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Sunday, June 14, 2026

हरिगीतिका_छंद- Hindi poetry


Explained By - Arvind Chasta ,Kapasan Chittorgarh Raj.
अनुरागी नमन 🌹🙏
आप सभी साहित्यकारों को कोटिशः साधुवाद । सभी के साझा प्रयास से हम छंद सृजन के माध्यम से हिंदी साहित्य संवर्धन और संरक्षण हेतु अनवरत प्रयासरत है। हालाँकि हमारा प्रयास मात्र तिनके भर ही है। माँ शारदा सभी पर कृपा बनाये रखें।
छंद सृजन क्रम में आज आपके समक्ष हरिगीतिका छंद प्रस्तुत है ।

🌹

यौगिक जाती

28 मात्रिक छंद

#हरिगीतिका_छंद
16-12 पर यति
पदांत 12 अनिवार्य
रगण सुमधुर होता है।
**
जहाँ पर भी चौकल का प्रयोग हो वहाँ 121 अर्थात जगण निषिद्ध है।
🌹
शृंगार भूषण अंत लग जन ,गाइये हरिगीतिका।
हरि शरण प्राणी जे भये कहु, है तिन्हे भव भीतिका।
संसार भव निधि तरण को नहि , और अवसर पाईये।
संसार भव मानुष जन्म दुर्लभ , राम सीता गाइये।
#छंद शास्त्र।
हरिगीतिका छंद
काल की है ये दशा कैसी,बन्द हरि दर द्वार भी।
पाश में है स्वाँस भी सारी, भवन निज घर बार भी।
आज रुकती है गती सबकी, बहकती है भावना।
हे कृपालू थाह लो अब तो, है हमारी कामना।।



✍️अरविन्द चास्टा

कपासन चित्तौड़गढ़ राज।
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हरिगीतिका:-

११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२

~~~~~~~~~~~~~~~~
निज भाव से कुछ शब्द लेकर, मौन भग्न करें कभी।
निजता कहाँ रस हीन है पर, ज्ञान हो लब्धित अभी।
पर क्षुब्ध सा एक यत्न तो कर,शब्द_ बोल उठे तभी।
सहसा उठी तर लेखनी जब,छंद बद्ध हुऐ सभी।

तब भाव ही खुद भींग के जब,स्याह कागज को करे।
हृद के सुवाहक रिक्त आसव, ओज की करुणा भरे।
चलने लगी हत लेखनी कब ,सोज की तरुणी झरे।
दिक् मूढ़ से तब भ्रांतिमूलक,प्रश्न से हल भी तरे।
-----------------------------
#रागिनी_नरेंद्र_शास्त्री

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हरिगीतिका छंद यौगिक जाति का

१६,१२पर यति अंत १२अनिवार्य

मापनी--
हरिगीतिका हरिगीतिका हरि,गीतिका हरिगीतिका
११२१२ ११२१२ ११,२१२ ११२१२=२८मात्रा
****************************
अब देख भारतवर्ष ने ली, फिर नयी हुंकार है l
फिर विश्व का सिरमौर बनने, के लिए तैयार है ll
संचित यहाँ पर हर पुरातन, ज्ञान का भण्डार है l
सक्षम समर्पित चिंतकों की, हो रही भरमार है ll

ऐ शत्रु! तेरी शत्रुता तो, हर समय स्वीकार है l
गांडीव की टंकार है हर , हाथ में तलवार है ll
हठ कर पड़ोसी व्यर्थ हमसे, जब हुआ दो चार है l
हर बार आक्रांता बना पर, हारता हर बार है ll

वातावरण उल्लासमय है, सर्वदा त्यौहार है l
बदलाव का परिदृश्य करता, प्रेम का संचार है ll
इस देश रूपी नाव की अब, ईश ही पतवार है l
ये देश सारा प्रभु तुम्हारा, मानता आभार है ll
विनी

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हरिगीतिका छंद,यौगिक जाति का छंद


हरिगीतिका हरिगीतिका हरिगीतिका हरिगीतिका (यति-१६-१२),१,५,१२,१९वीं मात्रा लघु अनिवार्य


प्रार्थना


प्रभु!आपसे है याचना मन,हो सदा सद्भावना।
बस प्रेम हो उर में यहाँ हम,त्याग दें दुर्भावना।।
बनती सदा है नेह से हिय,प्रेम की संभावना।
परहित सदा हो धर्म मेरा,आपसे है प्रार्थना।।

हिय में यहाँ कल्याण की ही,बस रहे उद्भावना।
दुख-दर्द से हरगिज नहीं अब,हो किसी का सामना।।
हमसे कभी भी भूल से प्रभु,हो नहीं अवमानना।
नित-दिन यही उद्देश्य रखकर,मैं करूँ तप-साधना।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर,उत्तर प्रदेश

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यौगिक जाती

हरिगीतिका छंद (28 मात्रिक)

16-12 पर यति
पदांत 12 अनिवार्य
चौकल पर जगण (121) निषिद्ध।
हरिगीतिका छंद:
प्रयुक्त मापनी
1121 2 112 12 11, 2 12 11 212

मझधार में अटका हुआ मन, राम भवजल तारना।
रहता नहीं वश भागता मन, बढ़ रही नित कामना।।
नित पंच-दोष अधीनता वश, भूलता सद्भावना।
भटके बहुत रुकता नहीं मन, राग-द्वेष विडम्बना।।

निज स्वार्थ में करता नहीं मन, पाप-पुण्य विवेचना।
भ्रम-जाल में फँसती चले अब, देख मानव चेतना।।
बंधता गया नित कर्म-बंधन, है असंभव काटना।
गुरु की शरण अतिशीघ्र हे! मन, ज्ञान की कर साधना।।

गुरु नाम दान दिया सनातन, मन जगी सत प्रेरणा।
दुविधा कटी हरि एक पावन, नाम की अवधारणा।।
कर रात-दिन हरि नाम कीर्तन, साधु संगत पालना।
सद्कर्म को करना सदा तुम, दुष्ट संगत टालना।।

धर ध्यान ईश्वर का मनुज कर, एक चित्त उपासना।
मिलती इसी विधि मुक्ति मानव, वासना सब त्यागना।।
सबका भला हिय नित्य रखकर, कर्म सुंदर कीजिये।
जयकार हो जग में निरंतर, नाम हरि हरि लीजिये।।

मन भेदभाव सभी भुलाकर, एक हैं सब जानना।
सब एक मानस जाति के जन, प्रेम की रख भावना।।
रचना रची भगवान ने तुम, सत्य सोच विचारना।
तब आत्मज्ञान मिले लगाकर, ध्यान नित्य लुभावना।।

जितेंदर पाल सिंह

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यौगिक जाती

हरिगीतिका छंद (28 मात्रिक )

16-12 पर यति
चौकल पर जगण (121) निषिद्ध ।
पदांत 12 अनिवार्य
1121 2112 1211, 2121 1212

जब जीव जीवन में जगे मन,यूँ करे सब साधना ,
तप ये तभी फल दे जरा जब ,होय साध अराधना ।
दुख दर्द जीवन में चले जब , ये धरा जग तारती ,
जब ये दुखी मन हो दुराचर ,ये धरा तब पालती ।

मन ये जरा जब यूँ दुखें तब , ताप प्रेम जले सदा ,
तपस्वी तनाव कहाँ जगे मन ,यूँ दुजे सब हो जुदा ।
टकराव ये पतवार हो जब , तो चले जग जागता ,
बरताव हो बिखराव का जब , राग ये तब बाजता ।


रजिन्दर कोर ( रेशू)
अमृतसर

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विषय- राम सीता वनगमन

छंद-मात्रिक हरिगीतिका छन्द

यौगिक जाति छन्द ,पदान्त 12 अनिवार्य चौकल पर जगण(121) निषेद्ध।
दो दो या चारों चरण समतुकांत
16,12 पर यति
पाँचवा, बारहवाँ, उन्नीसवाँ,छब्बीसवाँ लघु अनिवार्य
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श्री राम संग सिया चली प्रिय,प्रीत ले मनभावनी।
नवजग नवल वनवास पथ पर,राम की अनुगामिनी।
पट पीत धारण कर अकारण,वनगमन को पावनी।
रघुवीर आगे लखन पाछे,
बीच चमके दामिनी।
--------------------
पग धरत कंटक सी धरा पर,मुदित जनक सुतावरी।
रघुनाथ ले आशीष हरषे चल पड़ी सिय बावरी।
है राम बिन सूनी अयोध्या,
सकल सघन विभावरी।
चलत सब रघुवीर संग संग,
छोड़ अपनी चाकरी।
------------------
केवट पखारें चरण रज प्रभु, राम हमको तारना,
नौका बिठाए लखन सीता,ह्रदय करते कामना।
तट पैसनी कुटिया बनाई,जगतपति श्री राम ने,
कामदगिरी पर्वत सुहाना,प्रभु नयन के सामने।
---------------------
खग मृग विचरते सघन वन शुचि,राम करते साधना, मारीचि कंचन कपट मृग बन,कुटिल कटु करि कामना।
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कल्याण कारी धनुषधारी,नाश विपदा कर रहे।
वन घूमते श्री राम पग पग, कष्ट ऋषि का हर रहे।
पीड़ा सहें रघुनाथ रघुवर, शुचित शुभि सीता गहे।
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डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर( छत्तीसगढ़)

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हरिगीतिका छन्द

यह 28 मात्रिक यौगिक जाति का छ्न्द , 16 ,12 पर यति ,पदांत 1, 2अनिवार्य , चौकल पर जगण (121 ) निषेद्ध ।

112 12 112 1211 2 12 11 212


बढ़ते चलो सब वीर पावन , आज सिर पर ताज है।
करते रहो तुम वीर प्रेरित , यह सुखी अहिवात है ।
रखना सदा अगला कदम तुम , सरहदों पर जान है ।
इस देश के अब प्राण हैं हम , मात का अभिमान हैं ।
मिल के सदा रहना यहाँ पर , राष्ट्र की यह शान है।
मत भूलना प्रिय गीत को तुम , प्रेम ही पहचान है।
़हर जंग को अब जीत लो तुम , भारती जन मान है ।
धरती कहे यह ओढ़नी प्रिय , प्रेम की सुख खान है

‌सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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#हरिगीतिका_छंद

।। ईश वंदना ।।
मुखकांति अद्भुत है अलौकिक, दर्श मैं करता रहूँ।
हरिनाम का अब मैं निरंतर, जाप भी करता रहूँ।
यह है जगत बस मोह-बंधन, आप तारणहार हो।
विनती सुनो इस दास की प्रभु, आप पालनहार हो।

मनमोहनी छवि आपकी प्रभु, देव करते वंदना।
गंधर्व, ऋषि, मुनि, यक्ष, किन्नर, नित्य करते प्रार्थना।
करबद्ध होकर माँगता मन, भक्ति का वरदान दो।
इस दास की यह याचना प्रभु, श्री चरण में स्थान दो।

स्वरचित :- हिरेन अरविंद जोशी

रोला- छंद - Hindi poetry


Explained By Smt. Ragini Garg ji , Rampur U.P.
नमन साहित्य अनुरागियो।
होली चली गयी अगले वर्ष फिर वापस आने का वादा करके मुझे पूर्ण विश्वास है इस होली पर सबने खूब मस्ती और धमाल किया होगा मैंने तो बहुत मजा किया वृन्दावन धाम जाकर भी और घर पर भी, क्योंकि यह मेरा यानि की आपकी प्रिय दोस्त रागिनी का सबसे पसन्दीदा त्योहार है।चलिये अब इस मस्ती से बाहर निकलकर काम की बात पर आते हैंऔर रचते हैंअपनी कलम से कुछ सुन्दर -सुन्दर रचनाएँ रोला छन्द पर ।जी आप सही समझे! मात्रिक छन्दों की श्रृंखला को आगे बढा़ते हुये हम सब सृजन करेंगे 24 मात्रिक रोला छन्द पर तो उठाइये लेखनी और बिखेरिये साहित्य में रंग रोला के संग

रोला-  छंद
यह 24 मात्रिक अवतारी जाति का मात्रिक छंद है जिसमें चार चरण होते है। चारों चरणो के अंत मे तुक अनिवार्य है। चारो चरण भी समतुकांती हो सकते है या दो दो चरण समतुकांती हो।
प्रत्येक चरण मे11,13 मात्रा पर यति होती है।इसके विषम पदो मे मात्रा क्रम 4,4,3 या
3,3,2,3 तथा सम चरणों मे मात्रा क्रम 3,2,4,4 या 3,2,3,3,2 रखने से लय अच्छी बनती है। जिस रोला के सभी चरणो की 11वी मात्रा लघु होगी उसे काव्य छंद कहा गया है।
कुछ साहित्यकार रोला के विषम चरणो मे दोहे के सम चरण के अनुरूप विषम चरणांत गुरु लघु वर्ण को बेहतर मानते है।इससे लय बेहतर बनती है।
रोला के अंत मे दीर्घ वर्ण अनिवार्य है।इसके अंत मे लघु वर्ण रखने से बचना चाहिए।
रोला के सभी सम चरणांत अगर दो गुरु हो तो वह अति उत्तम जाति का रोला माना जाता है। अगर सम चरणांत केवल एक गुरु है , तब मध्यम श्रेणी का और अगर समचरणांत केवल लघु है तो निम्न श्रेणी का रोला समझा जाता है।

रोला की चौबीस,कला यति शङ्कर तेरा।
सम चरणन के आदि, विषम सम कला बसेरा।।
रामकृष्ण गोविन्द, भजे पूजत सब आसा।
इहां प्रमोद लहंत, अंत बैंकुंठ निवासा।
*कृमशः भगण नगण जगण भगण जगण जगण लघु
211 111 121 211 121 121 1 अनुसार कुल24 मात्रा क्रम होने पर इसे रसाला वृत्त भी कहा जाता है।
रोला के कुछ उदाहरण मेरी कलम से

रोला छन्द
(1)अक्षर पढ़ कर चार,
समझता खुद को ज्ञानी।
बदला है व्यवहार,
अरे!मूरख अज्ञानी ।
अच्छा रख बर्ताव ,
सभी जन तुझको चाहें।
रख रिश्तों में चाव,
सरल हो जायें राहें।।

(2) कर सबसे लो प्यार ,
बोल लो मीठी बोली।
अंहकार को मार,
बनो सबके हमजोली।
जीवन के दिन चार ,
उठेगी डन्डा डोली।
मिथ्या है संसार,
जलेगी सबकी होली।।
रागिनी गर्ग
रामपुर यू.पी.

(3)चतुर बहुत है श्याम ,
किशोरी मेरी भोरी।
लीनो चैन चुराय,
लली ने चोरी चोरी।
तीन लोक के देव,
बने वाके चपरासी।
फाँस प्रेम मे लियो,
देख के आवे हाँसी।।
रागिनी गर्ग
रामपुर यू. पी.

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रोला छंद
२४ मात्रिक (११-१३ पर यति)
रचना क्रम
बिषम पद
४+४+३ या ३+३+२+३
सम पद
३+२+४+४ या ३+२+३+३+२
दो दो चरण समतुकांत या चारों चरण समतुकांत
- १-
सैनिक सरहद साज, सफलता सुन वर लाना,
दुश्मन दहले देख , छठी का दूध पिलाना।
गौरव गाथा गान , वरण कर आगे बढ़ना ,
चेतक से भी तेज , सुनो चोटी पर चढ़ना।।

-२-

छोटे बच्चे आज, सिखाते पाठ गुरू जी,
कैसी चलनी देख,हुआ है आज शुरू जी।
आपस में है होड़, मची सुन दुनियाँ सारी,
खोजे सारे तोड़, करोना की बीमारी।।

-३-
पोथी है सम्मान ,समझ मत इसको दूजा,
पाना हो जो मान,करो नित इसकी पूजा।
पढ़ना आता काम , पढ़ाई सबसे अच्छी,
जग में होता नाम, संगिनी सबसे सच्ची।

-४-
आदत से मजबूर,हुए देखो ये नेता,
बिकती टिकटें रोज,बने अद्भुत ये क्रेता।
जनता रोये देख,बना नौकर ही स्वामी,
उल्टा पुल्टा दौर,गधा घोड़ा सम नामी।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर,बाँका, बिहार व
लखनऊ,उत्तरप्रदेश

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रोला छंद(अवतारी जाति)
24 मात्रिक छंद
11,13 पर यति।

सर्वोपरि निज स्वार्थ, मनुज मन की अभिलाषा।
भूला सब परमार्थ, कहत रसना कटु भाषा।।

पर-निन्दा में लिप्त, स्वयं की करे प्रशंसा।
सोचे पर का अहित, मलिन दूजे प्रति मंशा।।

मलिन काग आहार, कर्णकटु तान सुनाये।
मनुज द्वेष तस धार, अकारण क्लेश मचाये।।

कहे बहुत कटु बोल, क्रोधवश हृदय दुखाये।
अज्ञानता मन घोल, व्यर्थ ही जन्म बिताये।।

दम्भ लोभ मन त्याग, ह्रदय हरि नाम बसाया।
चरण शरण गुरु लाग, भक्त हरि नाम समाया।।

पर का भूले मान, मनुज मद में जब आये।
झूठे बोले बैन, ह्रदय पर-निंदा भाये।।

छोड़ो बीती बात, कुशल-मंगल सब मानो।
हाथों में लो हाथ, मित्र अपने सब जानो।।

छूटेंगे सब लोग, मृत्यु जिस दिन भी आई।
मन में धारो जोग, नाम हरि का लो भाई।।

जितेंदर पाल सिंह

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रोला छ्न्द
24 मात्रिक 11,13 पर यति
विषम पद
4+4+3 या 3+3+2+3
सम पद
3+2+4+4 या 3+2+3+3+2

रचना
4 4 3 , 3 2 4 4
आओ लिखते आज , सभी मिल कर के रोला।
देखो बरसे आज , गगन से भारी ओला ।
गिरती है प्रभु गाज , किसानों का मन बोला।
कर दो पूरण काज , ‌सुनो ओ मेरे भोला ।
.....

फैली चारों ओर , महामारी कोरोना।
ये है कैसा रोग , मचा है सबका रोना ।
जोड़ों सबसे हाथ, स्वच्छता रखना घर में ।
कुछ दिन की है बात ,दूर ही रहना जन में।

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

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रोला छंद(अवतारी छंद,२४ मात्रिक,१३-११,दो चरण या चारो चरण समतुकांत,
 गेयता अनिवार्य तत्व

१भौरों का गुंजार,हृदय सबको सुख देता।
पीकर मधु मकरन्द,अमिय सुख मधुरिम लेता।।
कह कृष्णा कविराय,बजे मन में अब सरगम।
सुख देता अविराम,प्रिये,यह यौवन अनुपम।।

२-रँग दो अपने नेह,कंत मत मुझको टालो।
अमिट रंग इस फ़ाग,बलम मुझ पर तुम डालो।।
कह कृष्णा कविराय,सदा आनन यह दमके।
यह कपोल रतनार, सजन जीवन भर चमके।।

३-बहती अविरल धार, नदी का पानी पीते।
पशु-पक्षी अरु मनुज,सभी जीवन को जीते।।
कह कृष्णा कविराय, नदी लगती मनभावन।
संरक्षित कर इसे,सभी हम रखते पावन।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

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रोला छ्न्द
24 मात्रिक 11,13 पर यति
विषम पद
4+4+3 या 3+3+2+3
सम पद
3+2+4+4 या 3+2+3+3+2


रोला...(२४ मात्रिक छंद,दो या चारों चरण सम तुकांती,अंत दो गुरु अनिवार्य)

४ ४ ३/ ३ २ ४ ४

हो गुमसुम जब रैन,बजत है पायल प्यारी।
साजन पावे चैन, सुहावे रुनझुन न्यारी।
डर का छाया जाल, लोग है सारे जागे।
मन होता बेहाल,सुखी जीवन से भागे।।

••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••

अपनों से वो दूर,अनोखी माया उसकी
देश प्रेम से चूर, समर्पित काया जिसकी।।
जान देश पर वार, देश की रक्षा करता।
चढा शस्त्र पें धार, रंग यौवन मे भरता।।


सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

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रोला छंद:-यह 24 मात्रिक अवतारी जाति का मात्रिक छंद है जिसमें चार चरण होते है। चारों चरणो के अंत मे तुक अनिवार्य है। चारो चरण भी समतुकांती हो सकते है या दो दो चरण समतुकांती हो।
प्रत्येक चरण मे11,13 मात्रा पर यति होती है।
*/*/*/*/*/*/*/*/*/*/*
उठे काव्य के वीर,छंद-वल्गा ले आए।
गहे भाव परिधान,समर में छंद घुमाए।।
उठे वीर मतिमान,भावित-अंजली ले के ।
शब्दाक्षर शमशीर,सजग थे निद्रा दे के ।।

छंद अनैक महान, शिखर साहित्य धरा के।
रसिक शिरोमणि जान,उपल है दिव्य विधा के।।
भर दें भाव सुजान,विध सुविध रसमणि नाना।
दिव्य-दिव्य राकेश,काव्य-अंचल परिधाना।।

नेह-सरि व्यवहार,जलधि सम गहन गभिरा।
सराबोर आख्यान,जीव्हा दृग मूक बधिरा।।
का का करो बखान,कही कब जाय बखानी।
वंद्य वंद्य है वीर, वंद्य वंदित शुचि बानी।।
*/*/*/*/*/*/*/*/*/*/*/*/*
#रागिनी_नरेंद्र_शास्त्री

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अरुण_छंद - Hindi poetry



Explained By - Shri Hiren Arvind Joshi ji

🙏नमन साहित्य अनुरागी 🙏
साहित्य के प्रति अनुराग रखने वाले सभी अनुरागियों को मेरा सादर प्रणाम।
।। सं गच्छध्वम् सं वदध्वम् ।।


अर्थात साथ चलें मिलकर बोले।



ऋग्वेद के इस श्लोक से स्पष्ट होता है ज्ञान का विराट स्वरूप पाने हेतु, हम सब साथ मिलकर अभ्यास करें। ज्ञान परस्पर आदान प्रदान करने से बढ़ता है। साहित्यिक सृजन के ज्ञान में वृद्धि हेतु आज एक नया छंद सीखते है।

अरुण_छंद
यह महादैशिक जाति का छंद है। यह मात्रिक छंद है अत: वाचिक भार मान्य है परन्तु चरणांत शुद्ध लघु-गुरु से होना चाहिए। इसके चार चरण होते है। प्रति चरण २० मात्राएँ होती है। यति ५-५-१० पर होती है। इसे सरलता से ऐसे समझ सकते है। (रगण) × 4। मात्रा इस प्रकार

२१२, २१२, २१२ २१२,
।। कृष्णोपदेश ।।
पुण्य है, पाप है, कर्म तो कर्म है।
जीत हो, हार हो, युद्ध ही धर्म है।
कौन है, सामने, सोच मत तू जरा।
युद्ध कर, युद्ध कर, युद्ध ही कर्म है।।१।।

रोक ले, भाव को, कौन तेरा यहाँ।
वीर सी, बात कर, घात कर तू यहाँ।
क्षत्र है, जन्म से, क्षत्र ही धर्म है।
युद्ध कर, युद्ध कर, युद्ध ही कर्म है।।२।।

शत्रु बन, सामने, बन्धु बान्धव खड़े।
सत्य है, किन्तु यह, वो अधर्मी बड़े।
साथ दे, धर्म का, कर्म ही धर्म है।
युद्ध कर, युद्ध कर, युद्ध ही कर्म है।।३।।

ज्ञान हूँ, योग हूँ, मैं स्वयं धर्म हूँ।
जन्म मैं, काल मैं, मैं स्वयं ब्रह्म हूँ।
ज्ञान ले, वेद का, वेद का मर्म है।
युद्ध कर, युद्ध कर, युद्ध ही कर्म है।।४।।

स्वरचित :- हिरेन अरविंद जोशी
आप सभी इस छंद पर अपना सृजन काव्य यज्ञ की आहुति स्वरूप कमेंट बॉक्स में प्रेषित कर सकते है।
हिरेन अरविंद जोशी
साहित्य अनुरागी

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🌹अरुण छंद
रगण ×4
5-5-10 यति
☘️☘️☘️☘️☘️
साँझ का ,दृश्य है ,छा गई लालिमा ।
तृप्त है ,नैन ये, छिप रही ये रश्मियाँ।
लौट के, आ रहे, खगविहग नीड़ पर।
घण्टियाँ, गूँजती, स्वर लिए पीड़ हर।
🌹
शंख का , नाद ये, गा रहा ध्यान कर।
आरती , कह रही , ईश का गान कर ।
चन्द्र की, कौमुदी , फैलना चाहती।
धैर्य को , आस को , प्यार को जाँचती।
🌹
काव्यमय, लेखनी , सत्य है कर्म है।
साँच को , लिख सके , धर्म है मर्म है।
भाव को , बाँध ले, शब्द के रूप में।
आस ना, छोड़ती, अंध से कूप में।
🌹
छंद में, गीत में, कर रहा कामना।
हर कदम, साथ दो , आप ही थामना।
सुर सजे , गान हो , आपकी हो कृपा।
शारदे , माँ वरो, दास पर हो कृपा।
☘️✍️
अरविन्द चास्टा
कपासन चित्तौड़गढ़ राज।

--------------------------------------------------------------------
अरुण छंद ( 20 मात्रिक)
महादैशिक जाति
5,5,10 पर यति
चरणान्त: लघु गुरु(12)

212, 212, 212 212

प्रियतमा, जी रहा, हूँ तुम्हारे लिए,
साथ में, प्रेम के, हम जलाएँ दिए।
चाँदनी, रात में, पास आओ प्रिये!
प्रेम के, हैं वचन, साथ तेरे किए।

प्यार को, प्यार से, हम निभाने लगे,
तुम नहीं, पास जो, रात भर हम जगे।
ये विरह, की बहुत, आग मन में जले,
क्या कहूँ? मैं तुझे, क्या हृदय में चले?

जग जले, तो जले, प्रेम हमने किया,
मन वचन, कर्म से, प्रेम प्याला पिया।
प्रेम की, डोर ने, बाँध हमको लिया,
तुम नहीं, छोड़ना, हाथ मेरा प्रिया।

रोग हिय, को लगा, ये भला क्या करें?
साथ में, जी सकें, साथ में हम मरें।
सोचते, क्यों नहीं? हो हमारे लिए,
दूरियाँ, ये मिटा, दो सदा के लिए।

देखते, देखते, नैन अपने मिले,
हो कृपा, राम की, सब रुकावट टले।
सोचता, हूँ तुम्हीं, से घरौंदा सजे,
हो प्रणय, से मिलन, और बाजे बजे।

जितेंदर पाल सिंह

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 अरुण छंद
महादैशिक जाति
--------/----------/-------
मापनी--२१२, २१२,२१२ २१२

५,५,१०चरणान्त (लघु गुरु )१२
--------/----------------------------
पाप के ,रूप में ,भोग तो आप से ।
रोग जो ,पा लिया ,मर्म भी जान ले।
रूप ही, रोग है , बात तो मान लो।
सोच को,साथ लो,ज्ञान को जान लो

प्यार तुम ,साथ हो, प्रेम से बांध लो।
रागिनी , संगिनी, बन्दनी मान लो।
पार हो, जिंदगी, चाह भी राह भी।
साधना ,कामना, थामना हाथ भी।।

राम की, वेदना, जानकी जानती।
फिर समा,वो गई,जो धरा में सती।
ईश की ,इष्ट थी, वो सिया राम की।
प्राण से,मुक्ति की,पुण्य से प्राप्ति की।

प्रेम की, साज है, बाँसुरी आस है।
कृष्ण की, प्रेमिका,बाँसुरी रास है।
गोपियां, प्यार है, बाँसुरी खास है।
साध्य है, साधना, बाँसुरी पास है।

Vini Singh

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अरुण छंद,महादैशिक जाति,20 मात्रिक,रगण,रगण,रगण,रगण

212 212 212 212

5,10 पर यति


प्रीत का,गीत मैं,गुनगुनाने लगी।
प्राण धन,को सदा,मैं लुभाने लगी।।
स्वप्न भी,मीत के,अब सजाने लगी।
प्राण प्रिय,को गले,मैं लगाने लगी।।

कामिनी,बन पिया,अब रिझाऊँ सदा।
प्यार दे,मैं तुम्हें,अब मनाऊँ सदा।।
नैन से,नैन भी,मैं मिलाऊँ सदा।
मृदु अधर,सुर्ख से,रस पिलाऊँ सदा।।

चाँदनी,बन सदा,मैं उजाला करूँ।
रीत अरु,प्रीत को,संग ढाला करूँ।।
प्रेम की,आँच से,तीव्र ज्वाला करूँ।
प्रेम भी,अब सदा,मैं निराला करूँ।

है बड़ी,ही मधुर,ये प्रथा प्यार की।
पुण्यता,है सदा,गंग के धार की।
है अमिट,प्रेरणा,मधु प्रणय सार की।
अर्थ भी,अब नहीं,जीत की हार की।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

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अरुण छंद-मात्रिक छंद

212 212 212 212


अंत लघु गुरु


राम स्तुति

पुण्य की ,लेखनी ,लिख रहे राम हैं।
भक्ति की ,ज्योति में ,दिख रहे राम हैं।
प्रेम के ,द्वीप है ,प्रेरणा ग्रंथ हैं।
राम ही, चल रहे,राम ही पंथ हैं।

हैं प्रभा ,अरुणिमा, रात्रि की ज्योत्सना।
दीप की ,ज्योति है ,भाव की व्यंजना ।
विश्व की ,शक्ति का, मूल भी राम हैं।
विष्णु का, चक्र भी, शूल भी राम हैं।

ईष्ट हैं, ईश हैं, साधना राम हैं।
कर रहे ,शिव सदा, प्रार्थना राम हैं।
ज्योति का, पुंज है ,राम ही धर्म हैं।
सत्य के ,मार्ग का, एक ही मर्म हैं।

सत्य का, न्याय का ,रूप ही राम हैं।
भानु का ,तेज है, धूप ही राम हैं।
मुक्ति का ,मार्ग हैं ,नाम ही राम हैं।
ज्ञान का, ध्यान का, धाम ही राम हैं।

शांति की ,प्रार्थना, युद्ध का घोष हैं।
हैं क्षमा, है दया, राम जय घोष हैं ।
कीर्ति का,ध्वज सतत,है गगन छू रहा।
वेद के, ज्ञान में,राम रस नित बहा।

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'

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अरुण छंद

रगन x ४,अंत लघु,गुरु अनिवार्य

यति ५,५,१० पर
२१२ २१२ २१२ २१२

राम को,भाग्य ने,यूँ भ्रमित है किया।
स्वर्ण मृग ,रूप धर ,के सिया हर लिया।
लांध कर,जब गयी,कंचना सी रमा।
काँप सा,था गया ,विश्व का ये समा।।१।।

स्तब्ध सी,मृत कही,ये धरा हो गयी।
राम जी ,की प्रभा ,भग्न सी हो गयी।
ढूँढते ,फिर रहे ,खोजते वो रहे।
चेतना ,जड़ बनी ,पीर उर से बहे।।२।।

नाम वह ,जानकी,मैथिली अब जपे।
इस विरह ,से भरी ,ताप में है तपे।
नैन में,नीर है,कष्ट है आज क्यूँ?
आग ये,धारता,विष भरा आज क्यूँ?।३।।

संग है,लघु अनुज ,खोज सीता करे।
पेड़-वृक्ष ,अरु लता,से पूछते वो फिरे।
जो सिया,को छला,क्रूर लंकेश है।
जब पता,ये चला,क्रोध में राम है।।४।।

_Suvrna partani
Haydrabad
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अरूण छंद (20 मात्रिक )

महादैशिक जाति

5, 5, 10 पर यति
चरणान्त : लघु गुरू (12)


212 , 212 , 212 212

शांत हो , प्रेम से ,आस अंदर रखो ।
आँख में , जाग हो , साथ संगत रखो ।।
जागते , सोचते , प्रेम से प्यार हो ।
यूँ रहे , मान ये , तो धरा , साफ हो ।।

बात हो , साथ हो , दात संसार में ।
राह हो , राग हो , रोज यूँ प्यार में ।।
आद ये , अंत ये , जागती ये निशा ।
जाप ये , ताप ये , देख लो ये दिशा ।।

रजिन्दर कोर ( रेशू)
अमृतसर

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अरूण छंद


माँ दान,भक्त को,आप दो शारदे।

दूर हो,अज्ञान,बुराई मार दे।
वास हो,चरण मे,ध्यान लग तार दे।
जान दूँ दर मात,तू मुझे तार दे।

-रीतू -(Reetu Gulati)

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 #अरुण_छंद_विधान
महादैशिक जाति का छंद है। इसके चार चरण होते है, प्रत्येक चरण में २० मात्राएँ होती है, यति का क्रम प्रत्येक चरण में ५,५,१० होता है, चरणांत में शुद्ध लघु गुरु होने चाहिए। इसमें मात्राओं का विन्यास निम्नानुसार है
(रगण) × 4 / २१२, २१२, २१२ २
१२
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इष्ट के,ध्यान में,साक्ष्य आराध्य हो।
कर्म से, ज्ञान से,साधना साध्य हो।
प्राण की,पूर्ति में,प्राण का होम हो।
बाध्यता,क्षीण हो,श्वांस में व्योम हो।

देव की,दृष्टि में,ब्रह्म आकार है।
जीव की, सृष्टि में,बीज साकार है।
आत्म की,पुष्टि में,देह आधार है।
नित्य की,वृष्टि में,देव!आभार है।

चेतना,साधना,चिंत्य का योग है।
ज्ञान की,आहना,देह का भोग है।
काम की,लालसा,चित्त का रोग है।
राग की,कामना,त्याजने जोग है।

धर्म ही,युक्ति है,देव-वाणी बहे।
कर्म ही,भुक्ति है,वेद-ज्ञानी कहे।
कर्म में,धर्म में,नित्य श्रृद्धा रहे
मोक्ष के,पंथ में,शीश वंद्या रहे।
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रागिनी नरेंद्र शास्त्री

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अरुण छन्द, 20 मात्रिक
महादैशिक जाति का छन्द
वाचिक भार मान्य।
चरणान्त शुद्ध लघु गुरु से,
प्रति चरण 20 मात्रा
5,5,10 पर यति
212×4 अंत लघु गुरु अनिवार्य।
शीर्षक:- मेघ

श्याम की, बांसुरी, गीत गाने लगी,
राधिका, मोहिनी, गुनगुनाने लगी,
नाचती, मोरनी, हैं घटाएं घिरी,
गा रही, है हवा, बादलों से भरी।
*** *** *** *** ***
मेघ की ,गर्जना राग सुर ताल में,
कोकिला, कूकती, आम की डाल में,
कौंधती, आसमाँ, में सखी दामिनी,
ताल दे, राग दे, गा रही रागिनी।
*** *** *** *** ***
मेदिनी, चूमते, मेघ काले घने,
झूमते, डोलते,वृक्ष के हर तने,
अंबु की ,धार में,भीगती हूँ पिया,
प्रीत के,रंग में, रंग जाए जिया।
*** *** *** *** ***
शैलजा,बह रही,हिम गिरी मौन है,
पूछती,कामना,हिय बसा कौन है,?
लालसा,प्रेम की,अंग में भर गई,
नेह की, बूंद से, कामना जग गई।
*** *** *** *** ***
भृंग से, तुंग को, छू रहे मेघना,
हैं मुदित, खग विहग, आ गई चेतना,
ये धरा,खिल उठीं, मुस्कराने लगी,
ओढ़कर, चूनरी,लह लहाने लगी।
*** *** *** *** ***
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल नन्दिनी
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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 अरुण छंद
महादैशिक जाति का छंद है। इसके चार चरण होते है, प्रत्येक चरण में २० मात्राएँ होती है, यति का क्रम प्रत्येक चरण में ५,५,१० होता है, चरणांत में रगण
(गुरु लघु गुरु) होने चाहिए। इसमें

दो दो या चारो चरण समतुकान्ती हो।

जोड़ता, मिथ्यता, क्यो सहे दर्द तू।
काम क्या,आ सका! मात्र है गर्द-भू।
जो सके,श्लेषणा, सूत्र रे मर्त्य! हो।
जीवनी, में सदा, शुद्धता, सत्य हो।।

वेदना,और की, जान ले स्वीय जो।
कर्म ये, हे सखा!, मान प्राणीय हो।
जीव की, सत्यता, सोच ले अंत है।
ईश की, है कृपा, बाजता तंत है।।

आप से, दूर 'मैं', हो सका ज्ञान से।
पूर्णता, प्राप्त हो, आत्म-संज्ञान से।
बुद्धि की, बोध की, उच्चता प्राप्त है।
क्यों भला,अंधता, मध्य में व्याप्त है!!

त्याग रे!, राग रे!, बाँवरे जाग रे!
काल है, साथ में, ले जगा भाग रे!
तोड़ दे, आज ही, मोह के बंद को।
यत्न से,भोग ले, शुद्ध-आनंद को।।

मणि अग्रवाल
देहरादून

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अरुण छंद (मात्रिक)
महादैशिक जाति का छंद, प्रत्येक चरण 20 मात्राएँ, 5-5-10 पर यति। चरणान्त लघु ,गुरु

212, 212, 212 212,
रगण रगण रगण रगण

देख ले,आज भी, लोग क्या- क्या करें।
लोभ का,जाल ले , ठग सुनो नित फिरें।
बात है, लाजमी, क्या मुझे तू बता।
ठग रहे , वे दिखे, नित बदलकर पता।।

नीड़ निज,त्याग कर,काग बन जो दिखे।
पिक बने,तो दिखे, गान कब तक टिके।
पाप का ,है हुआ, लोक में कब भला।
पाप के, साथ में ,पुण्य है कब चला।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बाँका,बिहार व
लखनऊ, उत्तरप्रदेश