
ये क्या किया,ओ रे पिया।

2
ओ बावरे,सुन साँवरे
नाचन लगी,आशा जगी
कहता जिया,ओ रे पिया

3
तुम श्याम हो,या राम हो
मन मीत हो,तुम जीत हो
वारा हिया,ओ रे पिया।

4
है प्यार तू,संसार तू
तू गीत है,तू प्रीत है
सुन साथिया,ओ रे पिया।

रानी सोनी "परी
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 सुगति छन्द

दो-दो चरण समतुकांत

आस तन की,चाह मन की
बात कर ली,आह भर ली

केश काले,मेघ काले
खेत सूखा,बैल भूखा

नीर खारा,बे सहारा
पी न पाया,जी न पाया

आज मानी,तू न ज्ञानी
फेर माला,कर उजाला

राज राजेश्वरी ,दिल्ली