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Monday, June 29, 2026

सायली- Hindi poetry


🍁अनुरागी नमन🍁
हिंदी साहित्य लेखन ने कई गैर पारम्परिक अथवा अन्य भाषायी काव्य की विधाओं को अपने विशाल हृदय में आत्मसात किया है । पिछली पोस्ट में हमने जापानी कविता की शैली की हाइकु ताँका सेदोका बारे में संक्षिप्त जानकारी ली ।


🍂

इसी क्रम में एक अन्य विधा आज आप साहित्य अनुरागियों के समक्ष प्रस्तुत है।


🍂सायली 🍂

इसे कई महानुभाव सायली छंद भी कहते है पर सर्वमान्य नही ।
अपने भावों को शब्दों के निश्चित क्रम में प्रकट करने का माध्यम है ।
यथा
सायली एक पाँच पंक्तियों और नौ शब्दों वाली कविता है | उपलब्ध जानकारी के अनुसार मराठी कवि विशाल इंगळे ने इस विधा को विकसित किया हैं | अल्प समय में यह विधा मराठी काव्यजगत में लोकप्रिय हुई है। हिंदी साहित्य के सृजनकर्ताओं ने इस विधा को अपने लेखन शैली में स्थान दिया है।
नियम🍂
पाँच पंक्तियों में लेखन का विधान कहा जाता है।
विशेष की मात्रा एवम् वर्ण के बजाय शब्दों की सँख्या को आधार माना है।
पहली पँक्ति में एक शब्द
दुसरी पँक्ति में दो शब्द
तीसरी पँक्ति में तीन शब्द
चौथी पँक्ति में दो शब्द
पाँचवी पँक्ति में एक शब्द


🍂सायली🍂
धरा
पीत वर्णी
मद गन्ध महकी
मोहती मन
हवाएँ।
🍂
उमड़ते
भावों को
थाम लो आकर
बेचैन हुआ
मन।
🍂
पवन
दिशा हीन
लपेट रही मुझे
आ गया
वसन्त।
🍂
अरविन्द चास्टा "अविराज"
कपासन चितोड़गढ़ राज.

🍂शुभकामनाएँ।
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सायली छ्न्द

1
चांदनी
रात में
साज छेड़े मधुर
गीत साजन
संग

2
चुनरिया
पीली ओढ़े
घूंघट में गोरी
खड़ी है
सजी

3
लाज
से झुक
रही है नजर
किया प्रीत
शृंगार
......
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज
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सायली छंद

विषय - मौन
------------------------

१)मौन
कौन हूँ
अनकहे शब्दो की
मौन हूँ
मैं

२)मौन
छुपा सार
शून्य सृष्टि संघार
मौन हूँ
मैं

३)अनहद
गूँज भाव
शून्य हुआ संसार
कौन हूँ
मौन

४)मैं
अहम उत्सर्जित
जीवन सार हूँ
मैं मौन
हूँ

विनीता सिंह विनी ✍️

गोंडा ( उत्तर प्रदेश)
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सायली:-

हे!
नव वर्ष!
नया कुछ है?
निशि-वासर
यथावत्

मूक
है भाषा
नैन-सकोरो में
ढलते आँसू
परिभाषा।

धवल
पृष्ठ कोरे
मौन तोड कर
व्योम जैसे
बोलते

माँ
पयपान प्रांजल
ममता का आँचल
नेहिल गोद
करुणाचल।

ईश!
हृद-उच्छ्वास
चरणों में समर्पित
निःश्वास चहे
श्वास।
------------------------
रागिनी नरेंद्र शास्त्री
दाहोद(गुजरात)
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सायली

सँभाल
अपनी गगरी
आया माखन चोर
नन्द किशोर
कान्हा

बेटियाँ
होतीं कोमल
कली गुलाब की
मुरझा जातीं
झट

कवि
लिखे कविता
लय ,भाव शिल्प
के मिश्रण
से।

प्रेम
आत्मिक था
राधा कृष्ण का
सब जानते
हैं

मीरा
वैरागिन हुयी
कृष्ण भक्ति में
भूल गयी
सब
रागिनी गर्ग
रामपुर यूपी
--------------------------------------------------------
 सायली छंद

विषय ;- नव वर्ष

भारती
विदा बेटी
सहेजा तुमने सबको
बिखर गया
कुटुंब

सुखद
नव वर्ष
लाये सबको करीब
विभाजित नही
हिन्दुस्तान

नवीनता
अमन चैन
दिल बटवारा कैसे
रामराज्य सहेजना
पुलकित

पूजा
चरण स्पर्श
अतिथि देवों भवः
नव वर्ष
भारत

उमंग
नव पर्व
प्यार चाहत नफ़रत
हाथ बढाये
आत्मविस्वास।

विनीता सिंह विनी
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विधा..सायली

विषय..विदाई

(1)
विदाई
होती बेटियाँ
कलेजे पर पत्थर
भेजे माता पिता
पराई
(2)
मुश्किल
करना विदाई
दिल का टुकड़ा
होती बेटियाँ
हमदर्द
विषय ..आज की शिक्षा पर।

(3)आधुनिक
शिक्षा देती
लाइलाज जख्म भर
सरकारी नौकरी
भाईभतीजा

(4)सिफारशी
नौकरी मिलती
लाइलाज जख्म देती
मेहनती तड़फता
बेरोजगारी

स्वरचित
ऋतु गुलाटी
-------------------------------------------------------
 सायली छन्द

नित,
कर ध्यान,
तेरे आये काम,
कष्टों का,
निदान।

प्रेम,
आधार है,
आपसी सौहार्द का,
ईश्वर द्वार,
का।

ईर्ष्या
दूर भगाओ,
देश की एकता,
सब नागरिक,
बढ़ाओ।

देश,
है अपना ,
इसका है सपना,
तरक्की कर,
बढ़ना।

दुर्बल,
होती उंगली,
जो बाँधो पाँचो,
बन जाय,
मुट्ठी।

जितेंदर पाल सिंह
---------------------------------------------
पता

नहीं क्यो?
यादों के पन्ने
आज फिर
फड़फड़ाते।

मोह
के धागे
तेरी उँगलियों में,
जा उलझे
क्यों?

संभली
तुफानो से
समंदर में फँसकर
हिदायतें लिख
दी।

सहेजती
अश्रु अँखियाँ,
मिलन आस लिए
सपने समेटे
बैठी।
नीलम शर्मा
----------------------------------------
सायली


सौरभ
पुष्प विकसित
धरा दुल्हन बनी
स्वागत आपका
ऋतुराज

****
श्याम
गोकुल धाम
गोपाल,बनवारी,गिरधारी
यशोदा नन्दन
कृष्ण

****

दिनकर
रश्मि रथ
प्रभा करें श्रृंगार
प्रकाश विकरण
कलरव
*****

यामिनी
धवल अमल
गगन मध्य राकेश
प्रखर ज्योत्स्ना
पूर्णिमा

*****
होती
कर्म पूजा
ध्येय की प्राप्ति
अथक परिश्रम
विजय
*****

बेटी
करती रोशन
मायका और ससुराल
जीवन अधिकार
भिक्षुक
**********
गीता गुप्ता 'मन'
-------------------------
सायली छंद

1- अद्भुत
अद्वितीय श्रृंगार
सुखद वसंत आगमन
हरित धरा
मनोहारी।

2- हंसवाहिनी
मात शारदे
मिले ज्ञान वरदान
हृदय करे
यशगान।

3- विनम्रता
सम्पूर्ण समर्पण
लोक कल्याण आधार
पूर्ण पहचान
साहित्यकार।

4-सुरभित
धरा-आकाश
प्रसून,मधुकर गुंजार
अनुपम प्रकृति
अमृतमयी।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर
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सायली

पवन
चली जब
मन बहक गया
पिया संग
चहकी ।

तेरा
साथ रहे
सदा यूं साजन
जीवन चलो
सवारे ।

रजिन्दर कोर रेशू
अमृतसर
------------------------
सायली छंद


वक्त
नहीं थमता
फिर नहीं आता
मानव है
पछताता।

कर्म
करो ऐसे
सुगंधी,संस्कारी जैसे
मिले फल
वैसे।

मेहनत
उम्मीद,लगन
होगी थोड़ी अगन
चित्त होगा
मगन।

भूखा
करे हहाकार
सोती है सरकार
नेता छिनता
अधिकार

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद
-----------------------
-सयाली छंद में एक प्रयास  
प्रेम
अद्भूत है
समर्पण मांगता है

संसार में
बस।

 बसंत
धरती सजी
उमंग छाया है।

विदा हुआ
पतझड़ ।

तुम
मेरे हो
फिर क्या गम
छोड़ना मत
साथ ।

Rakesh Kumar Singh
----------------------------
सयाली
विषय:-प्रकृति

सूर्योदय
बिखरी लालिमा,
सिमटी श्यामल कालिमा,
सुरभित सुमन,
मनभावन।
*****
मृदुल,
कोकिल गान,
कुसुमित कमल दल,
मलयिज हवाएं,
विहान।
*****
शंखनाद,
सजे द्वार,
गूंजती भोर घण्टिया,
चहकती चिड़ियाँ,
सुप्रभात।
*****
गूंजते
प्रार्थना मंत्रोच्चार,
मधुर संगीत सुखद,
नाचते मयूर,
प्रभात।
*****
प्रकृति
मन मोहनी,
श्रृंगार कर उतरी,
सुनहरी भोर,
स्वर्णिम।
*****
खिलते,
सरुवर नीरज,
विचरते श्वेत मराल,
तरंगित लहरे,
विशाल।
*****
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल"नन्दिनी"
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)
-----------------------------------
सायली छन्द
सँभाल
अपनी गगरी

आया माखन चोर
नन्द किशोर
कान्हा
बेटियाँ
होतीं कोमल
कली गुलाब की
मुरझा जातीं
झट
कवि
लिखे कविता
लय ,भाव शिल्प
के मिश्रण
से।
प्रेम
आत्मिक था
राधा कृष्ण का
सब जानते
हैं
मीरा
वैरागिन हुयी
कृष्ण भक्ति में
भूल गयी
सब

रागिनी गर्ग रामपुर (यूपी)
--------------------------------

Thursday, June 25, 2026

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर -


Explained by - Shri jitendra Pal Singh ji
 
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल

122 122 122 12

काफ़िया: होने
रदीफ़: लगा
बंदिश: ओने

मिसरा: "हमें आप से इश्क़ होने लगा,"
पूरा शे'र:

मुलाक़ात जब से हुई आपसे,

हमें आप से इश्क़ होने लगा।

क़वाफी के उदाहरण:

खोने, होने, सोने, डुबोने, पिरोने, 
धोने, ढोने, भिगोने, चुभोने, बोने इत्यादि।

ग़ज़ल
अलग एक दुनिया सँजोने लगा,
मैं ख्वाबों में तेरे हूँ खोने लगा।

मुलाक़ात जब से हुई आपसे,
हमें आप से इश्क़ होने लगा।

कि मुद्दत हुई है मुलाक़ात को,
मैं यादों की माला पिरोने लगा।

मुहब्बत के दरिया में उतरे ही थे,
ज़माना अभी से डुबोने लगा।

सुनाऊँ मैं क्या हाल हालात के,
जिसे देखो नफरत वो बोने लगा।

उड़ी नींद रातें भी बेचैन हैं,
तिरे बिन मिरा दिल ये रोने लगा।

बची चंद साँसे मिरे ज़िस्म में,
बुझा दो ज़रा 'दीप' सोने लगा।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
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नहीं जानते क्यूँ ये होने लगा।
तुम्हें देख कर चैन खोने लगा।।

घड़ी भर में दिल तेरे दीदार से,
तड़प आशिकी की सँजोने लगा।।

अभी हमने लहरों से की दोस्ती,
अभी इश्क़ हमको डुबोने लगा।

हमें झील में देखना चाँद था,
तू आ कर निगाहों में सोने लगा।

दिखा कर तेरा अक्स दिलदार अब,
ये आईना नश्तर चुभोने लगा।।

सहर शाम रटती जुबां नाम जो,
लबों को हमारे भिगोने लगा।।

कशिश इस कदर क़त्ल में थी 'मणि'*
कि जिंदा रहा दिल तो रोने लगा।।


मणि अग्रवाल
देहरादून (उत्तराखंड)

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ख़यालों में इस तर्ह खोने लगा।
फक़त याद को ही सँजोने लगा।

लगे दाग थे उसके चेहरे पे पर,
रगड़ आइने को वो धोने लगा।

नहीं छोड़े अश्कों ने दामन कभी,
बहुत खुश हुआ तो भी रोने लगा ।

किनारे भी गुस्ताख़ी करने लगे,
समंदर को दरिया डुबोने लगा।

रहा इश्क़ में तो नदारद रही,
पर अब चैन की नींद सोने लगा।

रही कोशिशें दूरियाँ हो मगर,
मैं फिर भी उसी का क्यों होने लगा।

तुम अहब़ाब समझे थे 'कश्यप' जिसे,
वहीं आज नश्तर चुभोने लगा।

आयुष कश्यप

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बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


बता दो मुझे क्या ये होने लगा।
न जाने कहाँ दिल ये खोने लगा।

ख़ुदा ने सँवारा तुम्हें नाज़नीं
तुझे देख सपने सँजोने लगा

लगा सूखने प्यार का जब शज़र,
नये ख़्वाब मैं फिर से बोने लगा।

मुहब्बत ख़ता है मुहब्बत बला
मुहब्बत मगर दिल पिरोने लगा।

सुना है मुहब्बत शरारा है इक।
जला रात भर और रोने लगा।

नीलम शर्मा

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बह्र......बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


मुझे प्यार उससे यूं होने लगा।
कि दिल भी फ़क़त आज खोने लगा।

सभी जल रहे नफ़रतों में यहाँ-
कि देखो ख़ुदा ख़ुद भी रोने लगा।

दिलों के भी जज़्बात मरने लगे-
कि जग जैसे सारा ही सोने लगा।

नहीं होगी फ़स्ल ए नफ़रत कभी-
मुहब्बत ही इंसा जो बोने लगा।

जमीं होगी कृष्णा कि जन्नत सभी-
अगर आदमी मन को धोने लगा।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

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बह्र- बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


मुख़ालिफ़ किनारा भी होने लगा,
सफ़ीना हमारा डुबोने लगा।।

जिसे रास आयी न उल्फ़त मेरी,
वो मेरे तसव्वुर में खोने लगा।।

भरम चाहतों का था टूटा अभी,
नये ख़्वाब दिल फिर सजोने लगा।।

मुहब्बत का जिससे रहा वास्ता,
दिलों में वो नफ़रत पिरोने लगा।।

सितमगर ने मुझपे किया जो रहम ,
नमक से मेरा ज़ख़्म धोने लगा।।

ख़फा क्या हुई मुझसे मंज़िल मेरी,
कि रस्ता मेरा बोझ ढोने लगा।।

कमी "अश्क"उसकी न खलने दिया,
जुदाई में दामन भिगोने लगा।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"

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बह्र- बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


शमा क्या जली शोर होने लगा,
कही नज्म थी कोई रोने लगा।

न चाहा कभी दिल दुखे प्यार में,
मगर वक्त सपनें पिरोने लगा।

लगे प्यार में बेवजह जो कभी,
वही इश्क के दाग धोने लगा।

गमों से भरी रात थी वो खड़ी,
सितारे सहित चाँद खोने लगा।

विवशता बड़ी छोड़ जाना उसे,
विरह में सभी दर्द ढोने लगा।

तमाशा बना आशिकी का सुनो,
कफ़न आँसुओ से भिगोने लगा।

कहाँ कौन "अविराज" तेरी सुने,
समय शूल सबको चुभोने लगा।


अरविन्द चास्टा
कपासन चित्तौड़गढ़ राज।

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तुम्हें तो नहीं ये डुबोने लगा ,
किनारे खड़ा सांस खोने लगा।१।

रहे हो सदा से तम़ाशा बने ,
अभी तो ज़रा कुछ पिरोने लगा ।२।

नया सा रहा ये जमाना सदा ,
यहाँ वक्त यूँ ही सजोने लगा ।३।

हँसी ढूंढ़ती ही रही यूँ उसे ,
तलबगार नज़रे भिगोने लगा ।४।

बुझा सा दिलों को रिझाता रहा ,
खुदी बेखुदी साथ ढोने लगा ।५।

रजिन्दर कोर (रेशू)

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गज़ल़


बह्र......बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर

मुझे प्यार इक़रार होने लगा
कि इज़हार उनसे युँ होने लगा

करूँ इश़्क तुमसे ए जाने जहाँ
मैं सपनों में सपने पिरोने लगा

मिटे हम तुम्हारे लिए इस क़दर
दुआओं में तुमको सँजोने लगा

तुम्हारी अदाओं भरे बात से
ख़ुदाया मुझे प्यार होने लगा

उठे हूक़ जब भी पुकारूँ तुझे
न पाकर तुझे आज रोने लगा

जिसे प्यार करते रहे हम सनम
वही कील दिल में चुभोने लगा

कहे "काव्यधारा" ग़मे इश्क़ में
तु आँसू से आँखें भिगोने लगा

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

---------------

  ग़ज़ल सीखें (भाग–2) ग़ज़ल की संरचना – शेर, मिसरा, मतला, मक़्ता, रदीफ़, क़ाफ़िया, बह्र, ज़मीन और तख़ल्लुस भूमिका पिछले भाग में हमने जाना कि...