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Thursday, June 25, 2026

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर -


Explained by - Shri jitendra Pal Singh ji
 
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल

122 122 122 12

काफ़िया: होने
रदीफ़: लगा
बंदिश: ओने

मिसरा: "हमें आप से इश्क़ होने लगा,"
पूरा शे'र:

मुलाक़ात जब से हुई आपसे,

हमें आप से इश्क़ होने लगा।

क़वाफी के उदाहरण:

खोने, होने, सोने, डुबोने, पिरोने, 
धोने, ढोने, भिगोने, चुभोने, बोने इत्यादि।

ग़ज़ल
अलग एक दुनिया सँजोने लगा,
मैं ख्वाबों में तेरे हूँ खोने लगा।

मुलाक़ात जब से हुई आपसे,
हमें आप से इश्क़ होने लगा।

कि मुद्दत हुई है मुलाक़ात को,
मैं यादों की माला पिरोने लगा।

मुहब्बत के दरिया में उतरे ही थे,
ज़माना अभी से डुबोने लगा।

सुनाऊँ मैं क्या हाल हालात के,
जिसे देखो नफरत वो बोने लगा।

उड़ी नींद रातें भी बेचैन हैं,
तिरे बिन मिरा दिल ये रोने लगा।

बची चंद साँसे मिरे ज़िस्म में,
बुझा दो ज़रा 'दीप' सोने लगा।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
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नहीं जानते क्यूँ ये होने लगा।
तुम्हें देख कर चैन खोने लगा।।

घड़ी भर में दिल तेरे दीदार से,
तड़प आशिकी की सँजोने लगा।।

अभी हमने लहरों से की दोस्ती,
अभी इश्क़ हमको डुबोने लगा।

हमें झील में देखना चाँद था,
तू आ कर निगाहों में सोने लगा।

दिखा कर तेरा अक्स दिलदार अब,
ये आईना नश्तर चुभोने लगा।।

सहर शाम रटती जुबां नाम जो,
लबों को हमारे भिगोने लगा।।

कशिश इस कदर क़त्ल में थी 'मणि'*
कि जिंदा रहा दिल तो रोने लगा।।


मणि अग्रवाल
देहरादून (उत्तराखंड)

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ख़यालों में इस तर्ह खोने लगा।
फक़त याद को ही सँजोने लगा।

लगे दाग थे उसके चेहरे पे पर,
रगड़ आइने को वो धोने लगा।

नहीं छोड़े अश्कों ने दामन कभी,
बहुत खुश हुआ तो भी रोने लगा ।

किनारे भी गुस्ताख़ी करने लगे,
समंदर को दरिया डुबोने लगा।

रहा इश्क़ में तो नदारद रही,
पर अब चैन की नींद सोने लगा।

रही कोशिशें दूरियाँ हो मगर,
मैं फिर भी उसी का क्यों होने लगा।

तुम अहब़ाब समझे थे 'कश्यप' जिसे,
वहीं आज नश्तर चुभोने लगा।

आयुष कश्यप

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बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


बता दो मुझे क्या ये होने लगा।
न जाने कहाँ दिल ये खोने लगा।

ख़ुदा ने सँवारा तुम्हें नाज़नीं
तुझे देख सपने सँजोने लगा

लगा सूखने प्यार का जब शज़र,
नये ख़्वाब मैं फिर से बोने लगा।

मुहब्बत ख़ता है मुहब्बत बला
मुहब्बत मगर दिल पिरोने लगा।

सुना है मुहब्बत शरारा है इक।
जला रात भर और रोने लगा।

नीलम शर्मा

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बह्र......बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


मुझे प्यार उससे यूं होने लगा।
कि दिल भी फ़क़त आज खोने लगा।

सभी जल रहे नफ़रतों में यहाँ-
कि देखो ख़ुदा ख़ुद भी रोने लगा।

दिलों के भी जज़्बात मरने लगे-
कि जग जैसे सारा ही सोने लगा।

नहीं होगी फ़स्ल ए नफ़रत कभी-
मुहब्बत ही इंसा जो बोने लगा।

जमीं होगी कृष्णा कि जन्नत सभी-
अगर आदमी मन को धोने लगा।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

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बह्र- बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


मुख़ालिफ़ किनारा भी होने लगा,
सफ़ीना हमारा डुबोने लगा।।

जिसे रास आयी न उल्फ़त मेरी,
वो मेरे तसव्वुर में खोने लगा।।

भरम चाहतों का था टूटा अभी,
नये ख़्वाब दिल फिर सजोने लगा।।

मुहब्बत का जिससे रहा वास्ता,
दिलों में वो नफ़रत पिरोने लगा।।

सितमगर ने मुझपे किया जो रहम ,
नमक से मेरा ज़ख़्म धोने लगा।।

ख़फा क्या हुई मुझसे मंज़िल मेरी,
कि रस्ता मेरा बोझ ढोने लगा।।

कमी "अश्क"उसकी न खलने दिया,
जुदाई में दामन भिगोने लगा।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"

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बह्र- बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


शमा क्या जली शोर होने लगा,
कही नज्म थी कोई रोने लगा।

न चाहा कभी दिल दुखे प्यार में,
मगर वक्त सपनें पिरोने लगा।

लगे प्यार में बेवजह जो कभी,
वही इश्क के दाग धोने लगा।

गमों से भरी रात थी वो खड़ी,
सितारे सहित चाँद खोने लगा।

विवशता बड़ी छोड़ जाना उसे,
विरह में सभी दर्द ढोने लगा।

तमाशा बना आशिकी का सुनो,
कफ़न आँसुओ से भिगोने लगा।

कहाँ कौन "अविराज" तेरी सुने,
समय शूल सबको चुभोने लगा।


अरविन्द चास्टा
कपासन चित्तौड़गढ़ राज।

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तुम्हें तो नहीं ये डुबोने लगा ,
किनारे खड़ा सांस खोने लगा।१।

रहे हो सदा से तम़ाशा बने ,
अभी तो ज़रा कुछ पिरोने लगा ।२।

नया सा रहा ये जमाना सदा ,
यहाँ वक्त यूँ ही सजोने लगा ।३।

हँसी ढूंढ़ती ही रही यूँ उसे ,
तलबगार नज़रे भिगोने लगा ।४।

बुझा सा दिलों को रिझाता रहा ,
खुदी बेखुदी साथ ढोने लगा ।५।

रजिन्दर कोर (रेशू)

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गज़ल़


बह्र......बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर

मुझे प्यार इक़रार होने लगा
कि इज़हार उनसे युँ होने लगा

करूँ इश़्क तुमसे ए जाने जहाँ
मैं सपनों में सपने पिरोने लगा

मिटे हम तुम्हारे लिए इस क़दर
दुआओं में तुमको सँजोने लगा

तुम्हारी अदाओं भरे बात से
ख़ुदाया मुझे प्यार होने लगा

उठे हूक़ जब भी पुकारूँ तुझे
न पाकर तुझे आज रोने लगा

जिसे प्यार करते रहे हम सनम
वही कील दिल में चुभोने लगा

कहे "काव्यधारा" ग़मे इश्क़ में
तु आँसू से आँखें भिगोने लगा

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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Monday, June 15, 2026

बरवै_छंद मात्रिक- Hindi poetry


जय माँ शारदा

सभी गुणीजनों को नमन।

अब तक हमने सम मात्रिक छन्दों पर लेखन अभ्यास किया है।
आज आपके समक्ष अर्धसम मात्रिक बरवै_छंद प्रस्तुत है।
छंद बरवै मात्रिक
लक्षण- विषमनि रविकल बरवै ,सम मुनि साज।
प्रति छंद 4 पद,
चारों पद मिला कर 38 मात्राएँ,
विषम् चरण अर्थात पहला और तीसरा पद 12 मात्रा
सम चरण अर्थात दूसरा और चौथा 7 मात्रा होता है
यथा
12-7
12-7
से एक बरवै छंद पूर्ण होता है
सम चरण सम तुकांत ।
इसे ध्रुव अथवा कुरंग छंद भी कहा जाता है।
पदांत में जगण /121उत्तम माना जाता है 
एवम् तगण/221 को रोचक माना जाता है ।
 अनिवार्यता नही है।
मापनी स्वेच्छा अनुसार ली जा सकती है ।
उदाहरण
वाम अंग शिव शोभित ,शिवा उदार।
सरद सुवारिद में जनु ,तड़ित विहार।
(शास्त्रोक्त)

**************
स्वरचित
गीत मेरे कर रहे,आज पुकार।
आर्त को अब तो सुनो ,तनिक निहार।।
प्रेम के दाता बने, नन्द कुमार।
प्रीत की इस रीत में,कौन विचार।।

~अरविन्द चास्टा अविराज
कपासन चित्तौड़गढ़
राज.
****************
 बरवै_छंद


1.कार्य सारे बन रहे,भाग्य विधान।
लेख सारे तय सदा, मानुष जान।

2.लेखनी यूँ कर रही,भाव बखान।
भानु मानो कह रहा,शुभ्र विहान।

3.प्रेम की कीमत कहूँ ,है अनमोल।
भाव भाषा समझ ले,सत्य टटोल।

4.आस का दीप जलता,हो तम नाश।
दूर हों संकट सभी,है अभिलाष।

स्वरचित
डॉ पूजा मिश्र आशना

*********************
 बरवै छंद


भौतिक सुखों की चाह, दुखमय राह।
कम-अधिक नित झेलना,पीर प्रवाह।
मोहिनी छल की धरे, रूप अथाह।
आत्म सुख संग इसका, कठिन निबाह।।

कर आलिंगन करती, शून्य विचार।
चाहती स्वामित्व का,नित्य प्रसार।
मित्र बन कर बाँटती, खूब उधार।
और बनाए रखती, निज अधिकार।।

चाहते हो मुक्ति यदि, हो प्रभु जाप।
है सुमिरन का अद्भुत, दिव्य प्रताप।
सूख जाती शोक सरि, न हो विलाप।
मार्ग सदगति का यही, लें अब आप।।

मणि अग्रवाल "मणिका"
देहरादून (उत्तराखंड)

******************
 बरवै छन्द

शीर्षक:- अम्बिके

सर्वदानवघातिनी, कर संहार,
हे काली कपालिनी, कह संसार।
अरि नाश कर देविके,बैठे घात,
प्रचंड पाप खण्ड कर,काली रात।

मिटे कलुषित कामना, बढ़ता शोर,
फलित हो शुचि साधना,शुभि हो भोर।
दुख हरो कल्याणिके,झुकते माथ,
आशीष दे मंगला, धरिये हाथ।

माँ दनुजता बढ़ रही, बढ़ते पाप,
हे, रुद्राणी मोहनी, हर संताप।
उद्धार कर शिवे प्रिया,कपटी काल,
जगदम्बिके भवानी,पहनो माल।

चंड मुंड विनाशनी,काटो शीश,
शुभे पिनाकधारिणी, दे आशीष,।
परमेश्वरी विमले,कर दे त्राण,
हे, शुचित फल दायिनी,मेरे प्राण।

मनुजता को प्राण दो, कर दो काज,
वरदायिनी कमलिके, वर दो आज।
अम्बिके शुचि प्रीत दे,जग की मात,
मनमोहनी तम भरी, बीते रात।।

रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल नन्दनी
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

******************
 बरवै -छंद

हो सदा राह अब ये , रोज विचार ।
जोड़ते यूँ सब रहे , हृदय तार ।।
दूर हो आस न यहाँ , हो अब मान ।
प्यार फैले जगत में , योग विधान ।।


यूँ जले दीपक यहाँ , प्रेम पसार ।
प्यार से जीवन चले , स्नेह अधार ।।
सोच ये पावन रहे ,मानव आस ।
जोश से जीवन बढ़े , हो सब पास ।।

रजिन्दर कौर ( रेशू )

*****************

बरवै छंद,

मर्यादित रघुनायक,हैं श्रीराम।
आदर्शों में जिनका,ऊँचा नाम।।
भक्ति जहाँ पर बहती,है अविराम।
अवधपुरी वह सच में,पावन धाम।।

मधुरिम लगता हरदम,यह संसार।
मिट जाते जो उर से,सभी विकार।।
होता केवल जग में,नित त्योहार।
आपस में जो होता,मृदु व्यवहार।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

***********************

बरवै-छंद

पछुआ ओ पुरवाई,चली बयार।
चातक,मोर,पपीहा,करें पुकार।
अचला-आँगन गाये,मृदु-मल्हार।
मधुरिम सा यह सावन,मेह बहार।

श्यामल-सघन गगन में,तड़ित-विहार।
सतरंगी आभा में,धनुक निहार।
नीरद-नाद,निरंकुश,प्रखर प्रहार।
अंतरिक्ष की बाहें, बनी कहार।

बरबस बिखरी बूँदे,मृदा-कुंदन।
सौंधी सी खुशबू में,मलय-चंदन।
खोल दिये बादल ने,घने-गूँथन।
अनराधार बरसते, बिना बंधन।

हिय में हूक उठे है,प्रिये!आओ।
रोम-रोम के पंछी, विरह गाओ।
बदरी ले जा संदेश् ,सजन लाओ।
सुधियों की सिहरन को,बुझा जाऔ।

पेडो़ की डाली पर,झुला डाले,
स्वप्न-स्पर्श के मोती,हृदय पाले।
बरखा की बूँदो को,चलो छू ले।
पियु के संग सखी री!झुला-झूँले।

झरझर मेहा बरसे, हरित आँगन।
अलसाई कलियों में,फलित कानन।
तरुवर शाख लिपटती,नेह पावन।
विधि शृंगार सजे है,पुलिन-सावन।

रागिनी_नरेंद्र_शास्त्री
दाहोद(गुजरात)

******************
बरवै छंद

आज ये सावन खिला,संग बसंत।
रोक ना पाय मन को,रंग अनंत।
लो सभी ओर महके,मंद सुगंध।
ये सभी है प्रकृति का,चंद प्रबंध।।१।।

जो भरे प्रेम धुन से,नित्य उमंग।
साथ लाए मधुर सा,साज तरंग।
सृष्टि से है बिखरता,स्वर निनाद।
हर्ष से मोदित करे,एक प्रमाद।।२।।

पुष्प सारे मद भरें,प्रीत अपार।
आज गाए धुन नयी,काव्य सितार।
नित्य छाए मन सुधा,भाव फुहार।
ये धरा देख भरती,आज दुलार।।३।।

सुवर्णा परतानी

********************
बरवै छन्द

सावन मेघा बरसे ,बजे मृदंग।
छाई है हरियाली ,उठे उमंग।

सजनी धानी चूनर ,ओढ़ लजाय ।
कोयल कूके काली ,मन हुलसाय।

झूला झूले ये मन ,करे पुकार।
कजरी गाऊँ जब मैं ,बजे सितार ।

सावन पावन आया ,बढ़ी कतार ।
पहुँचे सब काँवरिया ,बम-बम द्वार।

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ


Explained By Mr.Jabir Ayaaz Saharanpuri ji 
आदाब,साहित्य अनुरागी 


गज़ल नम्बर चार के हवाले से हम आखरी और एक छोटी बह्र लेकर आये हैं छोटी बह्री की खासिय्यत का जिक्र हम पहले भी कर चुके हैं छोटी बह्र एक गुनगुनाती,लहराती,मचलती,बलखाती नदिया की तरह होती है!

और जैसे किसी देव हेकल पहाड की ओट से झरना आँखों के सामने एक खुशनुमा मंजर लिये आ जाता है इसी तरह छोटी बह्र में कही हुई बात धम से आँखों को चका चौंद कर देती है और दिमाग बगैर सोचो विचार में पडे फौरन रोशन हो जाता है!

एैसी ही ये बह्र है जिसका नाम है
#बह्रे_ख़फीफ-मुसद्दस-मख़बून-महज़ूफ-मक्तूअ, बह्र का नाम किस तरह बनता है या बना है ये हम आप सबको पहले ही बता चुके हैं..
(गज़ल कहने के लिए आपके पास एक गुरू होना लाज़मी है बिना गुरू के आपकी गज़ल अधूरी है)
गज़ल कहने के लिए रोज़ाना अभ्यासं,पढाई और मशवरह ज़रूरी है!
इस बह्र में छूट ये है कि आप आख़री रुक्न फैलुन२२ को फइलुन११२ भी कर सकते हैं
मतलब अगर आपके एक शेर में एक मिसरा में 22 हो गया और दूसरे मिसरे में 112 हो गया तो तब भी सही है!
उदाहरण में अपनी गज़ल और कुछ फिल्मी गीत दिये जा रहे हैं!




बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112

#गज़ल
बे ख्याली का जब ख्याल आया
बाखुदा फिर बहुत मलाल आया

नेकियों संग आज दरिया में
उसके ख़त भी जला के डाल आया

फुर्क़तों के सफर से मैं ज़िन्दा
लौट आया मगर निढाल आया

मैने उसको भुला दिया आख़िर
कितनी मुश्किल से ये कमाल आया

अश्क,यादों के साथ दिल से मैं
हसरत ए वस्ल् भी निकाल आया

महफिल ए यार में सरे महफिल
अपनी पगडी खुद ही उछाल आया
*****************************
इसी बह्र पर कुछ फिल्मी गीत

1. फिर छिड़ी रात बात फूलों की
2. तेरे दर पे सनम चले आये
3. आप जिनके करीब होते हैं
4. यूँ ही तुम मुझसे बात करती हो,
5. मेरी किस्मत में तू नहीं शायद
6. आज फिर जीने की तमन्ना है
7. ये मुलाकात इक बहाना है


जाबिर_अयाज़_सहारनपुरी
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वज़्न : 2122 - 1212 - 22 / 112
अर्कान : - फ़ाइलातुन , मुफ़ाइलुन , फ़ेलुन / फ़इलुन

बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

क़ाफ़िया : - ज़मानेे (आने की बन्दिश )
रदीफ़ : - से
***** ***** ****** ***

चाहकर भी यहाँ ज़माने से।
इश्क़ छुपता नहीं छुपाने से।।

बात होती रही तरक्की की।
कुछ अमीरों के मुस्कुराने से।।

बीच महलों के सिसकियाँ अक्सर।
चीखती हैं .........ग़रीबख़ाने से।।

ऐ सितमगर ज़रा बता मुझको।
क्या मिला दिल मेरा दुखाने से।।

बाज़ आते नहीं कभी साहब।
आंकड़े झूठ के दिखाने से।।

वो समझते रहे हमे कमतर।
बच गये हम फ़रेब खाने से।।

"अश्क"किरदार पाक तुम रखना।
दाग़ मिटते ... नहीं मिटाने से।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"

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बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112
ग़ैर मुरद्दफ़

ग़ज़ल

इक़ हसीं शाम, और तन्हाई,
फ़िर मुझे याद, यार की आई।

खूबसूरत हो, इश्क़ कर बैठे,
इश्क़ में हाथ, आइ रुसवाई।

वस्ल की रात है, ख़यालों में,
देखते रह गए, थे रानाई।

खो गए बज़्म में कहीं फ़िर तुम,
भूल हमको, गए हो हरजाई।

तुम हुए मोहताज़ दौलत के,
अख्ज़ फ़ितरत,करे है सौदाई।

ये मुहोब्बत, मिरी इबादत थी,
तुम दिखाने, लगे थे दानाई।

ग़र गिरे तुम कहीं उठा लेंगे,
'दीप' ऐसा नहीं, तमाशाई।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
अख्ज़- लोभ
दानाई- होशियारी

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बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112
ग़ैर मुरद्दफ़

ग़ज़ल

इक़ हसीं तुम, गुलाब हो जानम,
चाहता हूँ बनो, मिरी ख़ानम।

चाँद उतरा, ज़मीं पे हो जैसे,
हर नज़र देखती, रहे आलम।

दिल कहीं और लग नहीं सकता,
देखते रहते हैं, तुम्हें हरदम।

चश्म ए नाज़, की अदा क़ातिल,
ज़ख्म ए इश्क़, की तुम्हीं मरहम।

इश्क़ की प्यास, तुम बुझा दो हाँ,
गुलबदन बन कभी मिरी शबनम।

तुम जो आओ, हवा महक जाए,
ख़ास हो तुम मिरे लिए हमदम।

हम करेंगे नहीं, तुम्हें रुसवा,
'दीप' पर कर यकीं, मिरी जानम।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
ख़ानम- स्त्री, बेग़म

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बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112
ग़ैर मुरद्दफ

गजल
2122 1212 22

नायिका
आज हम फिर तुझे सताएंगे
रूठ जाओ अगर मनाएंगे
**
मुस्कुरा कर सहे सितम तेरे
दाग़ दिल के सभी दिखाएंगे
**
चाह कर भी तुझे न भूले हम
कर्ज़ दिलकश यहीं चुकाएंगे
**
प्यार क्या है समझ नहीं पाये
हाल अपना कभी सुनाएंगे
**
जान तुझको अज़ीज़ माना है
यार वादे सभी निभाएंगे
**
एक वादा करो कि आओगे
जब कभी हम तुझे बुलाएंगे

नायक
देख लो तुम पुकार कर साथी
हर सदा सुनके दौड़ आएंगे
.....

सिम्पल काव्यधारा ,प्रयागराज

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बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122 1212 22/112

ग़ज़ल

बस हमारी यही शिक़ायत है,
बद-गुमानी भरी सियासत है।

दीन की बात काम काफ़िर के,
हर किसी की करे ख़िलाफ़त है।

ग़ैर मज़हब मिटाने की साजिश,
फ़िर कहाँ की, तिरी शराफ़त है।

यूँ इबादत से क्या हुआ हासिल,
दिल में नफ़रत भरी अदावत है।

देख इंसाफ की फज़ीहत को,
मुज़रिमों के लिए इनायात है।

वाह वाही भरी ख़बर तेरी,
रोज़ अख़बार की शबाहत है।

अश्क़ अब्सार में गरीबों के,
कौन पोछें बड़ी ज़लालत है।

हमजुबां हम नहीं तिरे होंगे,
तुम समझते रहो बग़ावत है।

मुल्क़ में अम्न बस रहे क़ायम,
'दीप' करता यही इबादत है।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'

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 बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

अर्कान- फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन/ फ़इलुन

वज़्न- 2122 1212 22/112

क़ाफ़िया : - सूरत ( अत की बन्दिश ) रदीफ़ : - है
***** ***** ****** ***
माँ के जैसी न कोई सूरत है।
घर में माँ से ही होती बरक़त है।।

माँ न होती तो मैं भी ना होता।
जीस्त ये माँ की ही बदौलत है।।

माँ के आँचल में है सकूं सारा।
माँ के क़दमों तले ही जन्नत है।।

ग़लतियाँ लाख बेटा कर जाये।
माँ को होती नहीं शिकायत है।।

माँ कभी सख्त हो नहीं सकती।
वो तो ममता की होती मूरत है।।

दूध का कर्ज़ भर नहीं सकता।
सोच किस काम की ये दौलत है।।

इक निवाले को जो तरसते हैं।
"अश्क" माँ की उन्हें ज़रूरत है।।

@ अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"

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बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ

अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन

वज़्न: 2122,1212,22/112


#गज़ल-
इश्क उनको सजा सुनाता है,
इश्क जिनको गले लगाता हे।
*
खत्म कर दे कभी वफ़ा दिल से,
यार हर बार याद आता है।
*
पूछ मत आलमे वफ़ा मुझसे,
चाँद हर रात यूँ सताता है।
*
गुलशनों में बहार क्या देखूं,
हुस्न नाजों पला बुलाता है।
*
मयकदे में बुला चले जाना
आशिकों को बड़ा सताता है।
*
आज "अविराज" क्या कहूँ तुमको
इश्क सब को यहाँ मिलाता है।
*************************
~अरविन्द चास्टा ~


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 बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ

अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन

वज़्न: 2122,1212,22/112


ज़िंदगी महकती कहानी है,
हर पलों में भरी रवानी है।

मौत से तू कभी नहीं डरना,
चार ही दिन की जवानी है।

धड़कनों को समेटकर रख लो,
आस,उम्मीद की बढ़ानी है।

जानते हम नहीं कहाँ जायें,
हौंसला जीत की निशानी है।

बेसबब फ़ासला बढ़ा यारा,
ये सुवी प्यार की दिवानी है।

सुवर्णा परतानी , हैदराबाद

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बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ

अर्कान:फाइलातुन-मुफाइलुन-फैलुन/फइलुन

वज़्न: 2122-1212-22/112
ग़ज़ल
तू चली आ किसी बहाने से।
प्यार तुमसे किया जमाने से ।।

अब न कहना तुम्ही चली जाओ।
आ गई तेरे ही सिखाने से ।।

रूठ कर मुझसे तुम नही जाओ।
मान जाओ चलो मनाने से ।।

पास आने से तेरे राहत है।
ज़ख्म मुझको मिला रुलाने से ।।

कायदा है मिलू ख़ुदी तुमसे ।
फ़ायदा है करीब आने से ।।

दोस्त दुनिया मे ऐसे मिलते है।
मिल गया हो कोई ख़ज़ाने से।।

खुद "विनी" को पता है राजे-दिल।
प्यार मिलता ख़ुदी मनाने से ।।

विनीता सिंह "विनी"


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 वज़्न=2122 -12 12- 22/112


ग़ज़ल

बेबजह दूर ज़िन्दगी कर ली
प्यार में पड़ के आशिकी कर ली।

फूल से दुश्मनी निभा कर अब
खुद उसी से ही दोस्ती कर ली।

मौत आती नही पता हमको
फिर बुढ़ापे से खुदखुशी कर ली।

साज़ तुम छेड़ते रहे ज़ालिम!
हमने बर्बाद ज़िन्दगी कर ली ।

थी मुहब्बत सनम कभी तुमसे
आज फिर तुमसे दिल्लगी कर ली।

हाथ पकडे चली सजन का जो
रूह से फिर भी बन्दगी कर ली।।
विनीता सिंह "विनी"
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वज़्न : 2122 - 1212 - 22 / 112
अर्कान : - फ़ाइलातुन , मुफ़ाइलुन , फ़ेलुन / फ़इलुन

बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ
क़ाफ़िया : - आने (उच्चारण)
रदीफ़ : - में

बेवफ़ा की जफ़ा भुलाने में।
याद उसकी सभी मिटाने में।

फासले तो रहे बहुत लेकिन-
नाम शामिल रहा फ़साने में।

जो ख़ुशी तेरे संग थी दिलबर-
ना मिला फिर किसी ख़जाने में।

दौर मुश्किल था आशिक़ी का भी-
मिट गयी ज़िन्दगी निभाने में।

प्यार करते हैं जो यहाँ कृष्णा-
क्या मिला है उन्हें ज़माने में।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर, उ.प्र.

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बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

अर्कान- फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन/ फ़इलुन

वज़्न- 2122 1212 22/112

क़ाफ़िया : - क्या ( आ स्वर ) रदीफ़ : - दूँगा

ज़िन्दगी तुझको और क्या दूँगा।
तू कहे तो तुझे भुला दूँगा।।

आजकल मतलबी ज़माना है।
सिर्फ़ कहता है जाँ लुटा दूँगा।।

तुम समझ लो भले मुझे कमतर।
मैं हूँ क्या ये तुम्हें दिखा दूँगा।।

याद आऊँगा उस घड़ी तुझको।
ख़ुद को दुनिया से जब मिटा दूँगा।।

वार पर वार तुम करो लेकिन।
प्यार करना तुम्हें सिखा दूँगा।।

हौसलों से उड़ान भरता हूँ।
मत समझना कि सर झुका दूँगा।।

"अश्क" तब और मुस्कुरायेंगे।
ज़ख़्म को अपने जब हवा दूँगा।।

@ अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
दि0 - 10/12/2019


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वज़्न: 2122 1212 22
अर्कान:- फ़ाइलातुन, मुफाइलून, फैलुन/ फ़इलून
बह्र ए ख़फ़ीफ मुसद्दस मखबून महजूफ मुक्तअ


आप आये बहार आई है,
रात साक़ी निखार लाई है।

बीत जाये करीब तेरे ही,
शाम देखो बहार लाई है।

साथ तेरे नसीब जागेगा,
सूरत रब से हसीन पाई है।

पाक है प्यार बाखुदा मेरा,
पास मेरे सबा खुदाई है।

आँख तेरी शराब सी यारा,
होश में हूँ वफ़ा निभाई है।

डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

अर्कान- फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन/ फ़इलुन


वज़्न- 2122 1212 22/112

क़ाफ़िया : - गढ़ा ( आ स्वर )
रदीफ़ : - हूँ मैं
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इक कहानी गज़ब गढ़ा हूँ मैं
रो रो के मंजिलें चढ़ा हूँ मैं

था बदन पर कफ़न शुरू से ही
समझो मर-मर के ही बढ़ा हूँ मैं

टूटता मैं रहा हमेशा ही
क्षीण कच्चा खड़ा मढ़ा हूँ मैं

थी सुई मेरे पाँव के नीचे
जिस से अव्वल दरी कढ़ा हूँ मैं

रौशनी की न थी निशां कोई
फोड़ कर आँख को पढ़ा हूँ मैं

शब्दार्थ
मढ़ा - मिट्टी का कच्चा घर

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व
लखनऊ उत्तरप्रदेश

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 बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112

ग़ैर मुरद्दफ़
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जो न टूटे वो सिलसिला हूँ मैं।
तेरे हर दर्द की दवा हूँ मैं।

बैठ तारें हजार गिनता हूँ
सोचता हूँ यही रहा हूँ मैं।

मोल समझा ख़ुशी का जीवन में
दर्द से आज जब मिला हूँ मैं।

फूल खिलते बहार में हरदम
रात आने दो अधखिला हूँ मैं।

चाँदनी रात है सितारे है
ख्याब हूँ आँख में पला हूँ मैं।

आज भी झांकती नजर जिससे
खिड़कियों की तरह खुला हूँ मैं।

हुश्न औ इश्क का तरन्नुम दिल
आज भी खुद से ही जुदा हूँ मै।

आप आओं कभी मेरे घर में
बनके कालीन सा बिछा हूँ मैं।

रहनुमा आप बन गए 'मन' के
सोच कर जिन्दगी जिया हूँ मै।

गीता गुप्ता 'मन'
उन्नाव,उत्तरप्रदेश

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 बह्र ए ख़फीफ: मुसद्दस मख़बून महजूफ मत्त्कूअ
अर्कान : फाइलातुन ,मुफाइलुन फैलुन/फइलुन
वज़्न-2122. 1212. 22/112


काफिया : आर स्वर
रदीफ : होता है
गज़ल

मन परेशान धार होता है ,
सामने जब गद्दार होता है ।

खुश रहो तुम दुआ यही की थी ,
सोच कर नेक खार होता है ।

भीड़ में सब यहाँ सही ही है ,
पाक इंसा शिकार होता है ।

अजनबी सा निखार है उनका ,
ये तराशा बजा़र होता है ।

सामने से यहाँ सभी चुप है ,
मान पे यार वार होता है ।

रजिन्दर कोर (रेशू )
अमृतसर

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