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Friday, June 26, 2026

शुभोदर छंद




Explained By-
 Shri Abhay Anand Ji Lakhnau

शुभोदर छंद
नमन साहित्य अनुरागी। साहित्य अनुरागी के समस्त गुणीजनों को नमन करते हुए मैं अभय कुमार आनंद आपके समक्ष नवाक्षर (९ वर्णिक) छंद की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए बेहद सुंदर छंद शुभोदर (भ भ भ) तीन भगण अर्थात
गुरु लघु लघु गुरु लघु लघु गुरु लघु लघु
लेकर उपस्थित हुआ हूँ।
मो गुणवंत शुभोदर। लेखत दिन सहोदर।
तो सम कौन सहायक।तूहि सदा सुखदायक।।


छन्द प्रभाकर।
वर्णवृत्तों में गणों का काम पड़ता है। तीन वर्णों के समूह को गण कहते हैं।ये गण 8 हैं। जिसकी चर्चा हमलोग पहले कर चुके हैं।आज हम अभ्यास करेंगे तीन भगण का ।भगण (गुरु लघु लघु) का अवतार सप्तम-भानुज(रामचंद्र), स्वामी- शशि, फल यश है। व्याख्या- भानुवंशी रामचन्द्र जी का शीतल यश संसार में विदित है। भगण में एक दीर्घ के पश्चात दो लघु स्वर का समान बल होता है।
१.शुभोदर छंद में तीन भगण होते हैं ।
२. चार चरण जिसमें चारों चरण समतुकांत या दो -दो चरण क्रमशः समतुकांत होते हैं
३. चरणान्त में यति

उदाहरण :
राम-सिया मनभावन।
बेहद रूप सुहावन।
राम वसें हिय अंदर।
हैं भगवान सहोदर।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व

लखनऊ उत्तरप्रदेश
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शुभोदर छंद(नवाक्षरवृति वार्णिक छंद)
[भगण भगण भगण
211 211 211


सोच सदा रख नूतन,
सार्थक और चिरन्तन।
मानवता सुख उत्तम,
बात यही अतिउत्तम।।

अन्तस हो मृदु धारक,
विश्व सदा सुख कारक।
अंतस पावन प्रेमिल,
हो उर सादर नेहिल।।

जातियता अति बाधक,
प्रेम बने सुख साधक।
पाठ रहे उर अन्दर,
जीवन हो अति सुन्दर।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर
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सादर 🙏 प्रेषित

मान पिया मनमोहन।
जान जिया मम जीवन।
आन मिलो मुरलीधर।
प्राण बनो उर भीतर।
नीलम शर्मा 

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शुभोदर छंद

जीवन का पल व्याकुल।
नैन बने अब आकुल।
बैरन हो तब सावन।
छोड़ गए जब साजन।

शूल चुभे मन अंदर।
आग लगे तन भीतर।
टूट चुकी मृदु चाहत।
आज हुयी प्रिय आहत।।

ये बरखा धुन जाचक।
जो खिलता नव मादक।
राग बने तब दाहक।
प्रेम जले बन नाशक।।

भाव जगे उर भीतर।
बेबस आज समंदर।
रास नहीं जग जीवन।
पार भए सब बंधन।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद
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 "शुभोदर छन्द "

पावस मास सुहावन,
ये बदली मनभावन।
दादुर शोर मचावत,
है मधु गीत सुनावत।

शीत बयार बहावत,
सूखल पेड़ गिरावत।
लागत ॠतु भयानक,
बारिश होय अचानक।

देखत घोर घटा जब,
नाचत मोर खुशी तब।
खेत किसान हरा अब,
नाचत गाबत हैं सब।

शंकर राख लगावत,
नाग गले लिपटावत।
शोभत देव जटाधर,
सावन मास उमा घर।

रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट"
बेगूसराय,बिहार

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 "शुभोदर छन्द"

जीवन का सुख बाधक।
साधु सधे मुख साधक।
हूँ बलवान सहूँ तन ।
क्यू समझा नहि है मन।

विनी
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शुभोदर छंद

सादर वन्दन मोहन,
स्वागत है मनमोहन।
आपहि जीवन दायक,
है जग पालक मोहन।

कानन कानन माधव,
आगम दर्शक माधव।
मोहक मादक मंगल ,
गोकुल रक्षक माधव।।


अरविन्द चास्टा
कपासन चित्तौड़गढ़

___________________________

 !!शुभोदर छन्द!!

नवाक्षरवृति छन्द 9 वर्ण

गोकुल धेनु चरावत,
मोहन मात बतावत,
फोड़ दई दधि गागर,
मौन भये नट नागर।

क्षीर सखा सब खावत,
झूठहि नाम लगावत,
लेप लगाय दियो मुख,
नैनन देख मिले सुख।

माधव वेणु बजावत,
गौ नित रेणु उड़ावत,
क्षीरज ग्वाल सखा मिल,
केशव गात गए खिल।

आँगन माधव खेलत,
मात यशोमति देखत,
चाँद सितार दिखावत,
मोहन गोद बिठावत।

मोहक माखन खावत,
देख लाल मुस्कावत,
केश सुहावत कुंतल,
नीरज लोचन चंचल।
*********************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल

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शुभोदर छन्द (वर्णिक)

बंधन तोड़ दिए सब,
छोड़ शरीर चला अब।
मानस की गति ये बस,
छूट गए जग के रस।

मात-पिता बनिता सुत,
रोवत देख पड़ा मृत।
क्यूँ अभिमान करो जन,
छूटत निश्चित ये तन।

मानस जन्म मिला जब,
मोह तजो जग के सब।
कर्म करो बन सज्जन,
नाम जपो हरि का मन।

दुर्लभ मानस का तन,
भाग्य बड़े मिलता सुन।
पार करो भवसागर,
प्रेम भरो मन गागर।

ध्यान धरो हरि का नित,
लिप्त रहो पर के हित।
नाम लगे मनभावन,
भाग्य बने शुभ पावन।

जितेंदर पाल सिंह

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शुभोदर छंद-

जीवन रूप अलौकिक
मानव जीवन भौतिक
सागरिका सुख की यह
क्षीण शिखा दुख की यह।

शोभित रूप दिवाकर
प्राण भरे नित आकर।
पुष्प सुलोक लुभावन
भोर लगे अति पावन।

प्रेरक सत्य सनातन
नित्य करो अभिवादन
मात पिता गुरु प्रेरक
जीवन राह सुधारक।

मानवता अभिकारक
कोटिक प्रेम विचारक।
पाठ पढ़े नित सुन्दर
भाव भरे हिय अन्दर।।

वृक्ष हमें फल देकर,
दाम नहीं कुछ लेकर
है परमारथ जीवन
मानव प्राण सजीवन।

राह शिला बन आकर
प्राण सप्रेम निछावर।
राम बने शुचि तारक
प्रेम उपासक कारक।

गीता गुप्ता 'मन'

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शुभोदर छ्न्द

सोच लिया मन में जब
काज तभी कर ले सब
ठोकर खा कर तू चल
सुन्दर जीवन है कल

वर्ष नया यह है प्रिय
प्रेम बसे ‌सबके हिय
हो शुभ लाभ सदा जग
बोलत कोयलिया खग

छाय रही खुशियां अब
गूंज रहा धरती नभ
बीत गया यह ‌जो पल
सुन्दर हो अपना कल

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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शुभोदर छंद 

ये मन हो अब साधक,
हो न यहां अब बाधक ।
प्रेम रहे मन अंदर ,
स्नेह जगे हर मंदर ।

पुष्प रहे मन पावन ,
फूल खिले हर सावन!
पेड़ सजे हर आँगन,
वृक्ष लगे जग साजन ।

प्यार सभी अब देकर,
प्रेम सभी अब लेकर !
मान सभी कर जाचक,
बोल मिठे कर वाचक ।

दो न यहाँ दुख मानव,
जीवन हो सुख दानव !
मान सभी जग में अब,
नाम चले नभ में अब ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर
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नमन साहित्य अनुरागी 

द्वंद बड़ा सहता मन ।
दर्शित किन्तु नही तन।।
घाव अनेक लिये हिय ।
होठ सदैव रखे सिय।।

आप लड़े उर में रण ।
देह नही लघु सा कण।।
मानस साक्ष्य बना रख ।
जीवन खार रहा चख।।

आज कहूं धीर धर ।
मंथन वो पीर कर।।
थाति रहे बन जीवन।
साथ यही घन सा वन।।

आत्म सुज्ञान बसे यह।
लेख विधान बदे सह।।
कर्म भले करता चल ।
राह नई गढ़ता चल।।

जो मिलता कह क्या कम।
लाभ नही दृग हो नम ।।
अर्पित जीव करूँ निज।
कष्ट सभी मन के तज।।

ललिता

           

Monday, June 15, 2026

बहरे_रमल_मुसद्दस_महजूफ

Explained By Mr. Jabir Ayaaz Saharanpuri ji

बहरे_रमल_मुसद्दस_महजूफ
फाइलातुन,फाइलातुन,फाइलुन
2122, 2122, 212

बहरे रमल की कईं किसमें हैं पर ये बहर मुसद्दस है तीन आरकान वाली और महज़ूफ भी है यानी के इसके तीसरे रुकन फाइलातुन 2122 के आख़री दो हर्फ"तुन२"या मात्रा को हज़फ मतलब काट कर फाइलुन 212 रहने दिया!

इस बहर को उर्दू अदब में बहुत शोहरत मिली फिल्मी गीतों में भी इसे खूब आजमाया गया छोटी बहर है और छोटी बहरों की एक ख़ास बात ये होती है कि कम शब्दों में बडी बता कह दी जाती है इसीलिए कवियों ने छोटी बहरों को खूब पसंद किया!

आपको भी ये एक छोटी बहर दी जा रही है आप भी लिखये और अपनी क़लम से अपने ख्यालात मोतियों की तरह छोटे से धागे में पिरो दीजिए!नीचे कुछ फिल्मी गीत दिए गये हैं उनसे मदद लें उदाहरण में मेरी गज़ल भी देख लें!

___________________________

फिल्मी गीत
*तुम न जाने किस जहां में खो गये |
*दिल के अरमां आंसूओं में बह गये |
*हर जगह दुश्मन ज़माना गम नहीं |
*इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल |

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क्या यूँही हर दिन गुज़ारा जाएगा

या कभी दिल को क़रार आ जाएगा
आज़माई जाएगी जब जब वफा
हर घडी इक रूप धारा जाएगा
इश्क़ से ही हारना काफी नहीं
ज़िन्दगी से भी तो हारा जाएगा
दिल गया,दौलत गई,फिर जाँ गई
इश्क़ में अब क्या हमारा जाएगा
एै मुहब्बत हुक्म करते जा तु बस
हुक्म जो भी हो गवारा जाएगा
आज फिर घर से निकल आए हैं वो
बेसबब फिर कोई मारा जाएगा

जाबिर अयाज़ सहारनपुरी
__________________________

बह्र- बह्रे रमल मुसद्दस महज़ूफ़
अर्कान- फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
वज़्न- 2122 2122 212

**** **** **** ****

है उन्हें हमसे अदावत क्या करें ।
और वो भी बेमुरव्वत क्या करें ।।

लाख हो नफ़रत उन्हें हमसे मगर।
है हमें उनसे मुहब्बत क्या करें ।।

जब हुए तन्हा सफ़र में प्यार के ।
हो गयी ख़ुद से बग़ावत क्या करें ।।

आपके बिन दिल कहीं लगता नहीं ।
आप हैं दिल की ज़रूरत क्या करें।।

हो भला कैसे मुकम्मल आप बिन।
हैं ग़ज़ल की आप चाहत क्या करें।।

चाहकर भी कुछ बयाँ करता नहीं ।
बेज़बां दिल है शिकायत क्या करें।।

अब ग़लत कहना ग़लत को है ग़लत।
"अश्क" है पर सच की आदत क्या करें।।

@ अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
चिरैयाकोट, जनपद- मऊ (उ0 प्र0) भारत
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 बहरे-रमल
मुसद्दस महज़ूफ
2122 2122 212


ग़ज़ल

रोज़ आहिस्ता से, गुज़रे ज़िन्दगी,
रेत सी हाथों से, बिखरे ज़िन्दगी।

बात रिश्तों की सुनाऊँ क्या तुम्हें,
जो मिले सबके थे, नखरे ज़िंदगी।

ग़ैर अपनों से लगें, कुछ इस क़दर,
ख़ून के रिश्तों से गहरे ज़िन्दगी।

इश्क़ को समझे, हक़ीक़त हम यहां,
हो गए जज़्बात, क़तरे ज़िन्दगी।

उम्र समझौतों में, गुज़री है यहां,
बस निभाने की थी फ़िक़रे ज़िन्दगी।

ढूंढ़ लेता हूँ, मैं गैरों में उन्हें,
जो लगें अपने से, चेहरे ज़िन्दगी।

है ख़ुदा मेरा निगहबां, हर क़दम,
'दीप' कट जाए ये, सफ़रे ज़िन्दगी।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
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बह्र- बह्रे रमल मुसद्दस महजूफ
अर्कान - फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
वज्न 2122 2122 212
.......
गजल
2122 2122 212
बेवफा से हम वफ़ा करते रहे
अपने वादों पर सदा चलते रहे
.....
क्या पता था प्यार है कुछ दिन सनम
हर कदम खुद को फना करते रहे
.....
हर जगह थी चाहतों की रंजिशे
हर जगह हमसे जफा करते रहे
......
आज तुमसे दूर हूं तो क्या हुआ
याद तुमको हर दफा करते रहे
.....
मर मिटे हमराज तेरे इश्क में
तुम हमेशा ही खफा करते रहे
.....
इश्क का सौदा जहां में कर लिया
वो सदा घाटा नफा करते रहे
......
हर किसी ने इश्क को रुसवा किया
दाग दामन के सफा करते रहे
.....
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज
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वज़्न --2122-2122-212
बहरे- रमल- मुसद्दस-महफूज

अर्कान --फाइलातुन- फाइलातुन- फाइलुन
क़ाफ़िया ----अना + रद़ीफ़---मुझे।
ग़ज़ल*****
*******

दिल दिया है दर्द भी सहना मुझे
और अब कुछ भी नहीं कहना मुझे।

याद जब आकर सताएगी मुझे
अश्क को दरिया बना बहना मुझे।

जिंदगी तूफ़ान सी बन जाएगी
हर थपेड़े उम्र भर सहना मुझे।

दूर पर्वत फर उठे काली घटा
धार जल की बन वहीं रहना मुझे।

जब बहारें इस चमन में आएंगी
बन महक हर बाग में बहना मुझे।

है वफ़ा मेरी तुम्हारे ही लिए
जिंदगी की शाम बस करना मुझे।

आंख का आंसू नहीं बनना मुझे
अक्स तेरे रूप का रखना मुझे।

15/11/19
राज्यश्री सिंह
स्वरचित मौलिक रचना
गुड़गांव
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ग़ज़ल
रदिफ...तो जरा
क़ाफ़िया...ओ स्वर
वज्न...२१२२ २१२२ २१२

राज़ दिल का ,तुम बताओ तो कभी,
क्यू छुपाते हो, जताओ तो कभी।

क्या हुयी वो भूल ,हमसे आख़री,
जो दबाए ग़म, सुनाओ तो कभी।

लाख रंजिश भी , दबी हो दरमियाँ,
अब मुहब्बत से, बुलाओ तो कभी ।

जुस्तजू बेनाम , मत कर हमनवा,
रश्क सीने से ,हटाओ तो कभी।

थी “सुवी” तेरी ,कभी जो राज़दा,
आज़ की ज़हमत ,उठाओ तो कभी।

(आज़...लालच/लोभ)

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद
------------------------------------------------
बह्र-रमल मुसद्दस महजूफ
अर्कान-फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
वज़न-2122 2122 212

नाम तेरा दिल पे मैं लिखता रहा
और लिखकर बारहा पढ़ता रहा

है मेरे लब पे कोई भी शिक़वा नही
वो भले मुझपे सितम करता रहा

तिश्नगी मन की न बुझ पायी कभी
जाम से तर होंठ मैं करता रहा

चाँदनी झिलमिल सी अब चमके कहीं
तीरगी में देर तक चलता रहा

हार से कृष्णा कभी डरना नहीं
हार से ही जीत का रस्ता रहा

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा, कुशीनगर, उ.प्र.
----------------------------------------------
बहरे-रमल
मुसद्दस महज़ूफ
2122 2122 212

ग़ज़ल

बात बिगड़ी, इक़ ज़रा सी बात में,
पूछ बैठे, तुम कहाँ थे? रात में।

अश्क़ आखों से निकल आये मिरी,
हम कहें क्या? तल्ख़िए हालात में।

ख़ूब अंजामे मुहोब्बत का सिला,
लुट गए हम, इश्क़ के जज़्बात में।

ख़्वाहिशे दिल, चाहते हैं तुम कहो,
हम तो हाज़िर हैं, तेरी ख़िदमात में।

छोड़कर हमको, नहीं जाना कहीं,
मर ही जायेंगे, सनम सदमात में।

खेल थी तेरी, मुहोब्बत बेवफ़ा,
हार हम तुझसे गए, शह-मात में।

ठोकरें ग़म की, मिटा सकती नहीं,
'दीप' जीना है, ग़मे लम्हात में।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
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बहरे रमल मुसद्दस महजूफ़
अरकान---फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
वज़्न---2122 2122 212
रदीफ़--देर तक
क़ाफ़िया--आया

ग़ज़ल-----

कर के वादा तू न आया देर तक
रंजो-ग़म ख़ुद को सुनाया देर तक

देखकर जलता पतिंगा सामने
शम्अ ने खुद को जलाया देर तक

उसकी नज़रों में न जाने क्या नशा
बिन पिए मैं लड़खड़ाया देर तक

वक़्त हमको ले के आया आज फ़िर
तेरे दर पर सर झुकाया देर तक

पर क़तर जिसको रखा था क़ैद में
वो परिंदा जी न पाया देर तक

काम वो आया नहीं है वक़्त पर
दोस्त को भी आज़माया देर तक

ज़ख़्म देकर आप तो फिर चल दिए
हमने खुद मरहम लगाया देर तक

अब्र ने रुदादे-ग़म अपनी सुना
आसमाँ को भी रुलाया देर तक

चंद यादें चंद आँसू और ग़म
"अंशु" इनसे दिल सजाया देर तक

अंशु विनोद गुप्ता.( दिल्ली )
16/11/2019.
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बह्र -बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़
अर्कान-फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाईलुन


काफ़िया-आता
रदीफ़-कौन है

वज्न- 2122 2122 212

दर्द को दिल में बसाता कौन है ।
ख्वाहिशों के घर जलाता कौन है।

मुफलिसी के दौर में कैसे भला
बेसबब मोती लुटाता कौन है ।

दफअतन दिल में कोई जो आ गया
वस्ल के सपने सजाता कौन है ।

रब ने ही जोड़ें मरासिम आपसे
खामखाँ दिल को लगाता कौन है ।

याद में महबूब की इस नाम को,
रेत पर लिख कर मिटाता कौन है ।

बाग से रूठी बहारें आज तक ,
गुल खुशी के फिर खिलाता कौन है ।

तिश्नगी बुझ ना सकी 'मन' की यूँ ही
प्यास सागर से बुझाता कौन है।

गीता गुप्ता 'मन'

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बहरे-रमल
मुसद्दस महज़ूफ
2122 2122 212

ग़ज़ल

सामने बातें करें, अज़मत भरी,
अस्ल सीरत है, बड़ी ग़ीबत भरी।

दौर ऐसा आ गया, हम क्या कहें,
मज़हबी बातें हुईं, नफ़रत भरी।

याद हैं मुझको, मुलाकातें हसीं,
थी नज़र तेरी, सनम उल्फ़त भरी।

क्या मिला तुमको हमें रुसवा किया,
आदतें ऐसी नहीं, हिकमत भरी।

दिन तसव्वुर में, नहीं था ये मिरे,
शाम तन्हा हो गयी, फ़ुरसत भरी।

ज़र की चाहत में, बदल रिश्ते दिये,
इश्क़ की दुनिया, करी ग़ुरबत भरी।

इश्क़ पर अब मैं, यकीं कैसे करूँ,
'दीप' की रातें रहीं, फुरक़त भरी।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'

अज़मत- इज़्ज़त/सम्मान
हिक़मत- बुद्धिमत्ता
फुरक़त- वियोग/जुदाई
ग़ुरबत- ग़रीबी
ग़ीबत- पीठ पीछे निंदा
सीरत- स्वभाव

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 बहरे -रमल -मुसद्दस -महजूफ
अरकान : फाइलातुन,फाइलातुन,फाइलुन
वजन:2122. 2122. 212

रदीफ़: कीजिऐ
काफिया: आ स्वर
गज़ल

दर्द को यूँ अब हराया कीजिऐ ,
हौसले हरदम जगाया कीजिऐ ।१।

है यहाँ बहती सदा ही जिंदगानी ,
रोज सागर से बनाया कीजिऐ ।२।

प्यार जीवन में यहाँ गुनहा नहीं है ,
बंदगी से अब निभाया कीजिऐ।३।

डूबती साँसे नज़रअंदाज है,
खुद न नज़रे यूँ गिराया कीजिऐ।४।

बोलने वाले नहीं कुछ बोलते ,
दिल न अब ऐसे जलाया कीजिऐ ।५।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर

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 गज़ल
बहरे-रमल मुसद्दस महज़ूफ
2122 2122 212
क्वाफि आना स्वर
रदीफ़ आ गया

🌹
ख्वाब आँखों में सजाना आ गया
फूल बागों में खिलाना आ गया।
🌹
हो गई श्रृंगार अब ये जिंदगी
गीत रागों में बनाना आ गया।
🌹
था कहीं भटका हुआ सा राह में
इश्क में मेरा ठिकाना आ गया
🌹
है लगी बनने कहानी प्यार की
प्रेम बातों में जताना आ गया
🌹
हो रही है अब मुकम्मल शाइरी।
शेर महफ़िल में सुनाना आ गया
🌹
साथ तेरा क्या मिला ए जिंदगी
जी रहा हूँ ये बताना आ गया।
🌹
ना करो अविराज बातें यूँ बड़ी
प्यार को दिल में छुपाना आ गया।
अरविन्द चास्टा "अविराज"

------------------------------------------------------
बहरे-रमल
मुसद्दस महज़ूफ
2122 2122 212

बह्र ÷÷ 2122 2122 212
काफ़िया ÷÷ आने
रदीफ़ ÷÷ में है

कैद दिल तो हुस्न पैमाने में है
शब कटी मेरी ये मैखाने में है

अब खुदा लगता हमें अपना सनम
बस इरादा जीस्त महकाने में है

दिल मेरा है जाने जाँ मासूम सा
हां हुआ ये इश्क अनजाने में है

रूह में तू घुल गया है इस कदर
याद तेरी देख सिरहाने में है

है तेरा अहसास भी तो मखमली
मिल गया जैसे तू नजराने में है

तेरी चाहत काम कुछ वो कर गई
खिल रहीं कलियां भी वीराने में है

मैक़दे में वो नशा जानम कहाँ
जो नजर के जाम छलकाने में है

ललिता गहलोत

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ग़ज़ल - बहरे मुतक़ारिब:मुसम्मन सालिम



Explained By - Mr. Jabir Ayaaz Saharanpuri ji 
-ग़ज़ल -

बहरे मुतक़ारिब:मुसम्मन सालिम

अरकान: फऊलुन,फऊलुन,फऊलुन,फऊलुन

वज़न:-122 122 122 122


यह बहर बहुत लोकप्रिय बहर है इस बहर पर क़रीब हर गायक और गीतकार ने गीत या गज़लें लिख़कर या गाकर अपनी किसमत सँवारी और मशहूर हो गये क्यूँकि ये बहर है ही इतनी सहल और आसान जितने भी गीत फिल्मी दुनिया में इस पर लिखे जा चुके हैं उन्हें आज भी लोग एैसे ही गुनगुनाते हैं जैसे कल गुनगुनाते थे!
इस बहर की लै या ताल आसानी से पकडने के लिए यहाँ कुछ फिल्मी गीत दिये जा रहे हैं


१*तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं ।
२*वो जब याद आये बहुत याद आये।
३*उठेगी तुम्हारी नज़र धीरे-धीरे ।
४*इशारों-इशारों में दिल लेने वाले ।
५*तुम्हें प्यार करते हैं करते रहेंगे ।
६*अकेले अकेले कहाँ जा रहे हो ।
७*न तुम बे-वफ़ा हो न हम बे-वफ़ा है ।
८*हमीं से मुहब्बत हमीं से लड़ाई
९ *मुझे दुनिया वालों, शराबी न समझो
१०*सितारों के आगे जहां और भी हैं ।
११*ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनियां
१२*मुझे प्यार की ज़िंदगी देने वाले ।
१३*मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोए ।
१४*संभाला है मैंने बहुत अपने दिल को ।
१५*ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी के लो
१६*जो तुम आ गए हो तो नूर आ गया है
१७*ये माना मेरी जाँ मुहब्बत जवाँ है ।
१८*जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा ।
२९*मुबारक हो तुमको समां ये सुहाना ।
२०*बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा ।

क़ाफिये और रदीफ अपनी मर्ज़ी से ले सकते हैं ग़ज़ल पाँच अशआर से कम न हों!
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बहरे मुतक़ारिब:मुसम्मन सालिम
अरकान: फऊलुन,फऊलुन,फऊलुन,फऊलुन
वज़न:-122 122 122 122

जो हारी हुई है तबीयत हमारी,
मुहब्बत ने की है ये हालत हमारी ।

करें फिर से रोशन तेरी यादें आकर,
बुझी जा रही शम्मे ख़लवत हमारी ।

तसव्वुर किया था कभी हमने जिनका,
उन्हीं वहशतों में है वहशत हमारी ।

कहाँ जाके चेहरा छुपाऐं सरे राह,
उतारी गई यार इज्ज़त हमारी ।

अमीरों की महफिल में तर्ज़े अदा से,
अयाँ हो गई शाम ए ग़ुरबत हमारी ।

पिया जब से जाम ए मुहब्बत तभी से,
शबो रोज़ घटती है क़ीमत हमारी ।

तुझे रास क्यूँकर नहीं आई जानाँ,
ख़िलाफे वज़ा थी क्या उलफत हमारी ।

जाबिर अयाज़ सहारनपुरी भारत
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बहरे मुत़कारिब
मसम्मन सालिम
अरकान: फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन

वज़्न: 122 122 122 122

ग़ज़ल

बतानी पड़ेगी तुम्हें बात आख़िर,
किधर जा रहे हैं, ये हालात आख़िर।

तुम्हारा नहीं मुल्क़, है ये सभी का,
जुड़े मुल्क़ से सब के जज़्बात आख़िर।

नज़र है तुम्हारे, निवाले पे लोगों,
सियासत हुई आज, बदज़ात आख़िर।

गयी नौकरी लोग, बेकार बैठे,
बुरा दौर, दिन में हुई रात आख़िर।

हुक़ूमत न हमको, डराना कभी तुम,
दबाना नहीं अब, सवालात आख़िर।

लिखेगा सुख़नवर, हक़ीक़त जहाँ की,
समझलो कहें क्या ये नग़मात आख़िर।

मिटाना है मुश्किल, ये तहरीर मेरी,
सभी के दिलों की, कही बात आख़िर।

गुमाँ है बहारों पे देखो चमन को,
दिखाये खिज़ा इसको औक़ात आख़िर।

हमीं से है क़ायम तुम्हारा ये रुतबा,
दिलाने लगे 'दीप' को मात आख़िर।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
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बह्र- बह्रे-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
अरकान - फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन
वज़्न -122 122 122 122

**** **** **** ****
लगे भूख तो याद आती है रोटी।
ग़रीबी में सबको रूलाती है रोटी।।

कभी कोई देखे तो परदेश जाके।
दिलों से दिलों को मिलाती है रोटी।।

मुक़द्दर की बातें मुक़द्दर ही जाने।
हक़ीक़त से लड़ना सिखाती है रोटी।।

अगर हो न रोटी तो मुश्किल है जीना।
हमें क्या से क्या दिन दिखाती है रोटी।।

किसी के कहाँ काम आयी है दौलत।
अगन पेट की तो बुझाती है रोटी।।

क़दम जो बढ़ाते हैं ईमान खोकर।
उन्हें कब सकूँ से सुलाती है रोटी।।

कभी पास आकर बहुत मुस्कुराये।
कभी अश्क"आंखों में लाती है रोटी।।

अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
चिरैयाकोट, जनपद- मऊ (उ0 प्र0) ,भारत
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🌹ग़ज़ल🌹
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन्
ज्न - 122 122 122 122
🌺
कहाँ चल दिए कुछ बतायें ज़रा तो,
कभी चन्द लम्हें बितायें जरा तो।
🌺
तुम्हें कौन रोके बडे दिलनशीं हो ,
कभी अक्स अपना दिखायें ज़रा तो।
🌺
शिकायत यही थी हिमाकत समझ लो,
यही इश्क हमको सिखायें ज़रा तो।
🌺
जताया यही प्यार तुमने कभी ना,
कभी गीत ये गुनगुनाएँ ज़रा तो।
🌺
तुम्हे भूल जाये न दिल को गवाँरा,
किसी रोज तशरीफ़ लायें ज़रा तो।
🌺
न खोलो यहाँ राज अविराज दिल के,
कभी ख्वाब में ही बुलायें ज़रा तो।
🌺
 अरविन्द चास्टा अविराज
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बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन्
ज्न - 122 122 122 122

कभी इश्क़ में हम द़गा कर न पाये
उसे दिल से अपने जु़दा कर न पाये


खुशी है कि बस इक दफ़ा की मुहब्बत़
ये हिम्मत़ कभी फिर खुदा कर न पाये

रहेगी कसक एक दिल में सदा ही
दिलों का ये कम फ़ासला कर न पाये

वफ़ा का सिला है मिली बेवफ़ाई
सिला वो वफ़ा का अदा कर न पाये

उड़ी एक अफ़वाह को सच ही जाना
हकीकत़ का हम सामना कर न पाये

पशेमाँ हुए अपनी ही सोच पर हम
बड़ा दिल का ये दायरा कर न पाये

सफ़र जीस्त़ का ख़त्म होने को "कश्यप"
मरें या जियें फैसला कर न पाये

आयुष कश्यप
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ग़ज़ल
बहरे मुतक़ारिब--मुसम्मन सालिम
अरकान--फऊलुन फऊलुन फउलुन फऊलुन

वज़न ----122-122-122-122
ग़ज़ल
क़ाफ़िया -ए -------रद़ीफ़ -पहले
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निहारूं तुझे जान जाने से पहले,
लगा तू गले इस विदाई से पहले।

बहुत रो लिए हम मिलन को हमारे,
मिले इक झलक इस जुदाई से पहले।

चले हम डगर हर तुम्हारी हि सजना,
चलो तुम डगर मेरी अर्थी से पहले।

बनूं याद मीठी तुम्हारी नज़र की,
सजूं आंख में अश्क बनने से पहले।

गिरूं ना कभी आंख से बूंद बन कर,
चलूं जिंदगी के बदलने से पहले।

राज्यश्री सिंह
गुरुग्राम
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बहरे मुतक़ारिब--मुसम्मन सालिम
अरकान--फऊलुन फऊलुन फउलुन फऊलुन

वज़न ----122-122-122-122
न सोचा जिन्हें वो कसरवार निकले,
जिन्हें मूर्ख समझा समझदार निकले।

कैसे हम करे अब भरोसा किसी पर,
था विश्वास जिस पर वो गद्दार निकले।

यहाँ कौन काबिल न काबिल खबर क्या
जिन्हें था नकारा हो खुद्दार निकले।

यहाँ दिख रहे थे जो बाहर से पाकी,
जो गहरे में उतरे गुनहगार निकले।

किया ही नहीं वक्त पर काम सारा,
था सौंपा जिन्हें काम मक्कार निकले।

मदद करने वाले गए छोड़कर सब,
न सोचा जिन्हें वो मददगार निकले।

कहा मित्र जिनको दगा दे गए वो,
जो दुश्मन थे वो ही वफादार निकले।

लिखे जो कभी मैंने ग़ुरबत के दिन में,
जो अल्फ़ाज़ थे मेरे अशआर निकले।

नहीं एक हम ही है दिलदार तेरे,
हजारों ही तेरे तलबगार निकले।

जमाने में जब तक जियो मीत मेरे,
दिलों से हमेशा ही बस प्यार निकले।

लिखो' राम 'कम तुम भले से यहाँ पर,
लिखो शेर ऐसे असरदार निकले।

स्वरचित
रामप्रसाद लिल्हारे'मीना'
चिखला बालाघाट(म.प्र.)
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 ग़ज़ल
बह्र-बह्रे -मुतकारिब मुसम्मन सालिम
अरकान - फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन

वज्न - 122 122 122 122

बहुत याद आए मगर तुम न आए,
किसे हम बतायें कि हैं चोट खाए


चली जब शहर में हवाएं वफ़ा की,
हमें सोचकर तुम नज़र थे झुकाए


नहीं भूल पाये कभी वो इशारे,
मिला कर नज़र से नज़र फिर चुराए


तुम्हारे सिवा और था कौन मेेरा,
तुम्हारे लिए हम हुए क्यूं पराए


कभी सोचना तुम वफाएं हमारी,
कभी पूछना खुद कि क्या तुम निभाए


शराफत हमारी इबादत हमारी,
न जाने यही वो समझ क्यूं न पाए


कभी इश्क को गर भुलाना पड़े तो,
भुला दो नज़र से नज़र थे मिलाए


सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज
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बहरे मुतक़ारिब
मसम्मन सालिम
अरकान- फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन

वज़्न-122 122 122 122
*** **** ***** ****
काफ़िया-आया
रदीफ़-नहीं है
कोई राज़ दिल का छुपाया नहीं है
अभी दिल किसी का चुराया नहीं है।

खुले आसमां में चमकते सितारे
मगर चाँद को क्यूँ जगाया नहीं है।

मुहब्बत नहीं है ये कहते हैं मुझसे
मगर हाथ अपना छुड़ाया नहीं है।

नहीं इल्म उनको मेरी चाहतों का
वो लगता मुझे क्यूँ पराया नहीं है।

इबादत शरारत नफ़ासत मुहब्बत
जताते हैं कैसे बताया नहीं है।

सलामत कहाँ हूँ अभी दोस्तों ने
दुआ में नज़र को झुकाया नहीं है।

ख़ुशी का फसाना लिखा था कभी 'मन'
किसी को अभी तक सुनाया नहीं है।

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ग़ज़ल
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बह्र-बहरे मुतक़ारिब -मुसम्मन सालिम

अरकान- फ़ऊलुन, फ़ऊलुन,फ़ऊ लुन ,फ़ऊलुन
वज़्न- 122-122-122-122
क़ाफ़िया -मुहब्बत(अत की बंदिश)
रदीफ़- हमारी
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मज़ाजी नहीं ये मुहब्बत हमारी,
यक़ीनन हक़ीक़ी है रक़बत हमारी॥

रहो सामने तुम हमेशा नज़र के,
फ़क़त है यही यार हसरत हमारी॥

कभी तुम हमारे न दिल को दुखाना,
इसी को समझना नसीहत हमारी।


नज़र से पिलाई है कैसी ये तुम ने,
बहकने लगी है तबीयत हमारी॥

ख़याले- जुदाई विनी दिल मे आये,
तो मर जाये जीने की हसरत हमारी


विनीता सिंह विनी


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 बह्र- बह्रे-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
अरकान - फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन
वज़्न -122 122 122 122

काफिया ..ई
रदीफ़ ... है
विधा..ग़ज़ल

तुम्हारे बिना,ज़िंदगी ना फली है,
ज़लालत भरी और दिल से छली है।

सजें थे कभी जो ,तसव्वुर हमारे,
हवा में वही ,राख बनके मिली है।

जवानी मुसीबत ,बनी है हमारी,
करी जो वफ़ा,बेवफ़ाई पली है।

भरी है अजीयत ,ज़हर सी मुग़ालत,
हुकूमत तुम्हारी,सदा ही खली है।

“सुवी” देख कैसा ,क़हर है मचाया,
सरेआम मुहब्बत देखो जली है ।

मुग़ालत..धोका
अजीयत...यातना
ज़लालत..अपमान

सुवर्णा परतानी, हैदराबाद

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बह्र- बह्रे-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
अरकान - फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन
वज़्न -122 122 122 122

काफिया -आ स्वर
रदीफ़ - हो गए है
गज़ल

यहाँ यूँ जुदा बेवफा हो गए है ।
नजा़कत भरे अब रिहा हो गए है ।१।

दिए फूल अब राह में ही पड़े है ।
सभी ख्वाब हम से खफा हो गए है ।२।

मुझे ठोकरों में गिराते करीबी ।
यहाँ बेखबर से खुदा हो गए है ।३।

रहा उम्र भर एक ये ही गुमा यूँ ।
किसीके लिए वो फना हो गए है ।४।

कभी लौटते है गए दिन बिचारे ।
यही बात पे दायरा हो गए है। ५।


रजिन्दर कोर (रेशू) , अमृतसर

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ग़ज़ल
बह्र-बह्रे -मुतकारिब मुसम्मन सालिम
अरकान - फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन

वज्न - 122 122 122 122

नज़ाकत नफ़ासत बसी आप में है।
गुरुर हुस्न पर भी तभी आप में है।

सवालों में घिरता यहाँ जा रहा हूँ,
जवाबों की शम्मा जली आप में है।

सियासत लगाती रही रोज़ क़ीमत,
ये कितनी शराफ़त अभी आप में है।

दिया जख्म मुझको मगर दिलरुबा सुन,
दवा दर्द की भी छुपी आप में है।

किसी मोड़ पर ना मिलेगी पराजय,
ये ताकत भी कृष्णा मिली आप में है।

कृष्णा श्रीवास्तव , हाटा,कुशीनगर

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ग़ज़ल
बह्र-बह्रे -मुतकारिब मुसम्मन सालिम
अरकान - फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन

🌹
महक कर मुझे अब बताना पड़ेगा।
बनी शिष्य वादा निभाना पड़ेगा।
🌹

सजे है मिरे नाम पर जो सितारे।
वहाँ अक्स तेरा दिखाना पड़ेगा।
🌹
बनी है यहाँ आज पहचान मेरी।
यहाँ परिचय तुम्हारा कराना पड़ेगा।
🌹
मुझे फर्श से अर्श तक ले गई तुम।
तुझे हर्फ़ में यूँ सजाना पड़ेगा।
🌹
कभी तुम सहेली कभी तुम गुरु थी।
मगर ये जहाँ को जताना पड़ेगा।
🌹
रानी सोनी"परी
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 बहरे मुत़कारिब
मसम्मन सालिम
अरकान: फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन

वज़्न: 122 122 122 122

ग़ज़ल

यकीं टूट जाने से, आफ़ात होंगी,
मुकम्मल यहीं क्या, मुलाकात होंगी।

ख़ुलूसे ज़िगर से, मिलो साथ लोगों,
मिलें दिल से दिल तो इनायात होंगी।

नहीं छीन सकते, मुक़द्दर किसी का,
बना दें मुक़द्दर, करामात होंगी।

तलब करके पूछो, सबब बेरुखी का,
गुमाँ को मिटा दो, मसावात होंगी।

ये बरहमगिरी से नहीं कुछ है हासिल,
लगो ग़र गले, तो मुदारात होंगी।

हुआ आम, यूँही किसी को गिराना,
उठा लो गिरे को, बजा बात होंगी।

ज़हन से निकालो, मबाहात बातें,
नहीं 'दीप' फ़िर से, खुराफ़ात होंगी।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'

शब्दार्थ
मसावात-- समानता
मुदारात--विनम्रता
बरहमगिरी-- ग़ुस्सैलपना
मबाहात-- घमंड, अभिमान, डींग
ख़ुलूसे ज़िगर-- निष्कपट,निश्छल ज़िगर

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ग़ज़ल
बहरे मुतक़ारिब--मुसम्मन सालिम
अरकान--फऊलुन फऊलुन फउलुन फऊलुन

वज़न ----122 122 122 122

काफिया -आया
रदीफ - गैर मुरद्दफ (बिना रदीफ की गज़ल)

हमें प्यार तुमपे सनम आज आया।
मुहब्बत हुई और दिल मुस्कुराया।

ये हम भूल बैठे,थे तुम हो फरिश्ते।
सदा हमने समझा था तुमको पराया।

ख़ता की है हमने तुम्हें ही न जाना।
तुम्हारे जिया को हमेशा जलाया।

न हम अहमियत जान पाते तुम्हारी
सनम डूब जाती,तुम्हीं ने बचाया।

अगर तुम न आते मेरी ज़िन्दगी में
तो हो जाता ये दिल सभी से पराया।

किया भी कहाँ था कभी कोइ शिकवा।
भला तुमने क्यूँ मन है अपना दुखाया?

तेरी निय्यतों की बदौलत मिला है
वही प्यार मैने जो तुझ पे लुटाया।
रागिनी गर्ग
रामपुर (उ. प्र.)

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ग़ज़ल
बहरे मुतक़ारिब--मुसम्मन सालिम
अरकान--फऊलुन फऊलुन फउलुन फऊलुन

वज़न ----122 122 122 122

काफिया -आ
रदीफ - नहीं मैं

तुम्हारे बिना जी सकूँगा नहीं मैं ।
ज़हर मौत का पी मरूँगा नहीं मैं ।।

तुम्हारे सहारे बसी जिंदगी है ।
समझ लो इशारा कहूँगा नहीं मैं ।।

सभी ग़म जुदा हो गए तुमसे मिलकर
कभी दूर तुम से रहूंगा नहीं मैं

नज़ारे बहुत ही नज़र आ रहे हैं
विरह आग में अब दहूँगा नहीं मैं

दिलों से दिलों को मिलाया बमुश्किल
ख़तम ये कहानी करूँगा नहीं मैं

अभय नाम मेरा डरो मत किसी से
उठे आग फिर भी डरूंगा नहीं मै

अभय कुमार आनंद
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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ग़ज़ल

बहरे मुतक़ारिब मसम्मन सालिम

अरकान- फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन
वज़्न-122 122 122 122
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काफ़िया :- आ स्वर
रदीफ़ :- हुआ है

सनम प्यार का जो इशारा हुआ है
मुहब्बत में ये दिल तुम्हारा हुआ है।

नजर से हमें जो उन्होंने छुआ फिर
नही देखना कुछ गवारा हुआ है

करीबी सनम की हुई आज हासिल
अजी खूब दिलकश नजारा हुआ है।

मुहब्बत अगर जुर्म है तो सुनो तुम
हमे कब सजा से किनारा हुआ है

जरूरत महल औ मकां की नहीं अब
के दिल मे ठिकाना हमारा हुआ है

ललिता गहलोत

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ग़ज़ल सीखें (भाग–1) ग़ज़ल क्या है? – इतिहास, उत्पत्ति, विकास, परिभाषा एवं ग़ज़ल की मूल अवधारणा हिन्दी में ग़ज़ल सीखने की सम्पूर्ण मार्गदर...