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Friday, June 26, 2026

शुभोदर छंद




Explained By-
 Shri Abhay Anand Ji Lakhnau

शुभोदर छंद
नमन साहित्य अनुरागी। साहित्य अनुरागी के समस्त गुणीजनों को नमन करते हुए मैं अभय कुमार आनंद आपके समक्ष नवाक्षर (९ वर्णिक) छंद की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए बेहद सुंदर छंद शुभोदर (भ भ भ) तीन भगण अर्थात
गुरु लघु लघु गुरु लघु लघु गुरु लघु लघु
लेकर उपस्थित हुआ हूँ।
मो गुणवंत शुभोदर। लेखत दिन सहोदर।
तो सम कौन सहायक।तूहि सदा सुखदायक।।


छन्द प्रभाकर।
वर्णवृत्तों में गणों का काम पड़ता है। तीन वर्णों के समूह को गण कहते हैं।ये गण 8 हैं। जिसकी चर्चा हमलोग पहले कर चुके हैं।आज हम अभ्यास करेंगे तीन भगण का ।भगण (गुरु लघु लघु) का अवतार सप्तम-भानुज(रामचंद्र), स्वामी- शशि, फल यश है। व्याख्या- भानुवंशी रामचन्द्र जी का शीतल यश संसार में विदित है। भगण में एक दीर्घ के पश्चात दो लघु स्वर का समान बल होता है।
१.शुभोदर छंद में तीन भगण होते हैं ।
२. चार चरण जिसमें चारों चरण समतुकांत या दो -दो चरण क्रमशः समतुकांत होते हैं
३. चरणान्त में यति

उदाहरण :
राम-सिया मनभावन।
बेहद रूप सुहावन।
राम वसें हिय अंदर।
हैं भगवान सहोदर।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व

लखनऊ उत्तरप्रदेश
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शुभोदर छंद(नवाक्षरवृति वार्णिक छंद)
[भगण भगण भगण
211 211 211


सोच सदा रख नूतन,
सार्थक और चिरन्तन।
मानवता सुख उत्तम,
बात यही अतिउत्तम।।

अन्तस हो मृदु धारक,
विश्व सदा सुख कारक।
अंतस पावन प्रेमिल,
हो उर सादर नेहिल।।

जातियता अति बाधक,
प्रेम बने सुख साधक।
पाठ रहे उर अन्दर,
जीवन हो अति सुन्दर।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर
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सादर 🙏 प्रेषित

मान पिया मनमोहन।
जान जिया मम जीवन।
आन मिलो मुरलीधर।
प्राण बनो उर भीतर।
नीलम शर्मा 

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शुभोदर छंद

जीवन का पल व्याकुल।
नैन बने अब आकुल।
बैरन हो तब सावन।
छोड़ गए जब साजन।

शूल चुभे मन अंदर।
आग लगे तन भीतर।
टूट चुकी मृदु चाहत।
आज हुयी प्रिय आहत।।

ये बरखा धुन जाचक।
जो खिलता नव मादक।
राग बने तब दाहक।
प्रेम जले बन नाशक।।

भाव जगे उर भीतर।
बेबस आज समंदर।
रास नहीं जग जीवन।
पार भए सब बंधन।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद
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 "शुभोदर छन्द "

पावस मास सुहावन,
ये बदली मनभावन।
दादुर शोर मचावत,
है मधु गीत सुनावत।

शीत बयार बहावत,
सूखल पेड़ गिरावत।
लागत ॠतु भयानक,
बारिश होय अचानक।

देखत घोर घटा जब,
नाचत मोर खुशी तब।
खेत किसान हरा अब,
नाचत गाबत हैं सब।

शंकर राख लगावत,
नाग गले लिपटावत।
शोभत देव जटाधर,
सावन मास उमा घर।

रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट"
बेगूसराय,बिहार

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 "शुभोदर छन्द"

जीवन का सुख बाधक।
साधु सधे मुख साधक।
हूँ बलवान सहूँ तन ।
क्यू समझा नहि है मन।

विनी
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शुभोदर छंद

सादर वन्दन मोहन,
स्वागत है मनमोहन।
आपहि जीवन दायक,
है जग पालक मोहन।

कानन कानन माधव,
आगम दर्शक माधव।
मोहक मादक मंगल ,
गोकुल रक्षक माधव।।


अरविन्द चास्टा
कपासन चित्तौड़गढ़

___________________________

 !!शुभोदर छन्द!!

नवाक्षरवृति छन्द 9 वर्ण

गोकुल धेनु चरावत,
मोहन मात बतावत,
फोड़ दई दधि गागर,
मौन भये नट नागर।

क्षीर सखा सब खावत,
झूठहि नाम लगावत,
लेप लगाय दियो मुख,
नैनन देख मिले सुख।

माधव वेणु बजावत,
गौ नित रेणु उड़ावत,
क्षीरज ग्वाल सखा मिल,
केशव गात गए खिल।

आँगन माधव खेलत,
मात यशोमति देखत,
चाँद सितार दिखावत,
मोहन गोद बिठावत।

मोहक माखन खावत,
देख लाल मुस्कावत,
केश सुहावत कुंतल,
नीरज लोचन चंचल।
*********************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल

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शुभोदर छन्द (वर्णिक)

बंधन तोड़ दिए सब,
छोड़ शरीर चला अब।
मानस की गति ये बस,
छूट गए जग के रस।

मात-पिता बनिता सुत,
रोवत देख पड़ा मृत।
क्यूँ अभिमान करो जन,
छूटत निश्चित ये तन।

मानस जन्म मिला जब,
मोह तजो जग के सब।
कर्म करो बन सज्जन,
नाम जपो हरि का मन।

दुर्लभ मानस का तन,
भाग्य बड़े मिलता सुन।
पार करो भवसागर,
प्रेम भरो मन गागर।

ध्यान धरो हरि का नित,
लिप्त रहो पर के हित।
नाम लगे मनभावन,
भाग्य बने शुभ पावन।

जितेंदर पाल सिंह

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शुभोदर छंद-

जीवन रूप अलौकिक
मानव जीवन भौतिक
सागरिका सुख की यह
क्षीण शिखा दुख की यह।

शोभित रूप दिवाकर
प्राण भरे नित आकर।
पुष्प सुलोक लुभावन
भोर लगे अति पावन।

प्रेरक सत्य सनातन
नित्य करो अभिवादन
मात पिता गुरु प्रेरक
जीवन राह सुधारक।

मानवता अभिकारक
कोटिक प्रेम विचारक।
पाठ पढ़े नित सुन्दर
भाव भरे हिय अन्दर।।

वृक्ष हमें फल देकर,
दाम नहीं कुछ लेकर
है परमारथ जीवन
मानव प्राण सजीवन।

राह शिला बन आकर
प्राण सप्रेम निछावर।
राम बने शुचि तारक
प्रेम उपासक कारक।

गीता गुप्ता 'मन'

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शुभोदर छ्न्द

सोच लिया मन में जब
काज तभी कर ले सब
ठोकर खा कर तू चल
सुन्दर जीवन है कल

वर्ष नया यह है प्रिय
प्रेम बसे ‌सबके हिय
हो शुभ लाभ सदा जग
बोलत कोयलिया खग

छाय रही खुशियां अब
गूंज रहा धरती नभ
बीत गया यह ‌जो पल
सुन्दर हो अपना कल

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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शुभोदर छंद 

ये मन हो अब साधक,
हो न यहां अब बाधक ।
प्रेम रहे मन अंदर ,
स्नेह जगे हर मंदर ।

पुष्प रहे मन पावन ,
फूल खिले हर सावन!
पेड़ सजे हर आँगन,
वृक्ष लगे जग साजन ।

प्यार सभी अब देकर,
प्रेम सभी अब लेकर !
मान सभी कर जाचक,
बोल मिठे कर वाचक ।

दो न यहाँ दुख मानव,
जीवन हो सुख दानव !
मान सभी जग में अब,
नाम चले नभ में अब ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर
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नमन साहित्य अनुरागी 

द्वंद बड़ा सहता मन ।
दर्शित किन्तु नही तन।।
घाव अनेक लिये हिय ।
होठ सदैव रखे सिय।।

आप लड़े उर में रण ।
देह नही लघु सा कण।।
मानस साक्ष्य बना रख ।
जीवन खार रहा चख।।

आज कहूं धीर धर ।
मंथन वो पीर कर।।
थाति रहे बन जीवन।
साथ यही घन सा वन।।

आत्म सुज्ञान बसे यह।
लेख विधान बदे सह।।
कर्म भले करता चल ।
राह नई गढ़ता चल।।

जो मिलता कह क्या कम।
लाभ नही दृग हो नम ।।
अर्पित जीव करूँ निज।
कष्ट सभी मन के तज।।

ललिता

           

Monday, June 15, 2026

बरवै_छंद मात्रिक- Hindi poetry


जय माँ शारदा

सभी गुणीजनों को नमन।

अब तक हमने सम मात्रिक छन्दों पर लेखन अभ्यास किया है।
आज आपके समक्ष अर्धसम मात्रिक बरवै_छंद प्रस्तुत है।
छंद बरवै मात्रिक
लक्षण- विषमनि रविकल बरवै ,सम मुनि साज।
प्रति छंद 4 पद,
चारों पद मिला कर 38 मात्राएँ,
विषम् चरण अर्थात पहला और तीसरा पद 12 मात्रा
सम चरण अर्थात दूसरा और चौथा 7 मात्रा होता है
यथा
12-7
12-7
से एक बरवै छंद पूर्ण होता है
सम चरण सम तुकांत ।
इसे ध्रुव अथवा कुरंग छंद भी कहा जाता है।
पदांत में जगण /121उत्तम माना जाता है 
एवम् तगण/221 को रोचक माना जाता है ।
 अनिवार्यता नही है।
मापनी स्वेच्छा अनुसार ली जा सकती है ।
उदाहरण
वाम अंग शिव शोभित ,शिवा उदार।
सरद सुवारिद में जनु ,तड़ित विहार।
(शास्त्रोक्त)

**************
स्वरचित
गीत मेरे कर रहे,आज पुकार।
आर्त को अब तो सुनो ,तनिक निहार।।
प्रेम के दाता बने, नन्द कुमार।
प्रीत की इस रीत में,कौन विचार।।

~अरविन्द चास्टा अविराज
कपासन चित्तौड़गढ़
राज.
****************
 बरवै_छंद


1.कार्य सारे बन रहे,भाग्य विधान।
लेख सारे तय सदा, मानुष जान।

2.लेखनी यूँ कर रही,भाव बखान।
भानु मानो कह रहा,शुभ्र विहान।

3.प्रेम की कीमत कहूँ ,है अनमोल।
भाव भाषा समझ ले,सत्य टटोल।

4.आस का दीप जलता,हो तम नाश।
दूर हों संकट सभी,है अभिलाष।

स्वरचित
डॉ पूजा मिश्र आशना

*********************
 बरवै छंद


भौतिक सुखों की चाह, दुखमय राह।
कम-अधिक नित झेलना,पीर प्रवाह।
मोहिनी छल की धरे, रूप अथाह।
आत्म सुख संग इसका, कठिन निबाह।।

कर आलिंगन करती, शून्य विचार।
चाहती स्वामित्व का,नित्य प्रसार।
मित्र बन कर बाँटती, खूब उधार।
और बनाए रखती, निज अधिकार।।

चाहते हो मुक्ति यदि, हो प्रभु जाप।
है सुमिरन का अद्भुत, दिव्य प्रताप।
सूख जाती शोक सरि, न हो विलाप।
मार्ग सदगति का यही, लें अब आप।।

मणि अग्रवाल "मणिका"
देहरादून (उत्तराखंड)

******************
 बरवै छन्द

शीर्षक:- अम्बिके

सर्वदानवघातिनी, कर संहार,
हे काली कपालिनी, कह संसार।
अरि नाश कर देविके,बैठे घात,
प्रचंड पाप खण्ड कर,काली रात।

मिटे कलुषित कामना, बढ़ता शोर,
फलित हो शुचि साधना,शुभि हो भोर।
दुख हरो कल्याणिके,झुकते माथ,
आशीष दे मंगला, धरिये हाथ।

माँ दनुजता बढ़ रही, बढ़ते पाप,
हे, रुद्राणी मोहनी, हर संताप।
उद्धार कर शिवे प्रिया,कपटी काल,
जगदम्बिके भवानी,पहनो माल।

चंड मुंड विनाशनी,काटो शीश,
शुभे पिनाकधारिणी, दे आशीष,।
परमेश्वरी विमले,कर दे त्राण,
हे, शुचित फल दायिनी,मेरे प्राण।

मनुजता को प्राण दो, कर दो काज,
वरदायिनी कमलिके, वर दो आज।
अम्बिके शुचि प्रीत दे,जग की मात,
मनमोहनी तम भरी, बीते रात।।

रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल नन्दनी
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

******************
 बरवै -छंद

हो सदा राह अब ये , रोज विचार ।
जोड़ते यूँ सब रहे , हृदय तार ।।
दूर हो आस न यहाँ , हो अब मान ।
प्यार फैले जगत में , योग विधान ।।


यूँ जले दीपक यहाँ , प्रेम पसार ।
प्यार से जीवन चले , स्नेह अधार ।।
सोच ये पावन रहे ,मानव आस ।
जोश से जीवन बढ़े , हो सब पास ।।

रजिन्दर कौर ( रेशू )

*****************

बरवै छंद,

मर्यादित रघुनायक,हैं श्रीराम।
आदर्शों में जिनका,ऊँचा नाम।।
भक्ति जहाँ पर बहती,है अविराम।
अवधपुरी वह सच में,पावन धाम।।

मधुरिम लगता हरदम,यह संसार।
मिट जाते जो उर से,सभी विकार।।
होता केवल जग में,नित त्योहार।
आपस में जो होता,मृदु व्यवहार।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

***********************

बरवै-छंद

पछुआ ओ पुरवाई,चली बयार।
चातक,मोर,पपीहा,करें पुकार।
अचला-आँगन गाये,मृदु-मल्हार।
मधुरिम सा यह सावन,मेह बहार।

श्यामल-सघन गगन में,तड़ित-विहार।
सतरंगी आभा में,धनुक निहार।
नीरद-नाद,निरंकुश,प्रखर प्रहार।
अंतरिक्ष की बाहें, बनी कहार।

बरबस बिखरी बूँदे,मृदा-कुंदन।
सौंधी सी खुशबू में,मलय-चंदन।
खोल दिये बादल ने,घने-गूँथन।
अनराधार बरसते, बिना बंधन।

हिय में हूक उठे है,प्रिये!आओ।
रोम-रोम के पंछी, विरह गाओ।
बदरी ले जा संदेश् ,सजन लाओ।
सुधियों की सिहरन को,बुझा जाऔ।

पेडो़ की डाली पर,झुला डाले,
स्वप्न-स्पर्श के मोती,हृदय पाले।
बरखा की बूँदो को,चलो छू ले।
पियु के संग सखी री!झुला-झूँले।

झरझर मेहा बरसे, हरित आँगन।
अलसाई कलियों में,फलित कानन।
तरुवर शाख लिपटती,नेह पावन।
विधि शृंगार सजे है,पुलिन-सावन।

रागिनी_नरेंद्र_शास्त्री
दाहोद(गुजरात)

******************
बरवै छंद

आज ये सावन खिला,संग बसंत।
रोक ना पाय मन को,रंग अनंत।
लो सभी ओर महके,मंद सुगंध।
ये सभी है प्रकृति का,चंद प्रबंध।।१।।

जो भरे प्रेम धुन से,नित्य उमंग।
साथ लाए मधुर सा,साज तरंग।
सृष्टि से है बिखरता,स्वर निनाद।
हर्ष से मोदित करे,एक प्रमाद।।२।।

पुष्प सारे मद भरें,प्रीत अपार।
आज गाए धुन नयी,काव्य सितार।
नित्य छाए मन सुधा,भाव फुहार।
ये धरा देख भरती,आज दुलार।।३।।

सुवर्णा परतानी

********************
बरवै छन्द

सावन मेघा बरसे ,बजे मृदंग।
छाई है हरियाली ,उठे उमंग।

सजनी धानी चूनर ,ओढ़ लजाय ।
कोयल कूके काली ,मन हुलसाय।

झूला झूले ये मन ,करे पुकार।
कजरी गाऊँ जब मैं ,बजे सितार ।

सावन पावन आया ,बढ़ी कतार ।
पहुँचे सब काँवरिया ,बम-बम द्वार।

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

Sunday, June 14, 2026

सार छंद- Hindi poetry




Explained By Smt Simple kavyadhara ji prayagraj
आप सभी साहित्य अनुरागियों को स्नेहिल नमन,🙏 🌹
🌹मित्रों हम सभी एक साथ कदम से कदम मिलाकर साहित्य की ओर बढ़ रहे हैं और एक से एक उम्दा छ्न्दों पर अभ्यासरत हैं ,🌹
🌹अनुरागी बन्धुजनों पुनः छ्न्द शृंखला के अन्तर्गत मैं " सिम्पल काव्यधारा " आप सभी के लेखन हेतु सार छ्न्द लेकर उपस्थित हुई हूँ।🌹
..........
🌹आइये हम सब अपनी - अपनी लेखनी से भावों को उकेर कर काव्यसागर में डूबते हुए सुन्दर सृजन करते हैं।

........🌹
🍁🍁🍁🍁
सार छंद
विधान __ यह यौगिक जाति का छ्न्द है सममात्रिक ,यह 28 मात्रिक छ्न्द है । यति 16,12 पर ।
पदांत 22 अनिवार्य है जिसे वाचिक भार के अनुसार भी लिया जा सकता है। अर्थात 112/211 परन्तु पूर्ण गुरु वर्ण 22 होना उत्तम माना गया है।
कुल चार चरण , 22 चरण तुकांत, या चारो चरण समतुकान्त।
-----

रचना
सज-धज कर अब चलीं सुहागन ,तीज पर्व यह आया। रखा प्रेम से व्रत सतियों ने, पूजा थाल सजाया।। भर देती है सबकी झोली , वैभव का सुख देती । जो नारी निष्ठा से माँ की , महिमा को सुन लेती 1 काज सफल करते हैं सबके , गौरा राजदुलारे। सबसे पहले पूजित गणपति , भोले को अति प्यारे। रात्रि जागरण करते हैं सब , ढोल मजीरे बजते। खुश होकर वह वर देती हैं ,जो माता को भजते । 2

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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सार छंद (28 मात्रिक छंद)
जाति: यौगिक
सममात्रिक , यति 16,12 पर ।
पदांत 22 अनिवार्य है जिसे वाचिक भार के अनुसार भी लिया जा सकता है। अर्थात 112/211 परन्तु पूर्ण गुरु वर्ण 22 होना उत्तम माना गया है।
कुल चार चरण , 22 चरण तुकांत, या चारो चरण समतुकान्त।
प्रयुक्त मापनी: 2122 2122 2, 122 2122

कौन? जाने कब? घड़ी आये, कहाँ? पर हो विदाई,
हाथ खाली कर चलेंगे हम, जलेगी देह भाई।
प्रीत ऐसी सब दिखाएंगे, नयन फूटे रुलाई,
कर्म ऐसे मत करो लोगों, करे ये जग हँसाई।

दम्भ जीवनभर किया था जो, मिला है आज माटी,
अंत आएगा नहीं सोचा, भुला कर आयु काटी।
डगमगाए पग बुढ़ापे में, नहीं कोई सहारा,
श्वास की पूँजी गँवायी सब, चले अब जीव हारा।

साथ कोई भी नहीं जाता, हुआ अब मन अकेला,
पंचतत्वों में मिले देही, धरा का छोड़ मेला।
काल से बचता नहीं कोई, जिसे चाहे बुलाये,
प्राण निकले ढेर हो काया, नहीं फिर लौट पाये।

मोह माया के लगे बंधन, नहीं सुध नाम आये,
योनियों में अब भटकता है, कहाँ ? फिर ठौर पाये।
गुरु कराए पार भव-सागर, बनो हरि नाम लेवा,
ध्यान हरि के नाम का धरना, मिलेगा मुक्ति मेवा।

कर्मफल प्रारब्ध तय करता, यही बस साथ जाये,
जो करे सद्कर्म इस जग में, वही हरि धाम पाये।
जन्म मानुष का बड़ा दुर्लभ, कभी मत भूल जाना,
जाग रे! मन गुरु शरण में जा, अगर है ज्ञान पाना।

जितेंदर पाल सिंह।

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सार छंद,२८ मात्रिक,१६-१२ पर यति,अंत-गुरु अनिवार्य
दो या चारो चरण समतुकांत

बाधाएं कितनी भी आएं,आगे बढ़ते जाना।
आशाओं के दीप जलाकर,हरदम चलते जाना।।

जीवन है संग्राम यहाँ पर, सदा बात यह मानो।
मिट जाएगी स्याह अमावस,मनुज रात यह मानो।।
अन्तर्मन का साहस अविचल,राह सदा ही देता।
प्रतिपल सबको जीने की यह, चाह सदा ही देता।।
आत्मसात कर इस निश्चय को,सदा निखरते जाना।
बाधाएं कितनी--------

घोर निराशाएं मन को प्रिय,जब विचलित करती हैं।
प्रबल सशंकित होकर तब ये,आशायें डरती हैं।।
असफ़लता से मिले सफलता,सत्य परम पहचानो।
रखकर ध्यान पार्थ को प्रियवर,लक्ष्य चरम पहचानो।।
फल की चिंता छोड़ कर्म तुम,अपना करते जाना।
बाधाएं कितनी-------

वीर पुरुष के हाथों में जब,तलवार चमकती है।
ऊर्जाओं से युक्त सदा हो,बिना रुके चलती हैं।
हृदय अटल विश्वास जहाँ पर,हरदम ही पलता है।
उसी हृदय में मनुज सदा ही,अमिय पुष्प खिलता है।।
बन नदिया की धार सदा तुम,अविरल बहते जाना।
बाधाएं कितनी-------

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

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 #सार_ छन्द {यौगिग जाति}
28 मात्रिक 16, 12 यति
अंत 22 (गुरु गुरु)
दो दो या चारो चरण समतुकांत
शीर्षक:- गणेश प्रार्थना

हे! सिद्धि विनायक गणनायक, मूषक करें सवारी,
काज सवाँरे जगनायक प्रभु,करें कृपा गजधारी।
मंगल कारक विध्न विनाशक,मोक्ष जगत से पाउँ,
सुखकारी दुखहारी गणपति,चरणं शीश नवाऊँ।
*** *** *** *** ***
हे !लम्बोदर अंनतरुपा,जग के पालनहारी,
मधु मोदक प्रिय हे! गजनन्दन,राखो लाज हमारी,
हे !गजाकार हे ! गजरूपा,तुम हो अंतरयामी,
हे ! देव देवाधि महाकाय,मैं पापी खलकामी।
*** *** *** *** ***
हे ! मंगलमूरत मुढाकरम,हे ! सूपकर्ण देवा,
हे!एकाक्षर हे!एक दंत,रुचि मन मोदक मेवा।
हे ! मूषक वाहक विनय करूँ,द्वार तिहारे आया,
विध्नेश्वर करुणा निधान, शंकरसुवन सुताया।
*** *** *** *** ***
गौरी नन्दन शत अभिनन्दन,विनती सुनो हमारी,
हे! विध्नराज करो पूर्ण काज,प्रथमेश्वर सुखकारी।
हेरम्ब नाथ हे!सिद्धि प्रियम,बल बुद्धि शुभ दाता,
शुचि मंगल मूरत को ध्यावे,
सुख संपति फल पाता।
*** *** *** *** ***
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल नन्दिनी
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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सार छंद (28 मात्रिक छंद )
जाति: यौगिक
सममात्रिक , यति 16, 12 पर ।
पदांत 22 अनिवार्य है
कुल चार चरण
दो या चारो चरण समतुकांत

2122 2122 2, 122 2122

यूँ सदा ही सब चलो रास्ते , पड़ेगा भूल जाना ,
है सभी को आपदा सहना , धरा को मान जाना ।
साथ अपना यूँ सभी देना, कभी करना न धोखा ।
दर्द तुम यूँ ही सहे जाना , करो खुद से न धोखा ।।


यूँ करो सब साफ घर बाहर , न प्रदूषण आऐगा ।
अब सभी मिलकर करो संयम , करोना कब बढ़ेगा ।
देश हित में काम सब आना , न पछताना पड़ेगा ।
सब करे ऐसे जगत सुखमय , न कोई अब लडे़गा ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर

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सार छंद -- 28 मात्रिक छंद 16,12 पर यति
अंत गुरु अनिवार्य
दो दो सम तुकांत चरण ,या चारो सम तुकांत।
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चलो हम अपना घर बनाते,हो सुंदर न्यारा सा।
जहाँ रहते मिल जुल कर सभी,का मन हो प्यारा सा।
कभी बुनते सिलते फर्द खुद,जुदा होकर निभातें
यही सब सीख मिलती है जो,हमको सदा सिखातें
★★★★★★★★★★★★★★★★★

चँचल चितवन दहके अनल हिय,गेसू भी कुछ कहता।
भूल हुई लौट आओ पिया,सावन बीता जाता।
फुले पलाश टेसू महका कि,ग्रीष्म ऋतु है आई ।
छाई बदरिया सजन देखो, जेठ चले पुरवाई।
★★★★★★★★★★★★★★★★★

लौट आओ पिया खुदी मान,जाओ तुम अब कहना।
सीता की अग्नि परीक्षा क्या,देनी मुझे बताना।
ये जीवन नश्वर हैं कैसा,लोभ मोह बैरागी।
बन जाना है जब हम सबको, जीवन मे अनुरागी ।

Vini Singh

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 #विषय**होली गीत**
#विधा:-सार छंद आधारित गीत,,,विधान:-१६-१२मात्रा पर यति,पदांत गुरु-गुरु(२ २)
#तिथि_१९.०४.२०२०
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मंद अमंद सुगंध सजे जब, बासंती बौराए
मृदु-मृदंग 'ओ'भंग-चंग ले,हुताशनी महकाए।
माघी को थपकी दे फागुन,फाग सुरीले गाए,,,,,,

पीली-पीली सरसों फूले,आम्रमंजरी डोले,
कानों मे अमरत-रस घोले,तरु पर कोयल बोले।
मदिर मदिर रति के नयना भी,रसिके!गीत सुनाएं
माघी को थपकी दे फागुन,फाग सुरीले गाए।

प्रणयन! पलास है बौराया,उर-वीथीं में छाया,
रग-रग,लाल,अबीर,गुलाबी,नटनागर मन भाया।
कृष्ण-राधिके!श्याम-गौर हैं,मधुमय,फाग रचाए,
माघी को थपकी दे फागुन,फाग सुरीले गाए ।

मधुर-मुरलियां,तान सुरीली,सांसो में रस घोले,
उर अंबुज के,नेह-हिलोरे,थन थन थिरकत डोले।
मदने!रति सारुप्य राधिका,मदन देख शरमाए,
माघी को थपकी दे फागुन,फाग सुरीले गाए।

रक्तिम अधर कपोल विकंपित,हाथ-रुचिर,रंगीले
होरी खेले, संग मनोहर! मन्मथ-मना,छबीले।
रसिक-शिरोमणि!रसमय मदने!राधे-नैन,रिझाए,
माघी को थपकी दे फागुन,फाग सुरीले गाए।

मन मलिन के छार घुल,गहे,सुभग नेह की बाती,
सराबोर उभया उर शुचिता,चहु-दिश्,रंग सजाती।
होली का सौंदर्य रसीला,काफी राग सुनाए।
माघी को थपकी दे फागुन,फाग सुरीले गाए।
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#दाहोद_गुजरात

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सार छंद

28 मात्रिक छंदजो नर नित प्रयासरत रहते, लक्ष्य प्राप्ति अभिलाषा।
16-12 पर यति
अंत-22 वाचिक भार

खड़ी सफलता द्वार तुम्हारे , बहती कर्मठ धारा।
नित्य परिश्रम से हो मानव ,जीवन में उजियारा ।


राह भाग्य की कभी न देखो ,दीपक कर्म जलाओ ।
कर्म मनुज का आभूषण है,इसको ही अपनाओ ।
अकर्मण्यता शत्रु तुम्हारी, रखना इससे दूरी ।
जीवन से पल में हर लेगी, यह प्रभात सिंदूरी ।
भर देगा आलस जीवन में, मलिन सघन अँधियारा।
नित्य परिश्रम - - - - - - - - - - -- - - - - - -


माना राह कठिन है इसकी, कितने विघ्न खड़े हैं ।
भरा आत्मबल जिस मानव में, हिम से अधिक अड़े हैं।
पंगु चढ़ रहे पर्वत चोटी ,मन विश्वास जगा कर ।
शूल राह के पुष्प बनेंगे,श्रम से नेह लगाकर ।
कर्महीन मानव नित जग में, कर्म पुरुष से हारा ।
नित्य परिश्रम - - - - - - - - - - - - - - - - - -- -


राह खड़ी बाधाएं कितनी, तेरा पथ रोकेंगी।
जग के भाँति -भाँति बंधन में , तुझको नित बांधेगी।
कर्म साधना के साधक को, संबल यही बनेंगे ।
कर्म जगत में पूजित होगा, पुनि -पुनि नमन करेंगे ।
असफलता का विष पीकर तुम ,विजित करो जग सारा।
नित्य परिश्रम- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -

कर्म त्यागकर कहां मिलेगी, जग में सुख की आशा।
कर्महीन मानव का जीवन, इस जग में निष्फल है।
भाग्यप्रणेता बनो स्वयं के, श्रम दे सुखकर फल है।
परिवर्तित कर दो मृदुजल में ,सागर का जल खारा ।
नित्य परिश्रम- - - - - - - - - - - - - 

गीता गुप्ता 'मन'
उन्नाव,उत्तरप्रदेश


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