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Monday, June 15, 2026

रलका छन्द

रलका छन्द


Explained By Mr. Jitender Pal singh ji

वर्णिक छंन्दों की अगली शृंखला में
 हम वृहती जाति के नवाक्षरवृति 
छन्दों का अभ्यास करेंगे।
प्रथम छन्द निम्नलिखित है--
"रलका"।
(म स स)
मापनी: मगण(222) सगण(112) सगण(112)

बाहों में सजना भर ले,
मेरे को अपना कर ले।
तेरे संग चलूँ सजना,
छोड़ूं बाबुल का अँगना।

तू है जीवन का गहना,
मेरे साथ सदा रहना।
तेरी दुल्हन मैं बन के,
डोली बैठ चलूँ सजके।

साथी जीवन का बन जा,
मेरे को मत तू तरसा।
लागी प्रीत निभा मुझ से,
मांगा है तुझको प्रभु से।

नैनों में छवि प्रीतम की,
रातों नींद उड़ी इनकी।
तेरा रूप सजे वर का,
सातों जन्म बनूँ बनिता।

मेरी मांग भरो सजना,
पूरा प्रीतम हो सपना।
आये द्वार पिया मिलने,
आशातीत लगी लगने।

जितेंदर पाल सिंह
____________________________
रलका छन्द

आशा बाँध रही सजना।
मेरा काम तुम्हें भजना।।
मेरे श्याम मेरा गहना।
मेरे प्राण सदा रहना।।

आओ हे मनमोहन जी
साजो थे उर आँगन जी।।
कान्हा केशव काल कला।
न्यारा नीलम नैन लला।।

पीतांबर सजे तन पे।
प्रेमी प्यास पले पनपे।।
राधेश्याम मिलें वन में।
ज्यूँ फूटें कलियाँ मन में।।

देंखें बाट नयन किसकी?
राधा हृदय बंधी सिसकी।
लागे नैन पिया तुमसे।
माँगा आज तुम्हें तुमसे।।

नीलम शर्मा 

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छन्द-"रलका"

मेरे जीवन में सजना,
नैना काजल सा बसना।
पाया दौलत में गहना,
संगी ही बन के रहना।

मेरी याद सदा रखना,
यादों को जमके चखना।
आते हो जब तू सपने,
रातें भी लगती तपने।

बातों में बहला कर तू,
यादों में सहला कर तू।
धोखा दे कर हो छलते,
जैसे सूरज हैं ढ़लते।

मेरे हो प्रिय साजन तू,
मैं रानी सुन राजन तू।
तेरे साथ चलूँ सजके,
जैसे पायल है खन के।

साथी साथ निभा कर जा,
बाहों में मुझको भर जा।
सातों जन्म रहूँ सजनी,
बीते संग दिवा - रजनी।

रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट"
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रलका छंद

आए जो अपने बन के।
कैसे वो रहते तन के?।।
आँखों में घुलते रहते।
आँसू सागर से बहते ।।

छायी है गरमी तन में।
बातें जो झलकी मन में।
आएँगे घर जो सजना।
लज्जा से झुकते नयना।।

प्यारी सी लगती रजनी।
ज़ोरों से चलती धमनी।
जैसे घायल हो हिरणी।
प्यारी सी महिमा लिखनी।।

हौले स्पंदन ये धड़के।
बाहों में जियरा भड़के।
ज्वाला ये उमड़ी गहरी।
काया का बनके पहरी।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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रलका छंद


सूना है लगता मुझको,
खोना है लगता मुझको।
जाने क्यों सुनता रहता,
जीना या मरना मुझको।।

फूलों की खुशियाँ बिखरी,
बागों की कलियाँ बिखरी।
देखूं ये सहता कुढ़ता,
आँखों की बतियाँ बिखरी।।

रातों में जगते रहते,
बातों में पलते रहते।
छेड़े यूँ अबला मन को,
वादों में हँसते रहते।।

काली मावस की रजनी,
जैसे आतुर हो सजनी।
सारा वैभव है उतरा
मेरे भाव बसे सजनी।

अरविन्द चास्टा

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रलका छंद


जैसे ये चहके सजनी
रानी ये सजती रजनी
बाहे ये लगती गहना
आँखो में सजना रहना ।

साथी तू मन में बसना
मेरे अंदर यूँ हँसना
तेरे ही मन में रहते
बातें ये मन की कहते ।

‌आभारी मन ये धड़के
साँसे ये मन‌ में धड़के
फूलों की कलियां महके
बातें ये मन में चहके ।

रंगीले यह है सपने
साथी से यह है अपने
मेरा जी यह यूँ तड़पे
बैचारा मिलने तड़पे ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर

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"रलका"

शीर्षक- मेघ
आया सावन मेघ घिरे,
देखो आँगन फूल गिरे,
नाचे मोर घिरे बदरा,
मेघों से बरसे मदिरा।
*********************
कान्हा क्षीरज खाय रहे,
आधा भूमि गिराय रहे,
धाए ग्वालन देख सखा,
फोड़ी गागर क्षीर चखा।
********************
राधा मोहन झूल रहे,
भौंरे कुंतल गात गहे,
काली कोयल कूक भरे,
डाली से शुचि फूल झरे।
********************
प्यारे पावन दीप जले,
न्यारे जीवन मीत मिले,
बीती रात खिली कलियाँ,
आशा से निखरी अखियाँ।
********************
मेरे माधव लाज धरो,
कान्हा नीरज पाद परो,
मेघों से रसधार बहे,
नैना प्रेम सुभाष कहे ।
********************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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रलका छ्न्द(वर्णिक)

कृष्णा झूल रहे पलना,

मीरा रुप धरे चलना।
वीणा बाज रहा अँगना,
बाजे है घुंघरू कँगना।
......
गाती हैं महिमा उनके,
वस्त्र पीत सजे जिनके।
डूबी प्रेम सुधा रस में,
वीणा तार नहीं बस में।
......
नाचे जोगिन रूप धरे,
रागों से सुर धार बहे।
राधे कृष्ण सदा जपना,
पूरा हो सबका सपना।
.....
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

----------------------------------------------

रलका छंद (वर्णिक)

काटो शीष लड़ो जम के,
आंखें विद्युत सी चमके।
बाजू को तलवार बना ,
चीखे दुश्मन रक्त सना ।।

हाहाकार मचा बढ़ लो,
गाथा एक नई गढ़ लो।
घोड़ा चेतक सा बन जा,
चाहे शोणित में सन जा।।

वीरों भारत नाम करो,
ऐसा ही कुछ काम करो।
बैरी को दहला बढ़ जा,
चोटी को सहला चढ़ जा।।

ज्वाला आग जले तन में,
खौले लाल लहू रण में।
कुर्वानी हँस के चुन लो,
आजादी मिलती सुन लो ।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व
लखनऊ , उत्तरप्रदेश

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रलका छंद


प्राची से रवि झाँक रहे,
जीवों में सुविचार गहे।
आभा रश्मि हँसी बहती
ऊर्जा जीवन में महती।

** ************
वाणी में गरिमा रखना
शोभा जीवन की लखना।
काया के तुम हो प्रहरी
आयी रात बड़ी गहरी।

***************
आशा है जगती क्षण में
ऊर्जा है तरु में तृण में।
ऊषा और निशा मिल के
जागे पुष्प सभी खिल के।

**************

नैनों में कजरा दमके
बालों में गजरा चमके।
मुग्धा सोच रही मन में
आशा कान्ति जगी तन में।

*****************
छायी है ऋतु पावस की
आयी रात अमावस की।
नैनो से सरिता बहती
यादों में वनिता रहती।

गीता गुप्ता"मन"
उन्नाव,उत्तरप्रदेश

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रलका छंद(वार्णिक)

सांसो में रहते-रहते,
रातों में उठते-जगते।
कोई दर्द दिया करता,
पीड़ा पाकर मैं मरता।

दुःखों से उर आहत हैं,
कैसी ये कटु चाहत है।
प्यारा तो बस स्वारथ है,
छूटा ही परमारथ है।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर

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 "रलका"

लोगों में तुम नाम करो,
ऐसा तो कुछ काम करो,
झूठों का प्रतिकार करो,
बोले जो सच प्यार करो।।

मीठी बात सदा करना,
लोगों के दुख को हरना।।
पूरे काज करो अपना,
होगा पूर्ण तभी सपना।।

पूजे मान जिसे सबला,
नारी आज दिखे अबला,
छाया से भयभीत हुई,
दुष्टों की जब जीत हुई।।

झूठा हो सरदार जहाँ
कैसे हो तब न्याय वहाँ,
हारों की कब हार यहाँ,
हारा केवल प्यार यहाँ।।

थोड़ा सा हम धीर धरें,
आओ आज प्रकाश करें,
होंगे ये तम दूर सभी,
आशाएँ रख पास अभी।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
दि0 19/12/2019


बह्र - ए - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ


माँ शारदे को नमन्
 साहित्य अनुरागी परिवार के समस्त अनुरागियों को सादर प्रणाम।
 मित्रों आज दि0 23/02/2020 दिन रविवार को
 साहित्य अनुरागी के ग़ज़ल की सातवीं पोस्ट लेकर 
आपका मित्र अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी" 
आप सभी के बीच हाज़िर है।
आज हम लोग
 बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ
 पर ग़ज़ल कह कर 
साहित्य अनुरागी के पटल को बेहद ख़ूबसूरत बनाते हैं।

वज़्न : 2122 1212 22 /112


🏵🏵 अरकान : फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन/ फ़इलुन
बह्र का नाम :
 बह्र - ए - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ
 क़ाफ़िया : सियासत ( अत की बन्दिश )
 रदीफ़ : है

******* ****** ******
आजकल की जो ये सियासत है,
ज़िन्दगी के लिए मुसीबत है।।

प्यार हर शख़्स की ज़रूरत है,
ये कहावत नहीं , हक़ीक़त है।।

लोग ये क्यूँ नहीं समझ पाते,
इश्क़ भी करना इक इबादत है।।

आप नफ़रत करें भले हमसे,
आपसे हमको बस मुहब्बत है।।

फ़ैसला जो करे ख़ुदाई का,
ऐसी कोई कहाँ अदालत है।।

है सकूँ बेपनाह आँचल में,
और क़दमों में माँ के जन्नत है।।

"अश्क"एहसान करके लोगों पर,
भूल जाना ही मेरी आदत है।।

@ अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
 क़वाफ़ी के कुछ उदाहरण -
इज़्ज़त, हक़ीक़त, अज़मत, शहादत, इबादत, अक़ीदत, आदत, मुहब्बत, उल्फ़त, इनायत, बग़ावत, शराफ़त,ताक़त आदि

 ( इसी बहर में चन्द फ़िल्मी नग़मात के मुखड़ों के बोल ) 
 ( 01 ) फिर छिड़ी रात बात फूलों की

 ( 02 ) ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है
 ( 03 ) जब मोहब्बत जवान होती है
( 04 ) बे ख़ुदी का बड़ा सहारा है
 ( 05 ) एक भूली सी याद आई है
 ( 06 ) यूँ ही तुम मुझ से बात करती हो
 ( 07 ) हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं
 ( 08 ) तुम को देखा तो ये ख़्याल आया

तो आइये दोस्तों हम सब एक दूसरे की हौसला अफ़ज़ाई करते हुए अपनी-अपनी बेहतरीन शायरी से चार चाँद लगाते हैं

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बह्र ए ख़फ़ीफ मुसद्दस मख्बून महजूफ़ मक़तूअ
2122 1212 22/112                                                                                         
ग़ज़ल
वक़्त कैसा दिखा रहे हो हमें,
बेवज़ह तुम डरा रहे हो हमें।

हैं तुम्हारे मकां तो शीशे के,
और पत्थर बना रहे हो हमें।

रंग दहशतज़दा सियासत का,
खामखां तुम चढ़ा रहे हो हमें।

अम्न-ओ-चैन छीनकर हमसे,
जंग पर तुम बुला रहे हो हमें।

है तवारीख़ की ग़वाही भी,
मान दुश्मन मिटा रहे हो हमें।

हम मिटेंगे नहीं मिटाने से,
खूब पुख़्ता करा रहे हो हमें।

'दीप' की बात हक़ बयानी है,
तुम फ़रेबी बता रहे हो हमें।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'

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बह्र का नाम: बह्र-ए- ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

क़ाफ़िया : सियासत ( अत की बन्दिश )
रदीफ़ : है

मुल्क में कैसी ये सियासत है।
हर तरफ़ हो रही बग़ावत है ।

दुश्मनों से तो ख़ूब रग़बत है।
तुझको मुझसे ही क्यों अदावत है।

ख़ार हर सिम्त ज़ख्म दे जाते
गुल में कामिल मगर नज़ाकत है ।

वो जलाएँ कि क़त्अ ख़त के करें
खूँ से महकी हरिक इबारत है ।

बेरुख़ी से चले गए हैं जो
आज उनसे हुई मुहब्बत है ।

ख़ाक हो जाते सब वफ़ा के लिए
ख़ल्क़ की बस यही रवायत है ।

दर खुला है मेरा हरिक साइत
तेरी आमद की बस ज़रूरत है ।

झुकता कोई नहीं किसी के लिए
ग़र्ज़ इंसां की सिफ़्ल फ़ितरत है ।

जोगिया जोग में चुनर रँगना
"अंशु" की ये हसीन चाहत है ।
*****
शब्दार्थ------
रग़बत---मेल मिलाप
सिम्त--दिशा, तरफ़
कामिल--मुक़म्मल,समूची
क़त्अ---टुकड़े,खंड
ख़ल्क़----सृष्टि
साइत---घड़ी, समय,वक़्त
सिफ़्ल---नीच, अधम
अंशु विनोद गुप्ता

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 ग़ज़ल

बह्र का नाम: बह्र-ए- ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

क़ाफ़िया : आता की बन्दिश
रदीफ़ : है

दिल में जज़्बात जो जगाता है।
बा ख़ुदा ख़्वाब भी सजाता है।

अस्ल में वो ज़मीं का है रहबर-
रोशनी जो सदा जलाता है।।

मर के जिंदा रहा वही हरदम-
प्यार शिद्दत से जो निभाता है।।

आदमी है वही जो गैरों पे -
बारहा अपना दिल लुटाता है।।

गैरों के दर्द में भी "कृष्णा" जो-
अश्क़ आँखों में अपनी लाता है।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर
----------------------------------------------------------------
 बह्र ए ख़फ़ीफ मुसद्दस मख्बून महजूफ़ मक़तूअ

काफ़िया : सियासत (अत की बन्दिश)
रदीफ़ : है

ग़ज़ल

भूख पर चल रही सियासत है
वाह दिल्ली कमाल की लत है

दिखता शोर बस दिखावे का
राह किस चल पड़ी रियासत है

मुफ़लिसी है कराहती अक़्सर
उनके सर पर बता कहाँ छ्त है

ख़ूबसूरत है जो वतन अपना
छीनता कौन ये नफ़ासत है

खोजता है अभय अमन के दिन
नफ़रतें वाक़ई शरारत है


अभय कुमार आनंद
---------------------------------------------------------
ग़ज़ल
क़ाफ़िया...अत
रदिफ....है

रूठना भी हसीन आदत है।
जो बनी आज लाज उल्फ़त है।।

था बना बाग़बान जीवन का।
जो मिला था हिसाब चाहत है।।

दर्द के साथ दाग जब मिलते।
बेवफ़ा तब खली मुहब्बत है।।

छोड़ तनहा मुझे चले हैं वो।
दिल कहे ये सुरूर नफ़रत है।।

देख अंजाम इश्क़ का दिलबर।
रब कहे ये सुवी इनायत है।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद
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गज़ल 

बह्र का नाम : बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ
क़ाफिया : अत की बन्दिश
रदीफ़ : है

आज की बस यहीं हकीकत है ,
खोखली राह बस बगावत है ।१।

बेरुखी का यहीं सिला पाया ,
जिंदगी में यहीं मुहब्बत है ।२।

तरजु़मा हादसों भरा ही था ,
यूँ दुआ में यहीं इनायत है ।३।

जायके से यहाँ रही बातें
यूँ चुपी में सदा नजा़कत है ।४।

चुलबली सी रही सदा राहें,
खैर नज़रें ख़री शराफत है ।५।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर
-----------------------------------------------------------------------



बह्य का नाम:- बह्य- ए- ख़फ़ीफ मुसद्दस मखबून महजूफ़ मकतूअ
काफिया:- अती
रदीफ़:- हूँ मैं
*** ***** ***** ***
2122 1212 22

पास आ जा पुकारती हूँ मैं,
साथ तेरा तलाशती हूँ मैं।।

वक़्त बीता मगर न तुम आये,
राह अब तक निहारती हूँ मैं।।

याद दिल को अज़ीज़ लगती है,
बात दिल से निकालती हूँ मैं।

देख तुमको नज़र झुकी मेरी,
कैसे कह दूँ कि चाहतीं हूँ मैं।

नैन मदहोश हो गए मेरे,
याद में तेरी जागती हूँ मैं।।

नीर"नीरज" नयन भरे साथी
बस इन्हें ही सँभालती हूँ मैं।।

डॉ नीरज अग्रवाल "नन्दिनी"
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)
-------------------------------------------------------

बह्र ए ख़फ़ीफ मुसद्दस मख्बून महजूफ़ मक़तूअ

ग़ज़ल

हर लहर अब उफ़ान तक पहुँची,
बात दिल की ज़ुबान तक पँहुची।।

पहले तो छुप छुपा के मिलते थे,
बात अब खानदान तक पँहुची।।

हाथ में हाथ क्या लिया उसने,
ख्वाहिशें आसमान तक पँहुची।

खिड़कियों भी पसार दी बाँहे,
जब हवाएँ मकान तक पहुँची।

चलते चलते क़दम ठहर से गये,
कोशिशें जब थकान तक पँहुची।।

आज बैठा रहा सिरहाने 'मन',
बात फिर भी न कान तक पहुँची।।

गीता गुप्ता 'मन'
उन्नाव,उत्तरप्रदेश

बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ


Explained By Mr.Jabir Ayaaz Saharanpuri ji 
आदाब,साहित्य अनुरागी 


गज़ल नम्बर चार के हवाले से हम आखरी और एक छोटी बह्र लेकर आये हैं छोटी बह्री की खासिय्यत का जिक्र हम पहले भी कर चुके हैं छोटी बह्र एक गुनगुनाती,लहराती,मचलती,बलखाती नदिया की तरह होती है!

और जैसे किसी देव हेकल पहाड की ओट से झरना आँखों के सामने एक खुशनुमा मंजर लिये आ जाता है इसी तरह छोटी बह्र में कही हुई बात धम से आँखों को चका चौंद कर देती है और दिमाग बगैर सोचो विचार में पडे फौरन रोशन हो जाता है!

एैसी ही ये बह्र है जिसका नाम है
#बह्रे_ख़फीफ-मुसद्दस-मख़बून-महज़ूफ-मक्तूअ, बह्र का नाम किस तरह बनता है या बना है ये हम आप सबको पहले ही बता चुके हैं..
(गज़ल कहने के लिए आपके पास एक गुरू होना लाज़मी है बिना गुरू के आपकी गज़ल अधूरी है)
गज़ल कहने के लिए रोज़ाना अभ्यासं,पढाई और मशवरह ज़रूरी है!
इस बह्र में छूट ये है कि आप आख़री रुक्न फैलुन२२ को फइलुन११२ भी कर सकते हैं
मतलब अगर आपके एक शेर में एक मिसरा में 22 हो गया और दूसरे मिसरे में 112 हो गया तो तब भी सही है!
उदाहरण में अपनी गज़ल और कुछ फिल्मी गीत दिये जा रहे हैं!




बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112

#गज़ल
बे ख्याली का जब ख्याल आया
बाखुदा फिर बहुत मलाल आया

नेकियों संग आज दरिया में
उसके ख़त भी जला के डाल आया

फुर्क़तों के सफर से मैं ज़िन्दा
लौट आया मगर निढाल आया

मैने उसको भुला दिया आख़िर
कितनी मुश्किल से ये कमाल आया

अश्क,यादों के साथ दिल से मैं
हसरत ए वस्ल् भी निकाल आया

महफिल ए यार में सरे महफिल
अपनी पगडी खुद ही उछाल आया
*****************************
इसी बह्र पर कुछ फिल्मी गीत

1. फिर छिड़ी रात बात फूलों की
2. तेरे दर पे सनम चले आये
3. आप जिनके करीब होते हैं
4. यूँ ही तुम मुझसे बात करती हो,
5. मेरी किस्मत में तू नहीं शायद
6. आज फिर जीने की तमन्ना है
7. ये मुलाकात इक बहाना है


जाबिर_अयाज़_सहारनपुरी
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वज़्न : 2122 - 1212 - 22 / 112
अर्कान : - फ़ाइलातुन , मुफ़ाइलुन , फ़ेलुन / फ़इलुन

बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

क़ाफ़िया : - ज़मानेे (आने की बन्दिश )
रदीफ़ : - से
***** ***** ****** ***

चाहकर भी यहाँ ज़माने से।
इश्क़ छुपता नहीं छुपाने से।।

बात होती रही तरक्की की।
कुछ अमीरों के मुस्कुराने से।।

बीच महलों के सिसकियाँ अक्सर।
चीखती हैं .........ग़रीबख़ाने से।।

ऐ सितमगर ज़रा बता मुझको।
क्या मिला दिल मेरा दुखाने से।।

बाज़ आते नहीं कभी साहब।
आंकड़े झूठ के दिखाने से।।

वो समझते रहे हमे कमतर।
बच गये हम फ़रेब खाने से।।

"अश्क"किरदार पाक तुम रखना।
दाग़ मिटते ... नहीं मिटाने से।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"

----------------------------------------------
बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112
ग़ैर मुरद्दफ़

ग़ज़ल

इक़ हसीं शाम, और तन्हाई,
फ़िर मुझे याद, यार की आई।

खूबसूरत हो, इश्क़ कर बैठे,
इश्क़ में हाथ, आइ रुसवाई।

वस्ल की रात है, ख़यालों में,
देखते रह गए, थे रानाई।

खो गए बज़्म में कहीं फ़िर तुम,
भूल हमको, गए हो हरजाई।

तुम हुए मोहताज़ दौलत के,
अख्ज़ फ़ितरत,करे है सौदाई।

ये मुहोब्बत, मिरी इबादत थी,
तुम दिखाने, लगे थे दानाई।

ग़र गिरे तुम कहीं उठा लेंगे,
'दीप' ऐसा नहीं, तमाशाई।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
अख्ज़- लोभ
दानाई- होशियारी

----------------------------------------
बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112
ग़ैर मुरद्दफ़

ग़ज़ल

इक़ हसीं तुम, गुलाब हो जानम,
चाहता हूँ बनो, मिरी ख़ानम।

चाँद उतरा, ज़मीं पे हो जैसे,
हर नज़र देखती, रहे आलम।

दिल कहीं और लग नहीं सकता,
देखते रहते हैं, तुम्हें हरदम।

चश्म ए नाज़, की अदा क़ातिल,
ज़ख्म ए इश्क़, की तुम्हीं मरहम।

इश्क़ की प्यास, तुम बुझा दो हाँ,
गुलबदन बन कभी मिरी शबनम।

तुम जो आओ, हवा महक जाए,
ख़ास हो तुम मिरे लिए हमदम।

हम करेंगे नहीं, तुम्हें रुसवा,
'दीप' पर कर यकीं, मिरी जानम।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'
ख़ानम- स्त्री, बेग़म

--------------------------------------------
बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112
ग़ैर मुरद्दफ

गजल
2122 1212 22

नायिका
आज हम फिर तुझे सताएंगे
रूठ जाओ अगर मनाएंगे
**
मुस्कुरा कर सहे सितम तेरे
दाग़ दिल के सभी दिखाएंगे
**
चाह कर भी तुझे न भूले हम
कर्ज़ दिलकश यहीं चुकाएंगे
**
प्यार क्या है समझ नहीं पाये
हाल अपना कभी सुनाएंगे
**
जान तुझको अज़ीज़ माना है
यार वादे सभी निभाएंगे
**
एक वादा करो कि आओगे
जब कभी हम तुझे बुलाएंगे

नायक
देख लो तुम पुकार कर साथी
हर सदा सुनके दौड़ आएंगे
.....

सिम्पल काव्यधारा ,प्रयागराज

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बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122 1212 22/112

ग़ज़ल

बस हमारी यही शिक़ायत है,
बद-गुमानी भरी सियासत है।

दीन की बात काम काफ़िर के,
हर किसी की करे ख़िलाफ़त है।

ग़ैर मज़हब मिटाने की साजिश,
फ़िर कहाँ की, तिरी शराफ़त है।

यूँ इबादत से क्या हुआ हासिल,
दिल में नफ़रत भरी अदावत है।

देख इंसाफ की फज़ीहत को,
मुज़रिमों के लिए इनायात है।

वाह वाही भरी ख़बर तेरी,
रोज़ अख़बार की शबाहत है।

अश्क़ अब्सार में गरीबों के,
कौन पोछें बड़ी ज़लालत है।

हमजुबां हम नहीं तिरे होंगे,
तुम समझते रहो बग़ावत है।

मुल्क़ में अम्न बस रहे क़ायम,
'दीप' करता यही इबादत है।

जितेंदर पाल सिंह 'दीप'

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 बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

अर्कान- फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन/ फ़इलुन

वज़्न- 2122 1212 22/112

क़ाफ़िया : - सूरत ( अत की बन्दिश ) रदीफ़ : - है
***** ***** ****** ***
माँ के जैसी न कोई सूरत है।
घर में माँ से ही होती बरक़त है।।

माँ न होती तो मैं भी ना होता।
जीस्त ये माँ की ही बदौलत है।।

माँ के आँचल में है सकूं सारा।
माँ के क़दमों तले ही जन्नत है।।

ग़लतियाँ लाख बेटा कर जाये।
माँ को होती नहीं शिकायत है।।

माँ कभी सख्त हो नहीं सकती।
वो तो ममता की होती मूरत है।।

दूध का कर्ज़ भर नहीं सकता।
सोच किस काम की ये दौलत है।।

इक निवाले को जो तरसते हैं।
"अश्क" माँ की उन्हें ज़रूरत है।।

@ अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"

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बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ

अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन

वज़्न: 2122,1212,22/112


#गज़ल-
इश्क उनको सजा सुनाता है,
इश्क जिनको गले लगाता हे।
*
खत्म कर दे कभी वफ़ा दिल से,
यार हर बार याद आता है।
*
पूछ मत आलमे वफ़ा मुझसे,
चाँद हर रात यूँ सताता है।
*
गुलशनों में बहार क्या देखूं,
हुस्न नाजों पला बुलाता है।
*
मयकदे में बुला चले जाना
आशिकों को बड़ा सताता है।
*
आज "अविराज" क्या कहूँ तुमको
इश्क सब को यहाँ मिलाता है।
*************************
~अरविन्द चास्टा ~


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 बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ

अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन

वज़्न: 2122,1212,22/112


ज़िंदगी महकती कहानी है,
हर पलों में भरी रवानी है।

मौत से तू कभी नहीं डरना,
चार ही दिन की जवानी है।

धड़कनों को समेटकर रख लो,
आस,उम्मीद की बढ़ानी है।

जानते हम नहीं कहाँ जायें,
हौंसला जीत की निशानी है।

बेसबब फ़ासला बढ़ा यारा,
ये सुवी प्यार की दिवानी है।

सुवर्णा परतानी , हैदराबाद

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बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ

अर्कान:फाइलातुन-मुफाइलुन-फैलुन/फइलुन

वज़्न: 2122-1212-22/112
ग़ज़ल
तू चली आ किसी बहाने से।
प्यार तुमसे किया जमाने से ।।

अब न कहना तुम्ही चली जाओ।
आ गई तेरे ही सिखाने से ।।

रूठ कर मुझसे तुम नही जाओ।
मान जाओ चलो मनाने से ।।

पास आने से तेरे राहत है।
ज़ख्म मुझको मिला रुलाने से ।।

कायदा है मिलू ख़ुदी तुमसे ।
फ़ायदा है करीब आने से ।।

दोस्त दुनिया मे ऐसे मिलते है।
मिल गया हो कोई ख़ज़ाने से।।

खुद "विनी" को पता है राजे-दिल।
प्यार मिलता ख़ुदी मनाने से ।।

विनीता सिंह "विनी"


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 वज़्न=2122 -12 12- 22/112


ग़ज़ल

बेबजह दूर ज़िन्दगी कर ली
प्यार में पड़ के आशिकी कर ली।

फूल से दुश्मनी निभा कर अब
खुद उसी से ही दोस्ती कर ली।

मौत आती नही पता हमको
फिर बुढ़ापे से खुदखुशी कर ली।

साज़ तुम छेड़ते रहे ज़ालिम!
हमने बर्बाद ज़िन्दगी कर ली ।

थी मुहब्बत सनम कभी तुमसे
आज फिर तुमसे दिल्लगी कर ली।

हाथ पकडे चली सजन का जो
रूह से फिर भी बन्दगी कर ली।।
विनीता सिंह "विनी"
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वज़्न : 2122 - 1212 - 22 / 112
अर्कान : - फ़ाइलातुन , मुफ़ाइलुन , फ़ेलुन / फ़इलुन

बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ
क़ाफ़िया : - आने (उच्चारण)
रदीफ़ : - में

बेवफ़ा की जफ़ा भुलाने में।
याद उसकी सभी मिटाने में।

फासले तो रहे बहुत लेकिन-
नाम शामिल रहा फ़साने में।

जो ख़ुशी तेरे संग थी दिलबर-
ना मिला फिर किसी ख़जाने में।

दौर मुश्किल था आशिक़ी का भी-
मिट गयी ज़िन्दगी निभाने में।

प्यार करते हैं जो यहाँ कृष्णा-
क्या मिला है उन्हें ज़माने में।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर, उ.प्र.

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बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

अर्कान- फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन/ फ़इलुन

वज़्न- 2122 1212 22/112

क़ाफ़िया : - क्या ( आ स्वर ) रदीफ़ : - दूँगा

ज़िन्दगी तुझको और क्या दूँगा।
तू कहे तो तुझे भुला दूँगा।।

आजकल मतलबी ज़माना है।
सिर्फ़ कहता है जाँ लुटा दूँगा।।

तुम समझ लो भले मुझे कमतर।
मैं हूँ क्या ये तुम्हें दिखा दूँगा।।

याद आऊँगा उस घड़ी तुझको।
ख़ुद को दुनिया से जब मिटा दूँगा।।

वार पर वार तुम करो लेकिन।
प्यार करना तुम्हें सिखा दूँगा।।

हौसलों से उड़ान भरता हूँ।
मत समझना कि सर झुका दूँगा।।

"अश्क" तब और मुस्कुरायेंगे।
ज़ख़्म को अपने जब हवा दूँगा।।

@ अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
दि0 - 10/12/2019


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वज़्न: 2122 1212 22
अर्कान:- फ़ाइलातुन, मुफाइलून, फैलुन/ फ़इलून
बह्र ए ख़फ़ीफ मुसद्दस मखबून महजूफ मुक्तअ


आप आये बहार आई है,
रात साक़ी निखार लाई है।

बीत जाये करीब तेरे ही,
शाम देखो बहार लाई है।

साथ तेरे नसीब जागेगा,
सूरत रब से हसीन पाई है।

पाक है प्यार बाखुदा मेरा,
पास मेरे सबा खुदाई है।

आँख तेरी शराब सी यारा,
होश में हूँ वफ़ा निभाई है।

डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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बह्र का नाम : - बह्रे - ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ

अर्कान- फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन/ फ़इलुन


वज़्न- 2122 1212 22/112

क़ाफ़िया : - गढ़ा ( आ स्वर )
रदीफ़ : - हूँ मैं
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इक कहानी गज़ब गढ़ा हूँ मैं
रो रो के मंजिलें चढ़ा हूँ मैं

था बदन पर कफ़न शुरू से ही
समझो मर-मर के ही बढ़ा हूँ मैं

टूटता मैं रहा हमेशा ही
क्षीण कच्चा खड़ा मढ़ा हूँ मैं

थी सुई मेरे पाँव के नीचे
जिस से अव्वल दरी कढ़ा हूँ मैं

रौशनी की न थी निशां कोई
फोड़ कर आँख को पढ़ा हूँ मैं

शब्दार्थ
मढ़ा - मिट्टी का कच्चा घर

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व
लखनऊ उत्तरप्रदेश

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 बह्र ए ख़फीफ :मुसद्दस मख़बून महजूफ मक्तूअ
अर्कान:फाइलातुन,मुफाइलुन,फैलुन/फइलुन
वज़्न: 2122,1212,22/112

ग़ैर मुरद्दफ़
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जो न टूटे वो सिलसिला हूँ मैं।
तेरे हर दर्द की दवा हूँ मैं।

बैठ तारें हजार गिनता हूँ
सोचता हूँ यही रहा हूँ मैं।

मोल समझा ख़ुशी का जीवन में
दर्द से आज जब मिला हूँ मैं।

फूल खिलते बहार में हरदम
रात आने दो अधखिला हूँ मैं।

चाँदनी रात है सितारे है
ख्याब हूँ आँख में पला हूँ मैं।

आज भी झांकती नजर जिससे
खिड़कियों की तरह खुला हूँ मैं।

हुश्न औ इश्क का तरन्नुम दिल
आज भी खुद से ही जुदा हूँ मै।

आप आओं कभी मेरे घर में
बनके कालीन सा बिछा हूँ मैं।

रहनुमा आप बन गए 'मन' के
सोच कर जिन्दगी जिया हूँ मै।

गीता गुप्ता 'मन'
उन्नाव,उत्तरप्रदेश

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 बह्र ए ख़फीफ: मुसद्दस मख़बून महजूफ मत्त्कूअ
अर्कान : फाइलातुन ,मुफाइलुन फैलुन/फइलुन
वज़्न-2122. 1212. 22/112


काफिया : आर स्वर
रदीफ : होता है
गज़ल

मन परेशान धार होता है ,
सामने जब गद्दार होता है ।

खुश रहो तुम दुआ यही की थी ,
सोच कर नेक खार होता है ।

भीड़ में सब यहाँ सही ही है ,
पाक इंसा शिकार होता है ।

अजनबी सा निखार है उनका ,
ये तराशा बजा़र होता है ।

सामने से यहाँ सभी चुप है ,
मान पे यार वार होता है ।

रजिन्दर कोर (रेशू )
अमृतसर

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