Monday, June 15, 2026

बरवै_छंद मात्रिक- Hindi poetry


जय माँ शारदा

सभी गुणीजनों को नमन।

अब तक हमने सम मात्रिक छन्दों पर लेखन अभ्यास किया है।
आज आपके समक्ष अर्धसम मात्रिक बरवै_छंद प्रस्तुत है।
छंद बरवै मात्रिक
लक्षण- विषमनि रविकल बरवै ,सम मुनि साज।
प्रति छंद 4 पद,
चारों पद मिला कर 38 मात्राएँ,
विषम् चरण अर्थात पहला और तीसरा पद 12 मात्रा
सम चरण अर्थात दूसरा और चौथा 7 मात्रा होता है
यथा
12-7
12-7
से एक बरवै छंद पूर्ण होता है
सम चरण सम तुकांत ।
इसे ध्रुव अथवा कुरंग छंद भी कहा जाता है।
पदांत में जगण /121उत्तम माना जाता है 
एवम् तगण/221 को रोचक माना जाता है ।
 अनिवार्यता नही है।
मापनी स्वेच्छा अनुसार ली जा सकती है ।
उदाहरण
वाम अंग शिव शोभित ,शिवा उदार।
सरद सुवारिद में जनु ,तड़ित विहार।
(शास्त्रोक्त)

**************
स्वरचित
गीत मेरे कर रहे,आज पुकार।
आर्त को अब तो सुनो ,तनिक निहार।।
प्रेम के दाता बने, नन्द कुमार।
प्रीत की इस रीत में,कौन विचार।।

~अरविन्द चास्टा अविराज
कपासन चित्तौड़गढ़
राज.
****************
 बरवै_छंद


1.कार्य सारे बन रहे,भाग्य विधान।
लेख सारे तय सदा, मानुष जान।

2.लेखनी यूँ कर रही,भाव बखान।
भानु मानो कह रहा,शुभ्र विहान।

3.प्रेम की कीमत कहूँ ,है अनमोल।
भाव भाषा समझ ले,सत्य टटोल।

4.आस का दीप जलता,हो तम नाश।
दूर हों संकट सभी,है अभिलाष।

स्वरचित
डॉ पूजा मिश्र आशना

*********************
 बरवै छंद


भौतिक सुखों की चाह, दुखमय राह।
कम-अधिक नित झेलना,पीर प्रवाह।
मोहिनी छल की धरे, रूप अथाह।
आत्म सुख संग इसका, कठिन निबाह।।

कर आलिंगन करती, शून्य विचार।
चाहती स्वामित्व का,नित्य प्रसार।
मित्र बन कर बाँटती, खूब उधार।
और बनाए रखती, निज अधिकार।।

चाहते हो मुक्ति यदि, हो प्रभु जाप।
है सुमिरन का अद्भुत, दिव्य प्रताप।
सूख जाती शोक सरि, न हो विलाप।
मार्ग सदगति का यही, लें अब आप।।

मणि अग्रवाल "मणिका"
देहरादून (उत्तराखंड)

******************
 बरवै छन्द

शीर्षक:- अम्बिके

सर्वदानवघातिनी, कर संहार,
हे काली कपालिनी, कह संसार।
अरि नाश कर देविके,बैठे घात,
प्रचंड पाप खण्ड कर,काली रात।

मिटे कलुषित कामना, बढ़ता शोर,
फलित हो शुचि साधना,शुभि हो भोर।
दुख हरो कल्याणिके,झुकते माथ,
आशीष दे मंगला, धरिये हाथ।

माँ दनुजता बढ़ रही, बढ़ते पाप,
हे, रुद्राणी मोहनी, हर संताप।
उद्धार कर शिवे प्रिया,कपटी काल,
जगदम्बिके भवानी,पहनो माल।

चंड मुंड विनाशनी,काटो शीश,
शुभे पिनाकधारिणी, दे आशीष,।
परमेश्वरी विमले,कर दे त्राण,
हे, शुचित फल दायिनी,मेरे प्राण।

मनुजता को प्राण दो, कर दो काज,
वरदायिनी कमलिके, वर दो आज।
अम्बिके शुचि प्रीत दे,जग की मात,
मनमोहनी तम भरी, बीते रात।।

रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल नन्दनी
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

******************
 बरवै -छंद

हो सदा राह अब ये , रोज विचार ।
जोड़ते यूँ सब रहे , हृदय तार ।।
दूर हो आस न यहाँ , हो अब मान ।
प्यार फैले जगत में , योग विधान ।।


यूँ जले दीपक यहाँ , प्रेम पसार ।
प्यार से जीवन चले , स्नेह अधार ।।
सोच ये पावन रहे ,मानव आस ।
जोश से जीवन बढ़े , हो सब पास ।।

रजिन्दर कौर ( रेशू )

*****************

बरवै छंद,

मर्यादित रघुनायक,हैं श्रीराम।
आदर्शों में जिनका,ऊँचा नाम।।
भक्ति जहाँ पर बहती,है अविराम।
अवधपुरी वह सच में,पावन धाम।।

मधुरिम लगता हरदम,यह संसार।
मिट जाते जो उर से,सभी विकार।।
होता केवल जग में,नित त्योहार।
आपस में जो होता,मृदु व्यवहार।।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

***********************

बरवै-छंद

पछुआ ओ पुरवाई,चली बयार।
चातक,मोर,पपीहा,करें पुकार।
अचला-आँगन गाये,मृदु-मल्हार।
मधुरिम सा यह सावन,मेह बहार।

श्यामल-सघन गगन में,तड़ित-विहार।
सतरंगी आभा में,धनुक निहार।
नीरद-नाद,निरंकुश,प्रखर प्रहार।
अंतरिक्ष की बाहें, बनी कहार।

बरबस बिखरी बूँदे,मृदा-कुंदन।
सौंधी सी खुशबू में,मलय-चंदन।
खोल दिये बादल ने,घने-गूँथन।
अनराधार बरसते, बिना बंधन।

हिय में हूक उठे है,प्रिये!आओ।
रोम-रोम के पंछी, विरह गाओ।
बदरी ले जा संदेश् ,सजन लाओ।
सुधियों की सिहरन को,बुझा जाऔ।

पेडो़ की डाली पर,झुला डाले,
स्वप्न-स्पर्श के मोती,हृदय पाले।
बरखा की बूँदो को,चलो छू ले।
पियु के संग सखी री!झुला-झूँले।

झरझर मेहा बरसे, हरित आँगन।
अलसाई कलियों में,फलित कानन।
तरुवर शाख लिपटती,नेह पावन।
विधि शृंगार सजे है,पुलिन-सावन।

रागिनी_नरेंद्र_शास्त्री
दाहोद(गुजरात)

******************
बरवै छंद

आज ये सावन खिला,संग बसंत।
रोक ना पाय मन को,रंग अनंत।
लो सभी ओर महके,मंद सुगंध।
ये सभी है प्रकृति का,चंद प्रबंध।।१।।

जो भरे प्रेम धुन से,नित्य उमंग।
साथ लाए मधुर सा,साज तरंग।
सृष्टि से है बिखरता,स्वर निनाद।
हर्ष से मोदित करे,एक प्रमाद।।२।।

पुष्प सारे मद भरें,प्रीत अपार।
आज गाए धुन नयी,काव्य सितार।
नित्य छाए मन सुधा,भाव फुहार।
ये धरा देख भरती,आज दुलार।।३।।

सुवर्णा परतानी

********************
बरवै छन्द

सावन मेघा बरसे ,बजे मृदंग।
छाई है हरियाली ,उठे उमंग।

सजनी धानी चूनर ,ओढ़ लजाय ।
कोयल कूके काली ,मन हुलसाय।

झूला झूले ये मन ,करे पुकार।
कजरी गाऊँ जब मैं ,बजे सितार ।

सावन पावन आया ,बढ़ी कतार ।
पहुँचे सब काँवरिया ,बम-बम द्वार।

सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

रलका छन्द

रलका छन्द


Explained By Mr. Jitender Pal singh ji

वर्णिक छंन्दों की अगली शृंखला में
 हम वृहती जाति के नवाक्षरवृति 
छन्दों का अभ्यास करेंगे।
प्रथम छन्द निम्नलिखित है--
"रलका"।
(म स स)
मापनी: मगण(222) सगण(112) सगण(112)

बाहों में सजना भर ले,
मेरे को अपना कर ले।
तेरे संग चलूँ सजना,
छोड़ूं बाबुल का अँगना।

तू है जीवन का गहना,
मेरे साथ सदा रहना।
तेरी दुल्हन मैं बन के,
डोली बैठ चलूँ सजके।

साथी जीवन का बन जा,
मेरे को मत तू तरसा।
लागी प्रीत निभा मुझ से,
मांगा है तुझको प्रभु से।

नैनों में छवि प्रीतम की,
रातों नींद उड़ी इनकी।
तेरा रूप सजे वर का,
सातों जन्म बनूँ बनिता।

मेरी मांग भरो सजना,
पूरा प्रीतम हो सपना।
आये द्वार पिया मिलने,
आशातीत लगी लगने।

जितेंदर पाल सिंह
____________________________
रलका छन्द

आशा बाँध रही सजना।
मेरा काम तुम्हें भजना।।
मेरे श्याम मेरा गहना।
मेरे प्राण सदा रहना।।

आओ हे मनमोहन जी
साजो थे उर आँगन जी।।
कान्हा केशव काल कला।
न्यारा नीलम नैन लला।।

पीतांबर सजे तन पे।
प्रेमी प्यास पले पनपे।।
राधेश्याम मिलें वन में।
ज्यूँ फूटें कलियाँ मन में।।

देंखें बाट नयन किसकी?
राधा हृदय बंधी सिसकी।
लागे नैन पिया तुमसे।
माँगा आज तुम्हें तुमसे।।

नीलम शर्मा 

-----------------------------

छन्द-"रलका"

मेरे जीवन में सजना,
नैना काजल सा बसना।
पाया दौलत में गहना,
संगी ही बन के रहना।

मेरी याद सदा रखना,
यादों को जमके चखना।
आते हो जब तू सपने,
रातें भी लगती तपने।

बातों में बहला कर तू,
यादों में सहला कर तू।
धोखा दे कर हो छलते,
जैसे सूरज हैं ढ़लते।

मेरे हो प्रिय साजन तू,
मैं रानी सुन राजन तू।
तेरे साथ चलूँ सजके,
जैसे पायल है खन के।

साथी साथ निभा कर जा,
बाहों में मुझको भर जा।
सातों जन्म रहूँ सजनी,
बीते संग दिवा - रजनी।

रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट"
--------------------------------------
रलका छंद

आए जो अपने बन के।
कैसे वो रहते तन के?।।
आँखों में घुलते रहते।
आँसू सागर से बहते ।।

छायी है गरमी तन में।
बातें जो झलकी मन में।
आएँगे घर जो सजना।
लज्जा से झुकते नयना।।

प्यारी सी लगती रजनी।
ज़ोरों से चलती धमनी।
जैसे घायल हो हिरणी।
प्यारी सी महिमा लिखनी।।

हौले स्पंदन ये धड़के।
बाहों में जियरा भड़के।
ज्वाला ये उमड़ी गहरी।
काया का बनके पहरी।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

---------------------------------------

रलका छंद


सूना है लगता मुझको,
खोना है लगता मुझको।
जाने क्यों सुनता रहता,
जीना या मरना मुझको।।

फूलों की खुशियाँ बिखरी,
बागों की कलियाँ बिखरी।
देखूं ये सहता कुढ़ता,
आँखों की बतियाँ बिखरी।।

रातों में जगते रहते,
बातों में पलते रहते।
छेड़े यूँ अबला मन को,
वादों में हँसते रहते।।

काली मावस की रजनी,
जैसे आतुर हो सजनी।
सारा वैभव है उतरा
मेरे भाव बसे सजनी।

अरविन्द चास्टा

------------------------------------------------
रलका छंद


जैसे ये चहके सजनी
रानी ये सजती रजनी
बाहे ये लगती गहना
आँखो में सजना रहना ।

साथी तू मन में बसना
मेरे अंदर यूँ हँसना
तेरे ही मन में रहते
बातें ये मन की कहते ।

‌आभारी मन ये धड़के
साँसे ये मन‌ में धड़के
फूलों की कलियां महके
बातें ये मन में चहके ।

रंगीले यह है सपने
साथी से यह है अपने
मेरा जी यह यूँ तड़पे
बैचारा मिलने तड़पे ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर

---------------------------------------------

"रलका"

शीर्षक- मेघ
आया सावन मेघ घिरे,
देखो आँगन फूल गिरे,
नाचे मोर घिरे बदरा,
मेघों से बरसे मदिरा।
*********************
कान्हा क्षीरज खाय रहे,
आधा भूमि गिराय रहे,
धाए ग्वालन देख सखा,
फोड़ी गागर क्षीर चखा।
********************
राधा मोहन झूल रहे,
भौंरे कुंतल गात गहे,
काली कोयल कूक भरे,
डाली से शुचि फूल झरे।
********************
प्यारे पावन दीप जले,
न्यारे जीवन मीत मिले,
बीती रात खिली कलियाँ,
आशा से निखरी अखियाँ।
********************
मेरे माधव लाज धरो,
कान्हा नीरज पाद परो,
मेघों से रसधार बहे,
नैना प्रेम सुभाष कहे ।
********************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

---------------------------------------------

रलका छ्न्द(वर्णिक)

कृष्णा झूल रहे पलना,

मीरा रुप धरे चलना।
वीणा बाज रहा अँगना,
बाजे है घुंघरू कँगना।
......
गाती हैं महिमा उनके,
वस्त्र पीत सजे जिनके।
डूबी प्रेम सुधा रस में,
वीणा तार नहीं बस में।
......
नाचे जोगिन रूप धरे,
रागों से सुर धार बहे।
राधे कृष्ण सदा जपना,
पूरा हो सबका सपना।
.....
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

----------------------------------------------

रलका छंद (वर्णिक)

काटो शीष लड़ो जम के,
आंखें विद्युत सी चमके।
बाजू को तलवार बना ,
चीखे दुश्मन रक्त सना ।।

हाहाकार मचा बढ़ लो,
गाथा एक नई गढ़ लो।
घोड़ा चेतक सा बन जा,
चाहे शोणित में सन जा।।

वीरों भारत नाम करो,
ऐसा ही कुछ काम करो।
बैरी को दहला बढ़ जा,
चोटी को सहला चढ़ जा।।

ज्वाला आग जले तन में,
खौले लाल लहू रण में।
कुर्वानी हँस के चुन लो,
आजादी मिलती सुन लो ।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व
लखनऊ , उत्तरप्रदेश

------------------------------------------------

रलका छंद


प्राची से रवि झाँक रहे,
जीवों में सुविचार गहे।
आभा रश्मि हँसी बहती
ऊर्जा जीवन में महती।

** ************
वाणी में गरिमा रखना
शोभा जीवन की लखना।
काया के तुम हो प्रहरी
आयी रात बड़ी गहरी।

***************
आशा है जगती क्षण में
ऊर्जा है तरु में तृण में।
ऊषा और निशा मिल के
जागे पुष्प सभी खिल के।

**************

नैनों में कजरा दमके
बालों में गजरा चमके।
मुग्धा सोच रही मन में
आशा कान्ति जगी तन में।

*****************
छायी है ऋतु पावस की
आयी रात अमावस की।
नैनो से सरिता बहती
यादों में वनिता रहती।

गीता गुप्ता"मन"
उन्नाव,उत्तरप्रदेश

------------------------------------
रलका छंद(वार्णिक)

सांसो में रहते-रहते,
रातों में उठते-जगते।
कोई दर्द दिया करता,
पीड़ा पाकर मैं मरता।

दुःखों से उर आहत हैं,
कैसी ये कटु चाहत है।
प्यारा तो बस स्वारथ है,
छूटा ही परमारथ है।

कृष्णा श्रीवास्तव
हाटा,कुशीनगर

-----------------------------------
 "रलका"

लोगों में तुम नाम करो,
ऐसा तो कुछ काम करो,
झूठों का प्रतिकार करो,
बोले जो सच प्यार करो।।

मीठी बात सदा करना,
लोगों के दुख को हरना।।
पूरे काज करो अपना,
होगा पूर्ण तभी सपना।।

पूजे मान जिसे सबला,
नारी आज दिखे अबला,
छाया से भयभीत हुई,
दुष्टों की जब जीत हुई।।

झूठा हो सरदार जहाँ
कैसे हो तब न्याय वहाँ,
हारों की कब हार यहाँ,
हारा केवल प्यार यहाँ।।

थोड़ा सा हम धीर धरें,
आओ आज प्रकाश करें,
होंगे ये तम दूर सभी,
आशाएँ रख पास अभी।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"
दि0 19/12/2019


अनुष्टुप छन्द:- Hindi poetry


Explained By
 Smt. Dr. Neeraj Agrawal ji ,
 Bilaspur 
(chttishgarh )

नमन साहित्य अनुरागी
सभी को गुणीजनों को नमन करते हुए,
 मैं छंदभ्यास की इस कड़ी में उपस्थित हुई हूँ 
अष्टाक्षर वृत का एक छन्द लेकर "अनुष्टुप छन्द"
***********************

अनुष्टुप छन्द:- वार्णिक छन्द

********************

यह एक अष्ठाक्षर वृत्त का प्रमुख छंद श्लोक है ,
जो हर एक काव्य में प्रयोग हुआ है।
 मुख्यतः इसका प्रयोग संस्कृत भाषा में किया जाता है, 
तथापि साहित्यकार होने के नाते सभी को इसकी
 जानकारी होना अति आवश्यक है।
*********************
श्लोक अष्ठाक्षर वृत्त
लक्षण

श्लोके षष्ठम् गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।

द्विचतुष्पादयोहृस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययो:।।
****
अस्य छंदस: षष्ठम् अक्षरं गुरु पञ्चमम च लघु।
सप्तमम अक्षरं प्रथमे तृतीये च पादे गुरु द्विचतुष्पादयो:च
सप्तमम अक्षरं लघु भवति।
श्लोक के चार चरण होते है,
हर चरण में छठवां /6 वर्ण गुरु-2 होता है
हर चरण का पाँचवा 5 वर्ण लघु होता है।
सम चरण 2और 4 में सातवाँ वर्ण लघु 1 होता है
विषम चरण 1और 3 में सातवाँ वर्ण गुरु होता है।
शेष वर्ण स्व इच्छा से लिए जा सकते है।
यथा
हर वर्ण के लिये 0 लिखा जो स्वेच्छिक लेने है । 
अनिवार्य हेतु मात्रा लिखी है।
प्रथम चरण:-वर्ण -8
१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८- वर्ण
0 0 0 0 1 2 2 0
-----------

द्वितीय चरण:-
१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ वर्ण
0 0 0 0 1 2 1 0

तृतीय चरण:-
0 0 0 0 1 2 2 0

चतुर्थ चरण:-
0 0 0 0 1 2 1 0


दो दो चरण अथवा चारों चरण अथवा
 सम चरण तुकांत लिए जा सकते है।


हिंदी भाषा में श्लोक बहुत ही कम प्रचलित है ।
 सीखने के उद्धेश्य से मात्र 2 श्लोक लिखें।


उदाहरण:-
माँ शारदे धरूँ शीश,
विद्या विनय दायिनी।
मंगलमय आशीष,
मोहनी हँस वाहिनी।
********************
ज्ञानमय जले दीप,
ज्ञानदा शुभ कारिणी।
मन मोती बने सीप,
वेदिके तम हारिणी।
******************
रचनाकार
डॉ नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)
--------------------------------------
अनुष्ठुप छंद। श्लोक

गुरु मिले हमें ऐसे,
हुआ सब सुधार है।
बनी रहे कृपा ऐसे,
मेरी यही पुकार है।।

गुरु हरि समाना ही
भवसागर तार है।
दास पे अनुकम्पा हो,
बस ये अरदास है।।

अरविन्द चास्टा ,कपासन चित्तौड़गढ़। राजस्थान
----------------------------------------------------------
अनुष्ठुप छंद

कवि स्वयं विधाता है।
कृति रचे सशक्त ये।
दर्पण वो दिखाता है। भेद भाव विरक्त ये।।

गीत छंद सजा देगा। शब्द बने प्रहार है।
सच को ये दिखा देगा। जैसे ठंडी फुआर है।।

लेखनी उपकारी है। लागे न्यारी तरंग है।
वाणी ये हितकारी है। देता प्यारी उमंग है।।

ये छुए सब सोपान। भावना को दुलारता।
तभी पावत सम्मान। सद्गुणों से निहारता ।।

सुवर्णा परतानी
हैदराबाद

----------------------------------
 

अनुष्टुप छन्द

साँझ हुई सिंदूरी सी, साँझ आज उजास है।
नाच रही मयूरी सी, सूर्य सजन पास है।

रोम-रोम हर्षे गात, मूक नैन पुकारते।
भानु पिया हिया लात, अपलक निहारते।

आज मिलन होने दो, सूर्य सजन पास है।
प्रेम मन डुबोने दो, साँझ आज उजास है।

प्रेमी पाति पढ़ाने दो, हृदय पिय प्रीत है,
आस नभ चढ़ाने दो, दिनेश तम जीत है।

नीलम शर्मा 

----------------------------------

अनुष्टुप छन्द


जहर घोलने वाला, देखो घूमे जहाँ-तहाँ ।
काट जहर को देख , जो फैले हैं यहाँ-वहाँ ।।

स्वच्छ जहां बना लो जी, दम घुट रहा सुनो ।
कंचन जग हो सारा , पथ ऐसा सभी चुनो ,

नारी शोषित क्यों होती , क्यों कल्पित सुता यहाँ ?
राहों में लुटती स्त्री है , गंदा देखो हुआ जहां ।।

मां का स्वप्न जला डाला , गोदी जो थी बढ़ी पली ।
रोई थी फुलवारी भी , सूना देखो सभी गली ।।

अभय कुमार आनंद
विष्णुपुर, बांका, बिहार व
लखनऊ उत्तरप्रदेश

-----------------------------------------------

अनुष्टुप छन्द


कुटिलता भरे कर्म, माथे तिलक चंदन।
आडम्बर भरा धर्म, सब माया का क्रंदन।

घट घट बसे राम, पर बाहर खोजते।
बारम्बार जपो नाम, मन क्या तुम सोचते।

नश्वर सब संसार, निश्चित देह अंत है।
तज मोह अहंकार, आत्मा ये ईश अंश है।

धर्म का मर्म जानो रे! मानवता प्रधान है।
हरि का ध्यान धारो हे! भक्ति का ये विधान है।

भवसागर निस्तार, ये जन्म अनमोल है।
गुरु चरण उद्धार, शुभ कर्म निदान है।

जितेंदर पाल सिंह

--------------------------------------------

अनुष्टुप छंद- वर्णिक
---- ----- ----- -----
तुम ही तो विधाता हो, तुमसे ही विधान है,
तुमसे साँझ होती है, तुमसे ही विहान है।।

जग के हो तुम्हीं दाता, तुम साथी अनाथ के,
तुम्हरी है कृपा सारी, बिगड़े को सँवार दे।।

तुमसे जीव सारे हैं, नभ से ले धरा सभी,
तुम हो बेसहारों के, कब भूले तुम्हें कभी।।

हम क्या ले यहाँ आये, जग ये क्यों लड़े यहाँ,
धन के लोग हैं लोभी, जब देखो जहाँ - तहाँ।।

तम हारे उजाला हो, सच की धारणा धरूँ,
अबला को बना ज्वाला, प्रभु ये विनती करूँ।।

@अशोक कुमार "अश्क चिरैयाकोटी"

----------------------------------------------------------

अनुष्टुप छ्न्द 


प्रमुदित यहां सीता 
कोयल मृदु भाषिणी 
गावत सब हैं गीता 
कूकत मन शोभिणी 
......
नाम जपत है राधा 
प्रीत निरखने लगी 
कृष्ण बसत है आधा 
सिम्पल लिखने लगी 
......
सिम्पल काव्यधारा
प्रयागराज

-----------------------------------------

अनुष्टुप छंद 

ये जगत दिखाता है
आस तन तरंग है
प्रेम मन बनाता है
राह सब उमंग है ।

लोग जग सजा देगें
प्रभु जगत आस है
मान सब बना देगें
दात सजन पास है ।

सांझ जग बहारे हैं
मान यह पुकार लो
लोग सब सहारे हैं
साथ सब सँवार लो ।

रजिन्दर कोर (रेशू)
अमृतसर