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Thursday, June 25, 2026

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर -


Explained by - Shri jitendra Pal Singh ji
 
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल

122 122 122 12

काफ़िया: होने
रदीफ़: लगा
बंदिश: ओने

मिसरा: "हमें आप से इश्क़ होने लगा,"
पूरा शे'र:

मुलाक़ात जब से हुई आपसे,

हमें आप से इश्क़ होने लगा।

क़वाफी के उदाहरण:

खोने, होने, सोने, डुबोने, पिरोने, 
धोने, ढोने, भिगोने, चुभोने, बोने इत्यादि।

ग़ज़ल
अलग एक दुनिया सँजोने लगा,
मैं ख्वाबों में तेरे हूँ खोने लगा।

मुलाक़ात जब से हुई आपसे,
हमें आप से इश्क़ होने लगा।

कि मुद्दत हुई है मुलाक़ात को,
मैं यादों की माला पिरोने लगा।

मुहब्बत के दरिया में उतरे ही थे,
ज़माना अभी से डुबोने लगा।

सुनाऊँ मैं क्या हाल हालात के,
जिसे देखो नफरत वो बोने लगा।

उड़ी नींद रातें भी बेचैन हैं,
तिरे बिन मिरा दिल ये रोने लगा।

बची चंद साँसे मिरे ज़िस्म में,
बुझा दो ज़रा 'दीप' सोने लगा।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
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नहीं जानते क्यूँ ये होने लगा।
तुम्हें देख कर चैन खोने लगा।।

घड़ी भर में दिल तेरे दीदार से,
तड़प आशिकी की सँजोने लगा।।

अभी हमने लहरों से की दोस्ती,
अभी इश्क़ हमको डुबोने लगा।

हमें झील में देखना चाँद था,
तू आ कर निगाहों में सोने लगा।

दिखा कर तेरा अक्स दिलदार अब,
ये आईना नश्तर चुभोने लगा।।

सहर शाम रटती जुबां नाम जो,
लबों को हमारे भिगोने लगा।।

कशिश इस कदर क़त्ल में थी 'मणि'*
कि जिंदा रहा दिल तो रोने लगा।।


मणि अग्रवाल
देहरादून (उत्तराखंड)

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ख़यालों में इस तर्ह खोने लगा।
फक़त याद को ही सँजोने लगा।

लगे दाग थे उसके चेहरे पे पर,
रगड़ आइने को वो धोने लगा।

नहीं छोड़े अश्कों ने दामन कभी,
बहुत खुश हुआ तो भी रोने लगा ।

किनारे भी गुस्ताख़ी करने लगे,
समंदर को दरिया डुबोने लगा।

रहा इश्क़ में तो नदारद रही,
पर अब चैन की नींद सोने लगा।

रही कोशिशें दूरियाँ हो मगर,
मैं फिर भी उसी का क्यों होने लगा।

तुम अहब़ाब समझे थे 'कश्यप' जिसे,
वहीं आज नश्तर चुभोने लगा।

आयुष कश्यप

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बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


बता दो मुझे क्या ये होने लगा।
न जाने कहाँ दिल ये खोने लगा।

ख़ुदा ने सँवारा तुम्हें नाज़नीं
तुझे देख सपने सँजोने लगा

लगा सूखने प्यार का जब शज़र,
नये ख़्वाब मैं फिर से बोने लगा।

मुहब्बत ख़ता है मुहब्बत बला
मुहब्बत मगर दिल पिरोने लगा।

सुना है मुहब्बत शरारा है इक।
जला रात भर और रोने लगा।

नीलम शर्मा

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बह्र......बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


मुझे प्यार उससे यूं होने लगा।
कि दिल भी फ़क़त आज खोने लगा।

सभी जल रहे नफ़रतों में यहाँ-
कि देखो ख़ुदा ख़ुद भी रोने लगा।

दिलों के भी जज़्बात मरने लगे-
कि जग जैसे सारा ही सोने लगा।

नहीं होगी फ़स्ल ए नफ़रत कभी-
मुहब्बत ही इंसा जो बोने लगा।

जमीं होगी कृष्णा कि जन्नत सभी-
अगर आदमी मन को धोने लगा।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

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बह्र- बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


मुख़ालिफ़ किनारा भी होने लगा,
सफ़ीना हमारा डुबोने लगा।।

जिसे रास आयी न उल्फ़त मेरी,
वो मेरे तसव्वुर में खोने लगा।।

भरम चाहतों का था टूटा अभी,
नये ख़्वाब दिल फिर सजोने लगा।।

मुहब्बत का जिससे रहा वास्ता,
दिलों में वो नफ़रत पिरोने लगा।।

सितमगर ने मुझपे किया जो रहम ,
नमक से मेरा ज़ख़्म धोने लगा।।

ख़फा क्या हुई मुझसे मंज़िल मेरी,
कि रस्ता मेरा बोझ ढोने लगा।।

कमी "अश्क"उसकी न खलने दिया,
जुदाई में दामन भिगोने लगा।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"

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बह्र- बह्रे- मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर


शमा क्या जली शोर होने लगा,
कही नज्म थी कोई रोने लगा।

न चाहा कभी दिल दुखे प्यार में,
मगर वक्त सपनें पिरोने लगा।

लगे प्यार में बेवजह जो कभी,
वही इश्क के दाग धोने लगा।

गमों से भरी रात थी वो खड़ी,
सितारे सहित चाँद खोने लगा।

विवशता बड़ी छोड़ जाना उसे,
विरह में सभी दर्द ढोने लगा।

तमाशा बना आशिकी का सुनो,
कफ़न आँसुओ से भिगोने लगा।

कहाँ कौन "अविराज" तेरी सुने,
समय शूल सबको चुभोने लगा।


अरविन्द चास्टा
कपासन चित्तौड़गढ़ राज।

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तुम्हें तो नहीं ये डुबोने लगा ,
किनारे खड़ा सांस खोने लगा।१।

रहे हो सदा से तम़ाशा बने ,
अभी तो ज़रा कुछ पिरोने लगा ।२।

नया सा रहा ये जमाना सदा ,
यहाँ वक्त यूँ ही सजोने लगा ।३।

हँसी ढूंढ़ती ही रही यूँ उसे ,
तलबगार नज़रे भिगोने लगा ।४।

बुझा सा दिलों को रिझाता रहा ,
खुदी बेखुदी साथ ढोने लगा ।५।

रजिन्दर कोर (रेशू)

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गज़ल़


बह्र......बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर

मुझे प्यार इक़रार होने लगा
कि इज़हार उनसे युँ होने लगा

करूँ इश़्क तुमसे ए जाने जहाँ
मैं सपनों में सपने पिरोने लगा

मिटे हम तुम्हारे लिए इस क़दर
दुआओं में तुमको सँजोने लगा

तुम्हारी अदाओं भरे बात से
ख़ुदाया मुझे प्यार होने लगा

उठे हूक़ जब भी पुकारूँ तुझे
न पाकर तुझे आज रोने लगा

जिसे प्यार करते रहे हम सनम
वही कील दिल में चुभोने लगा

कहे "काव्यधारा" ग़मे इश्क़ में
तु आँसू से आँखें भिगोने लगा

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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Monday, June 15, 2026

बरवै_छंद मात्रिक- Hindi poetry


जय माँ शारदा

सभी गुणीजनों को नमन।

अब तक हमने सम मात्रिक छन्दों पर लेखन अभ्यास किया है।
आज आपके समक्ष अर्धसम मात्रिक बरवै_छंद प्रस्तुत है।
छंद बरवै मात्रिक
लक्षण- विषमनि रविकल बरवै ,सम मुनि साज।
प्रति छंद 4 पद,
चारों पद मिला कर 38 मात्राएँ,
विषम् चरण अर्थात पहला और तीसरा पद 12 मात्रा
सम चरण अर्थात दूसरा और चौथा 7 मात्रा होता है
यथा
12-7
12-7
से एक बरवै छंद पूर्ण होता है
सम चरण सम तुकांत ।
इसे ध्रुव अथवा कुरंग छंद भी कहा जाता है।
पदांत में जगण /121उत्तम माना जाता है 
एवम् तगण/221 को रोचक माना जाता है ।
 अनिवार्यता नही है।
मापनी स्वेच्छा अनुसार ली जा सकती है ।
उदाहरण
वाम अंग शिव शोभित ,शिवा उदार।
सरद सुवारिद में जनु ,तड़ित विहार।
(शास्त्रोक्त)

**************
स्वरचित
गीत मेरे कर रहे,आज पुकार।
आर्त को अब तो सुनो ,तनिक निहार।।
प्रेम के दाता बने, नन्द कुमार।
प्रीत की इस रीत में,कौन विचार।।

~अरविन्द चास्टा अविराज
कपासन चित्तौड़गढ़
राज.
****************
 बरवै_छंद


1.कार्य सारे बन रहे,भाग्य विधान।
लेख सारे तय सदा, मानुष जान।

2.लेखनी यूँ कर रही,भाव बखान।
भानु मानो कह रहा,शुभ्र विहान।

3.प्रेम की कीमत कहूँ ,है अनमोल।
भाव भाषा समझ ले,सत्य टटोल।

4.आस का दीप जलता,हो तम नाश।
दूर हों संकट सभी,है अभिलाष।

स्वरचित
डॉ पूजा मिश्र आशना

*********************
 बरवै छंद


भौतिक सुखों की चाह, दुखमय राह।
कम-अधिक नित झेलना,पीर प्रवाह।
मोहिनी छल की धरे, रूप अथाह।
आत्म सुख संग इसका, कठिन निबाह।।

कर आलिंगन करती, शून्य विचार।
चाहती स्वामित्व का,नित्य प्रसार।
मित्र बन कर बाँटती, खूब उधार।
और बनाए रखती, निज अधिकार।।

चाहते हो मुक्ति यदि, हो प्रभु जाप।
है सुमिरन का अद्भुत, दिव्य प्रताप।
सूख जाती शोक सरि, न हो विलाप।
मार्ग सदगति का यही, लें अब आप।।

मणि अग्रवाल "मणिका"
देहरादून (उत्तराखंड)

******************
 बरवै छन्द

शीर्षक:- अम्बिके

सर्वदानवघातिनी, कर संहार,
हे काली कपालिनी, कह संसार।
अरि नाश कर देविके,बैठे घात,
प्रचंड पाप खण्ड कर,काली रात।

मिटे कलुषित कामना, बढ़ता शोर,
फलित हो शुचि साधना,शुभि हो भोर।
दुख हरो कल्याणिके,झुकते माथ,
आशीष दे मंगला, धरिये हाथ।

माँ दनुजता बढ़ रही, बढ़ते पाप,
हे, रुद्राणी मोहनी, हर संताप।
उद्धार कर शिवे प्रिया,कपटी काल,
जगदम्बिके भवानी,पहनो माल।

चंड मुंड विनाशनी,काटो शीश,
शुभे पिनाकधारिणी, दे आशीष,।
परमेश्वरी विमले,कर दे त्राण,
हे, शुचित फल दायिनी,मेरे प्राण।

मनुजता को प्राण दो, कर दो काज,
वरदायिनी कमलिके, वर दो आज।
अम्बिके शुचि प्रीत दे,जग की मात,
मनमोहनी तम भरी, बीते रात।।

रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल नन्दनी
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

******************
 बरवै -छंद

हो सदा राह अब ये , रोज विचार ।
जोड़ते यूँ सब रहे , हृदय तार ।।
दूर हो आस न यहाँ , हो अब मान ।
प्यार फैले जगत में , योग विधान ।।


यूँ जले दीपक यहाँ , प्रेम पसार ।
प्यार से जीवन चले , स्नेह अधार ।।
सोच ये पावन रहे ,मानव आस ।
जोश से जीवन बढ़े , हो सब पास ।।

रजिन्दर कौर ( रेशू )

*****************

बरवै छंद,

मर्यादित रघुनायक,हैं श्रीराम।
आदर्शों में जिनका,ऊँचा नाम।।
भक्ति जहाँ पर बहती,है अविराम।
अवधपुरी वह सच में,पावन धाम।।

मधुरिम लगता हरदम,यह संसार।
मिट जाते जो उर से,सभी विकार।।
होता केवल जग में,नित त्योहार।
आपस में जो होता,मृदु व्यवहार।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

***********************

बरवै-छंद

पछुआ ओ पुरवाई,चली बयार।
चातक,मोर,पपीहा,करें पुकार।
अचला-आँगन गाये,मृदु-मल्हार।
मधुरिम सा यह सावन,मेह बहार।

श्यामल-सघन गगन में,तड़ित-विहार।
सतरंगी आभा में,धनुक निहार।
नीरद-नाद,निरंकुश,प्रखर प्रहार।
अंतरिक्ष की बाहें, बनी कहार।

बरबस बिखरी बूँदे,मृदा-कुंदन।
सौंधी सी खुशबू में,मलय-चंदन।
खोल दिये बादल ने,घने-गूँथन।
अनराधार बरसते, बिना बंधन।

हिय में हूक उठे है,प्रिये!आओ।
रोम-रोम के पंछी, विरह गाओ।
बदरी ले जा संदेश् ,सजन लाओ।
सुधियों की सिहरन को,बुझा जाऔ।

पेडो़ की डाली पर,झुला डाले,
स्वप्न-स्पर्श के मोती,हृदय पाले।
बरखा की बूँदो को,चलो छू ले।
पियु के संग सखी री!झुला-झूँले।

झरझर मेहा बरसे, हरित आँगन।
अलसाई कलियों में,फलित कानन।
तरुवर शाख लिपटती,नेह पावन।
विधि शृंगार सजे है,पुलिन-सावन।

रागिनी_नरेंद्र_शास्त्री
दाहोद(गुजरात)

******************
बरवै छंद

आज ये सावन खिला,संग बसंत।
रोक ना पाय मन को,रंग अनंत।
लो सभी ओर महके,मंद सुगंध।
ये सभी है प्रकृति का,चंद प्रबंध।।१।।

जो भरे प्रेम धुन से,नित्य उमंग।
साथ लाए मधुर सा,साज तरंग।
सृष्टि से है बिखरता,स्वर निनाद।
हर्ष से मोदित करे,एक प्रमाद।।२।।

पुष्प सारे मद भरें,प्रीत अपार।
आज गाए धुन नयी,काव्य सितार।
नित्य छाए मन सुधा,भाव फुहार।
ये धरा देख भरती,आज दुलार।।३।।

सुवर्णा परतानी

********************
बरवै छन्द

सावन मेघा बरसे ,बजे मृदंग।
छाई है हरियाली ,उठे उमंग।

सजनी धानी चूनर ,ओढ़ लजाय ।
कोयल कूके काली ,मन हुलसाय।

झूला झूले ये मन ,करे पुकार।
कजरी गाऊँ जब मैं ,बजे सितार ।

सावन पावन आया ,बढ़ी कतार ।
पहुँचे सब काँवरिया ,बम-बम द्वार।

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

अनुष्टुप छन्द:- Hindi poetry


Explained By
 Smt. Dr. Neeraj Agrawal ji ,
 Bilaspur 
(chttishgarh )

नमन साहित्य अनुरागी
सभी को गुणीजनों को नमन करते हुए,
 मैं छंदभ्यास की इस कड़ी में उपस्थित हुई हूँ 
अष्टाक्षर वृत का एक छन्द लेकर "अनुष्टुप छन्द"
***********************

अनुष्टुप छन्द:- वार्णिक छन्द

********************

यह एक अष्ठाक्षर वृत्त का प्रमुख छंद श्लोक है ,
जो हर एक काव्य में प्रयोग हुआ है।
 मुख्यतः इसका प्रयोग संस्कृत भाषा में किया जाता है, 
तथापि साहित्यकार होने के नाते सभी को इसकी
 जानकारी होना अति आवश्यक है।
*********************
श्लोक अष्ठाक्षर वृत्त
लक्षण

श्लोके षष्ठम् गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।

द्विचतुष्पादयोहृस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययो:।।
****
अस्य छंदस: षष्ठम् अक्षरं गुरु पञ्चमम च लघु।
सप्तमम अक्षरं प्रथमे तृतीये च पादे गुरु द्विचतुष्पादयो:च
सप्तमम अक्षरं लघु भवति।
श्लोक के चार चरण होते है,
हर चरण में छठवां /6 वर्ण गुरु-2 होता है
हर चरण का पाँचवा 5 वर्ण लघु होता है।
सम चरण 2और 4 में सातवाँ वर्ण लघु 1 होता है
विषम चरण 1और 3 में सातवाँ वर्ण गुरु होता है।
शेष वर्ण स्व इच्छा से लिए जा सकते है।
यथा
हर वर्ण के लिये 0 लिखा जो स्वेच्छिक लेने है । 
अनिवार्य हेतु मात्रा लिखी है।
प्रथम चरण:-वर्ण -8
१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८- वर्ण
0 0 0 0 1 2 2 0
-----------

द्वितीय चरण:-
१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ वर्ण
0 0 0 0 1 2 1 0

तृतीय चरण:-
0 0 0 0 1 2 2 0

चतुर्थ चरण:-
0 0 0 0 1 2 1 0


दो दो चरण अथवा चारों चरण अथवा
 सम चरण तुकांत लिए जा सकते है।


हिंदी भाषा में श्लोक बहुत ही कम प्रचलित है ।
 सीखने के उद्धेश्य से मात्र 2 श्लोक लिखें।


उदाहरण:-
माँ शारदे धरूँ शीश,
विद्या विनय दायिनी।
मंगलमय आशीष,
मोहनी हँस वाहिनी।
********************
ज्ञानमय जले दीप,
ज्ञानदा शुभ कारिणी।
मन मोती बने सीप,
वेदिके तम हारिणी।
******************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)
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अनुष्ठुप छंद। श्लोक

गुरु मिले हमें ऐसे,
हुआ सब सुधार है।
बनी रहे कृपा ऐसे,
मेरी यही पुकार है।।

गुरु हरि समाना ही
भवसागर तार है।
दास पे अनुकम्पा हो,
बस ये अरदास है।।

अरविन्द चास्टा ,कपासन चित्तौड़गढ़। राजस्थान
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अनुष्ठुप छंद

कवि स्वयं विधाता है।
कृति रचे सशक्त ये।
दर्पण वो दिखाता है। भेद भाव विरक्त ये।।

गीत छंद सजा देगा। शब्द बने प्रहार है।
सच को ये दिखा देगा। जैसे ठंडी फुआर है।।

लेखनी उपकारी है। लागे न्यारी तरंग है।
वाणी ये हितकारी है। देता प्यारी उमंग है।।

ये छुए सब सोपान। भावना को दुलारता।
तभी पावत सम्मान। सद्गुणों से निहारता ।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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अनुष्टुप छन्द

साँझ हुई सिंदूरी सी, साँझ आज उजास है।
नाच रही मयूरी सी, सूर्य सजन पास है।

रोम-रोम हर्षे गात, मूक नैन पुकारते।
भानु पिया हिया लात, अपलक निहारते।

आज मिलन होने दो, सूर्य सजन पास है।
प्रेम मन डुबोने दो, साँझ आज उजास है।

प्रेमी पाति पढ़ाने दो, हृदय पिय प्रीत है,
आस नभ चढ़ाने दो, दिनेश तम जीत है।

नीलम शर्मा 

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अनुष्टुप छन्द


जहर घोलने वाला, देखो घूमे जहाँ-तहाँ ।
काट जहर को देख , जो फैले हैं यहाँ-वहाँ ।।

स्वच्छ जहां बना लो जी, दम घुट रहा सुनो ।
कंचन जग हो सारा , पथ ऐसा सभी चुनो ,

नारी शोषित क्यों होती , क्यों कल्पित सुता यहाँ ?
राहों में लुटती स्त्री है , गंदा देखो हुआ जहां ।।

मां का स्वप्न जला डाला , गोदी जो थी बढ़ी पली ।
रोई थी फुलवारी भी , सूना देखो सभी गली ।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व
लखनऊ उत्तरप्रदेश

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अनुष्टुप छन्द


कुटिलता भरे कर्म, माथे तिलक चंदन।
आडम्बर भरा धर्म, सब माया का क्रंदन।

घट घट बसे राम, पर बाहर खोजते।
बारम्बार जपो नाम, मन क्या तुम सोचते।

नश्वर सब संसार, निश्चित देह अंत है।
तज मोह अहंकार, आत्मा ये ईश अंश है।

धर्म का मर्म जानो रे! मानवता प्रधान है।
हरि का ध्यान धारो हे! भक्ति का ये विधान है।

भवसागर निस्तार, ये जन्म अनमोल है।
गुरु चरण उद्धार, शुभ कर्म निदान है।

जितेंदर पाल सिंह

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अनुष्टुप छंद- वर्णिक
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तुम ही तो विधाता हो, तुमसे ही विधान है,
तुमसे साँझ होती है, तुमसे ही विहान है।।

जग के हो तुम्हीं दाता, तुम साथी अनाथ के,
तुम्हरी है कृपा सारी, बिगड़े को सँवार दे।।

तुमसे जीव सारे हैं, नभ से ले धरा सभी,
तुम हो बेसहारों के, कब भूले तुम्हें कभी।।

हम क्या ले यहाँ आये, जग ये क्यों लड़े यहाँ,
धन के लोग हैं लोभी, जब देखो जहाँ - तहाँ।।

तम हारे उजाला हो, सच की धारणा धरूँ,
अबला को बना ज्वाला, प्रभु ये विनती करूँ।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"

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अनुष्टुप छ्न्द 


प्रमुदित यहां सीता 
कोयल मृदु भाषिणी 
गावत सब हैं गीता 
कूकत मन शोभिणी 
......
नाम जपत है राधा 
प्रीत निरखने लगी 
कृष्ण बसत है आधा 
सिम्पल लिखने लगी 
......
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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अनुष्टुप छंद 

ये जगत दिखाता है
आस तन तरंग है
प्रेम मन बनाता है
राह सब उमंग है ।

लोग जग सजा देगें
प्रभु जगत आस है
मान सब बना देगें
दात सजन पास है ।

सांझ जग बहारे हैं
मान यह पुकार लो
लोग सब सहारे हैं
साथ सब सँवार लो ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर